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रणदीप हुड्डा को याद आते हैं गांधी कैंप के आटे के बिस्कुट, तिलियार की पिकनिक
ब्यूरो/अमर उजाला, रोहतक
Updated Sun, 23 Apr 2017 02:42 AM IST
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रणदीप और उनकी मम्मी ने रोहतक की यादें की साझा
- फोटो : file photo
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बॉलीवुड के चमकते सितारे अभिनेता रणदीप हुड्डा आज किसी पहचान के मोहताज नहीं हैं। रोहतक के डीएलएफ कॉलोनी के रहने वाले रणदीप के संघर्ष की दास्तां कुछ कम नहीं है। रणदीप ने तीसरी क्लास तक मॉडल टाउन स्कूल में पढ़ाई की। इसके बाद सोनीपत और दिल्ली में 12वीं तक की पढ़ाई खत्म करके आस्ट्रेलिया की तरफ रुख किया। दोस्तों के बीच सत्तू के नाम से पहचाने जाने वाले रणदीप आस्ट्रेलिया में पढ़ाई करने के साथ-साथ टैक्सी चलाकर और रेस्टोरेंट में काम करके अपना खर्च निकालते थे। इसके बाद बॉलीवुड में खास पहचान बनाने में कामयाबी हासिल की। अभिनेता रणदीप सिंह हुड्डा आज भी गांधी कैंप में बनने वाले आटे के बिस्कुट और तिलियार झील में पिकनिक को मिस करते हैं।
परिजन डरते थे, बॉलीवुड में भटक न जा छोरा
रणदीप ने बताया कि उनके पिता डॉ. रणबीर हुड्डा का शहर में निजी हॉस्पिटल था। वह रणदीप को डॉक्टर बनाना चाहते थे। परिवार में माता आशा हुड्डा, बड़ी बहन डॉ. अंजलि और छोटा भाई संदीप है। भाई सिंगापुर में इंजीनियर है। रणदीप ने सोनीपत जिले के राई स्थित मोतीलाल नेहरू स्कूल ऑफ स्पोर्ट्स में पढ़ाई की। वहीं से हॉर्स राइडिंग का शौक लगा। इसके बाद 12वीं दिल्ली के आरके पुरम स्थित डीपीएस स्कूल में की और फिर आस्ट्रेलिया चले गए। वहां पर मैनेजमेंट की डिग्री के साथ-साथ टैक्सी भी चलाई। साथ ही मॉडलिंग भी की। बेटे के बॉलीवुड में जाने से माता पिता को डर था कि कहीं रणदीप भटक न जाए। रणदीप को साल 2002 में डायरेक्टर मीरा नायर की फिल्म ‘मानसून वेडिंग’ में पहला ब्रेक मिला। इस फिल्म के बाद रणदीप रामगोपाल वर्मा की ‘डी-कंपनी’ फिल्म में नजर आए। हाल में ही उन्होंने सुल्तान मूवी में सलमान खान के रेसलर कोच की भूमिका निभाई थी।
स्कूल से पहुंचते थे गांव, पिटाई भी होती थी
रणदीप को बचपन से ही पशुओं से बेहद प्रेम था। रणदीप का कहना है कि रोहतक में पढ़ाई के दौरान स्कूल की छुट्टी के बाद वह अक्सर स्कूल बस से अपनी दादी नंदो देवी के पास जसिया गांव में चले जाते थे। वहां पर गाय-भैंस का दूध पीते और उनके खाने-पीने का ध्यान रखते। ऐसे में कई बार उनके माता-पिता बहुत परेशान हो जाते थे कि आखिर छुट्टी के बाद रणदीप कहां गया। उस समय मोबाइल फोन भी नहीं थे। ऐसे में उनके चाचा या परिवार के अन्य सदस्य रोहतक छोड़कर जाते थे। कई बार उनकी पिटाई भी हुई।
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ट्यूशन टीचर के आते ही छिप जाते थे रणदीप
रणदीप का कहना है कि वह पढ़ाई में सामान्य थे। बचपन में उनके माता-पिता ने ट्यूशन लगा दिया, लेकिन इससे वह खुश नहीं थे। जैसे ही ट्यूशन के टीचर घर आते वह पर्दे के पीछे या फिर बेड के नीचे छिप जाते थे। कई दफा पूरे घर में तलाशने के बाद भी उनका पता नहीं चलता था और ट्यूशन टीचर को वापस जाना पड़ जाता था।
घर से आटा लेकर गांधी कैंप जाते थे आटे के बिस्कुट बनवाने
रणदीप को आटे के बिस्कुट बेहद पसंद थे। रणदीप वह घर से आटा लेकर बिस्कुट बनवाने पहुंच जाते थे। उन्हें यह बिस्कुट इतने पसंद थे कि भले ही रोटी न मिले, वह बिस्कुट और दूध जरूर पीते थे। इसके अलावा पिकनिक के लिए तिलियार झील उनकी पसंदीदा जगह थी। आज भी जब वह कभी रोहतक में आते हैं तो तिलियार के सामने आते ही बचपन की यादें ताजा हो जाती हैं।
सपने देंखे और लगन से मेहनत करें
रणदीप का कहना है कि कई बार युवा सपने तो देखते हैं लेकिन सही मार्गदर्शन और लगन की कमी से सपने पूरे नहीं होते हैं। वह कहते हैं कि युवाओं को जीवन में कुछ पाने से संघर्ष के लिए तैयार रहना होगा। जिंदगी में मेहनत का कोई विकल्प नहीं है, बस जरूरत है तो अपने लक्ष्य को पाने के लिए जुनून की।
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परिजन डरते थे, बॉलीवुड में भटक न जा छोरा
रणदीप ने बताया कि उनके पिता डॉ. रणबीर हुड्डा का शहर में निजी हॉस्पिटल था। वह रणदीप को डॉक्टर बनाना चाहते थे। परिवार में माता आशा हुड्डा, बड़ी बहन डॉ. अंजलि और छोटा भाई संदीप है। भाई सिंगापुर में इंजीनियर है। रणदीप ने सोनीपत जिले के राई स्थित मोतीलाल नेहरू स्कूल ऑफ स्पोर्ट्स में पढ़ाई की। वहीं से हॉर्स राइडिंग का शौक लगा। इसके बाद 12वीं दिल्ली के आरके पुरम स्थित डीपीएस स्कूल में की और फिर आस्ट्रेलिया चले गए। वहां पर मैनेजमेंट की डिग्री के साथ-साथ टैक्सी भी चलाई। साथ ही मॉडलिंग भी की। बेटे के बॉलीवुड में जाने से माता पिता को डर था कि कहीं रणदीप भटक न जाए। रणदीप को साल 2002 में डायरेक्टर मीरा नायर की फिल्म ‘मानसून वेडिंग’ में पहला ब्रेक मिला। इस फिल्म के बाद रणदीप रामगोपाल वर्मा की ‘डी-कंपनी’ फिल्म में नजर आए। हाल में ही उन्होंने सुल्तान मूवी में सलमान खान के रेसलर कोच की भूमिका निभाई थी।
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स्कूल से पहुंचते थे गांव, पिटाई भी होती थी
रणदीप को बचपन से ही पशुओं से बेहद प्रेम था। रणदीप का कहना है कि रोहतक में पढ़ाई के दौरान स्कूल की छुट्टी के बाद वह अक्सर स्कूल बस से अपनी दादी नंदो देवी के पास जसिया गांव में चले जाते थे। वहां पर गाय-भैंस का दूध पीते और उनके खाने-पीने का ध्यान रखते। ऐसे में कई बार उनके माता-पिता बहुत परेशान हो जाते थे कि आखिर छुट्टी के बाद रणदीप कहां गया। उस समय मोबाइल फोन भी नहीं थे। ऐसे में उनके चाचा या परिवार के अन्य सदस्य रोहतक छोड़कर जाते थे। कई बार उनकी पिटाई भी हुई।
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ट्यूशन टीचर के आते ही छिप जाते थे रणदीप
रणदीप का कहना है कि वह पढ़ाई में सामान्य थे। बचपन में उनके माता-पिता ने ट्यूशन लगा दिया, लेकिन इससे वह खुश नहीं थे। जैसे ही ट्यूशन के टीचर घर आते वह पर्दे के पीछे या फिर बेड के नीचे छिप जाते थे। कई दफा पूरे घर में तलाशने के बाद भी उनका पता नहीं चलता था और ट्यूशन टीचर को वापस जाना पड़ जाता था।
घर से आटा लेकर गांधी कैंप जाते थे आटे के बिस्कुट बनवाने
रणदीप को आटे के बिस्कुट बेहद पसंद थे। रणदीप वह घर से आटा लेकर बिस्कुट बनवाने पहुंच जाते थे। उन्हें यह बिस्कुट इतने पसंद थे कि भले ही रोटी न मिले, वह बिस्कुट और दूध जरूर पीते थे। इसके अलावा पिकनिक के लिए तिलियार झील उनकी पसंदीदा जगह थी। आज भी जब वह कभी रोहतक में आते हैं तो तिलियार के सामने आते ही बचपन की यादें ताजा हो जाती हैं।
सपने देंखे और लगन से मेहनत करें
रणदीप का कहना है कि कई बार युवा सपने तो देखते हैं लेकिन सही मार्गदर्शन और लगन की कमी से सपने पूरे नहीं होते हैं। वह कहते हैं कि युवाओं को जीवन में कुछ पाने से संघर्ष के लिए तैयार रहना होगा। जिंदगी में मेहनत का कोई विकल्प नहीं है, बस जरूरत है तो अपने लक्ष्य को पाने के लिए जुनून की।