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Sirsa News: खुद चारपाई से उठ नहीं सकती, फिर भी दस साल से बच्चों को निशुल्क पढ़ा रहीं आरती
संवाद न्यूज एजेंसी, सिरसा
Updated Sun, 25 Jan 2026 11:52 PM IST
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सिरसा।रामनगरिया में आरती अरोड़ा बच्चों को पढ़ाती हुई। स्वयं
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- एक टीस ने बदली जिंदगी, शिक्षा से रोशन कर रही सैकड़ों भविष्य
फोटो-33
संवाद न्यूज एजेंसी
सिरसा। सिरसा जिले के गांव रामनगरिया में रहने वाली आरती अरोड़ा, जो सौ प्रतिशत दिव्यांग हैं। वह चारपाई से उठ भी नहीं सकतीं, लेकिन अपनी मजबूत इच्छाशक्ति के बल पर पिछले दस वर्षों से जरूरतमंद बच्चों को निशुल्क शिक्षा देकर उनकी जिंदगी संवार रही हैं।
शहर से करीब पांच किलोमीटर दूर स्थित रामनगरिया गांव में रहने वाली आरती के घर रोजाना पहली से दसवीं कक्षा तक के करीब 50 से 70 बच्चे पढ़ने के लिए आते हैं। आरती इन बच्चों से कोई फीस नहीं लेतीं, बल्कि पूरी निष्ठा और समर्पण के साथ उन्हें पढ़ाती हैं। उनका एक ही सपना है कि गरीबी के कारण कोई भी बच्चा शिक्षा से वंचित न रहे। आरती का जीवन संघर्षों से भरा रहा है। उनके पति ऑटो रिक्शा चलाकर परिवार का पालन-पोषण करते हैं। खुद आरती शारीरिक रूप से पूरी तरह अक्षम हैं, लेकिन उन्होंने अपनी कमजोरी को कभी अपनी राह का रोड़ा नहीं बनने दिया।
शिक्षा के प्रति उनका यह जुनून एक गहरी पीड़ा से जन्मा
आरती बताती हैं कि जब वह दसवीं कक्षा में पढ़ती थीं, तब उनके घर की आर्थिक स्थिति बेहद कमजोर थी। उनके पिता भी पोलियो से ग्रस्त थे, जिसके कारण घर की जिम्मेदारी उनकी मां पर थी, जो दूसरों के घरों में काम करके परिवार का गुजारा करती थीं। दसवीं की बोर्ड परीक्षा के दौरान उनकी मां उन्हें ट्यूशन दिलाने के लिए एक अध्यापक के पास लेकर गईं। अध्यापक ने 300 रुपये फीस मांगी, लेकिन इतनी राशि देना परिवार के लिए संभव नहीं था और शिक्षक ने ट्यूशन देने से मना कर दिया था। मजबूरी में आरती ट्यूशन नहीं ले सकीं।
यही वह पल था, जिसने आरती की जिंदगी की दिशा बदल दी। उन्होंने उसी समय मन में ठान लिया कि जिस तरह वह पैसों के अभाव में ट्यूशन से वंचित रहीं, वैसा किसी और बच्चे के साथ नहीं होने देंगी। यही संकल्प आगे चलकर उनके जीवन का उद्देश्य बन गया।
बेटा प्रिंस बच्चों को गणित व अंग्रेजी पढ़ाता है
आरती ने 12वीं कक्षा तक पढ़ाई की है और पिछले दस वर्षों से लगातार बच्चों को निशुल्क पढ़ा रही हैं। उनके पढ़ाए हुए कई विद्यार्थी आज शिक्षक, कराटे कोच और निजी संस्थानों में नौकरी कर रहे हैं। यह उनके लिए सबसे बड़ा सम्मान है। बच्चों की पढ़ाई में आरती को उनके परिवार का भी सहयोग मिलता है। उनका बेटा भी बच्चों को गणित और अंग्रेजी पढ़ाने में उनकी मदद करता है। आरती बच्चों से न तो कोई शुल्क लेती हैं और न ही किसी तरह की अपेक्षा रखती हैं। अगर किसी बच्चे को किताब, कॉपी या अन्य जरूरत होती है, तो वे सामाजिक संस्थाओं के माध्यम से उसकी मदद करवाती हैं।
सास-ससुर ने घर से निकाला बाहर
आरती जब शादी के लायक हुई तो पिता को चिंता सताने लगी। ऐसे में उन्होंने आरती के लिए लड़के की तलाश शुरू कर दी। लेकिन दिव्यांगता के कारण महिला के लिए कोई योग्य वर नहीं मिला। ऐसे में पड़ोस में रहने वाले युवक ने आरती की दशा देखी थी। जिसके कारण उन्होंने आरती से शादी करने की बात उनके पिता से की। लेकिन इस पर पिता ने युवक से कहा कि बेटी को आधे में कहीं छोड़कर तो नहीं चले जाओगे। युवक ने आरती के पिता को विश्वास दिलवाया। लेकिन युवक के माता-पिता शादी के लिए नहीं माने। युवक ने आरती से शादी कर ली। इस पर उक्त युवक के माता-पिता ने उन दोनों को घर से बाहर निकाल दिया।
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संवाद न्यूज एजेंसी
सिरसा। सिरसा जिले के गांव रामनगरिया में रहने वाली आरती अरोड़ा, जो सौ प्रतिशत दिव्यांग हैं। वह चारपाई से उठ भी नहीं सकतीं, लेकिन अपनी मजबूत इच्छाशक्ति के बल पर पिछले दस वर्षों से जरूरतमंद बच्चों को निशुल्क शिक्षा देकर उनकी जिंदगी संवार रही हैं।
शहर से करीब पांच किलोमीटर दूर स्थित रामनगरिया गांव में रहने वाली आरती के घर रोजाना पहली से दसवीं कक्षा तक के करीब 50 से 70 बच्चे पढ़ने के लिए आते हैं। आरती इन बच्चों से कोई फीस नहीं लेतीं, बल्कि पूरी निष्ठा और समर्पण के साथ उन्हें पढ़ाती हैं। उनका एक ही सपना है कि गरीबी के कारण कोई भी बच्चा शिक्षा से वंचित न रहे। आरती का जीवन संघर्षों से भरा रहा है। उनके पति ऑटो रिक्शा चलाकर परिवार का पालन-पोषण करते हैं। खुद आरती शारीरिक रूप से पूरी तरह अक्षम हैं, लेकिन उन्होंने अपनी कमजोरी को कभी अपनी राह का रोड़ा नहीं बनने दिया।
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शिक्षा के प्रति उनका यह जुनून एक गहरी पीड़ा से जन्मा
आरती बताती हैं कि जब वह दसवीं कक्षा में पढ़ती थीं, तब उनके घर की आर्थिक स्थिति बेहद कमजोर थी। उनके पिता भी पोलियो से ग्रस्त थे, जिसके कारण घर की जिम्मेदारी उनकी मां पर थी, जो दूसरों के घरों में काम करके परिवार का गुजारा करती थीं। दसवीं की बोर्ड परीक्षा के दौरान उनकी मां उन्हें ट्यूशन दिलाने के लिए एक अध्यापक के पास लेकर गईं। अध्यापक ने 300 रुपये फीस मांगी, लेकिन इतनी राशि देना परिवार के लिए संभव नहीं था और शिक्षक ने ट्यूशन देने से मना कर दिया था। मजबूरी में आरती ट्यूशन नहीं ले सकीं।
यही वह पल था, जिसने आरती की जिंदगी की दिशा बदल दी। उन्होंने उसी समय मन में ठान लिया कि जिस तरह वह पैसों के अभाव में ट्यूशन से वंचित रहीं, वैसा किसी और बच्चे के साथ नहीं होने देंगी। यही संकल्प आगे चलकर उनके जीवन का उद्देश्य बन गया।
बेटा प्रिंस बच्चों को गणित व अंग्रेजी पढ़ाता है
आरती ने 12वीं कक्षा तक पढ़ाई की है और पिछले दस वर्षों से लगातार बच्चों को निशुल्क पढ़ा रही हैं। उनके पढ़ाए हुए कई विद्यार्थी आज शिक्षक, कराटे कोच और निजी संस्थानों में नौकरी कर रहे हैं। यह उनके लिए सबसे बड़ा सम्मान है। बच्चों की पढ़ाई में आरती को उनके परिवार का भी सहयोग मिलता है। उनका बेटा भी बच्चों को गणित और अंग्रेजी पढ़ाने में उनकी मदद करता है। आरती बच्चों से न तो कोई शुल्क लेती हैं और न ही किसी तरह की अपेक्षा रखती हैं। अगर किसी बच्चे को किताब, कॉपी या अन्य जरूरत होती है, तो वे सामाजिक संस्थाओं के माध्यम से उसकी मदद करवाती हैं।
सास-ससुर ने घर से निकाला बाहर
आरती जब शादी के लायक हुई तो पिता को चिंता सताने लगी। ऐसे में उन्होंने आरती के लिए लड़के की तलाश शुरू कर दी। लेकिन दिव्यांगता के कारण महिला के लिए कोई योग्य वर नहीं मिला। ऐसे में पड़ोस में रहने वाले युवक ने आरती की दशा देखी थी। जिसके कारण उन्होंने आरती से शादी करने की बात उनके पिता से की। लेकिन इस पर पिता ने युवक से कहा कि बेटी को आधे में कहीं छोड़कर तो नहीं चले जाओगे। युवक ने आरती के पिता को विश्वास दिलवाया। लेकिन युवक के माता-पिता शादी के लिए नहीं माने। युवक ने आरती से शादी कर ली। इस पर उक्त युवक के माता-पिता ने उन दोनों को घर से बाहर निकाल दिया।