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Kurukshetra News: तीसरी की किताबें पांच हजार तक, निजी स्कूलों ने बढ़ाया अभिभावकों पर बोझ
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कुरुक्षेत्र। शहर में स्थित किताबों की एक दुकान पर अभिभावकों की भारी भीड़ । संवाद
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कुरुक्षेत्र। निजी स्कूलों में दाखिला प्रक्रिया शुरू होते ही अभिभावकों की जेब पर खासा असर पड़ रहा है। बुधवार से नया सत्र शुरू हो रहा है। इसके लिए मंगलवार को किताब विक्रेताओं की दुकानों पर भारी भीड़ रही, अभिभावकों को निजी प्रकाशकों की किताबें खरीदने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। तीसरी कक्षा की किताबें, कॉपी समेत पांच हजार रुपये तक की बेची जा रही हैं। वहीं छठी कक्षा की किताबें सिर्फ 3250 रुपये में मिल रही हैं। सातवीं कक्षा की आठ से 10 किताबों का सेट 3620 रुपये में अभिभावकों को लेना पड़ रहा है।
निजी स्कूलों की मनमानी से अभिभावकों में गहरा रोष दिखाई दे रहा है। अभिभावकों का कहना है कि शिक्षा को आज कारोबार बना दिया गया है। अपने बच्चों के लिए यूकेजी और छठी की किताबें खरीदने आई शीतल खोकर ने बताया कि बिना स्टेशनरी के ही छोटे बच्चे की किताब-कॉपी 2200 रुपये तक की मिली, जबकि बड़े बच्चे की किताब-कॉपी चार हजार रुपये तक की मिली। उनका कहना है कि मध्यमवर्ग के परिवारों के लिए ढंग के निजी स्कूलों में पढ़ाना मुश्किल हो गया है।
शहर के कई स्कूल माता-पिता को उन्हीं की बताई गई दुकानों से महंगी किताबें और यूनिफॉर्म खरीदने के लिए कहते हैं।
एनसीईआरटी की किताबें होती तो कुछ राहत मिलती : किताबें खरीदने आए पवन ने बताया कि एनसीईआरटी की किताबें इनसे चार गुना सस्ती होती हैं। मेरे दो बच्चे हैं, दोनों ही अलग-अलग स्कूल में हैं और दोनों की किताबों के दाम में जमीन-आसमान का फर्क है। अभिभावक नवनीत चौधरी ने कहा कि मेरा बेटा शहर के स्कूल में पढ़ता है। पिछले साल जब मैंने उसकी किताबें, स्टेशनरी आदि ली तो छह हजार तक का बिल बना था। इस बार न कॉपी ली, न ही स्टेशनरी और न अन्य सामान, तब भी 3500 रुपये तक का बिल बना है।
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निजी स्कूलों की मनमानी से अभिभावकों में गहरा रोष दिखाई दे रहा है। अभिभावकों का कहना है कि शिक्षा को आज कारोबार बना दिया गया है। अपने बच्चों के लिए यूकेजी और छठी की किताबें खरीदने आई शीतल खोकर ने बताया कि बिना स्टेशनरी के ही छोटे बच्चे की किताब-कॉपी 2200 रुपये तक की मिली, जबकि बड़े बच्चे की किताब-कॉपी चार हजार रुपये तक की मिली। उनका कहना है कि मध्यमवर्ग के परिवारों के लिए ढंग के निजी स्कूलों में पढ़ाना मुश्किल हो गया है।
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शहर के कई स्कूल माता-पिता को उन्हीं की बताई गई दुकानों से महंगी किताबें और यूनिफॉर्म खरीदने के लिए कहते हैं।
एनसीईआरटी की किताबें होती तो कुछ राहत मिलती : किताबें खरीदने आए पवन ने बताया कि एनसीईआरटी की किताबें इनसे चार गुना सस्ती होती हैं। मेरे दो बच्चे हैं, दोनों ही अलग-अलग स्कूल में हैं और दोनों की किताबों के दाम में जमीन-आसमान का फर्क है। अभिभावक नवनीत चौधरी ने कहा कि मेरा बेटा शहर के स्कूल में पढ़ता है। पिछले साल जब मैंने उसकी किताबें, स्टेशनरी आदि ली तो छह हजार तक का बिल बना था। इस बार न कॉपी ली, न ही स्टेशनरी और न अन्य सामान, तब भी 3500 रुपये तक का बिल बना है।