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आपातकाल के जख्म आज भी ताजा : किसी ने हथकड़ी में दी परीक्षा तो किसी ने ठुकरा दी एचसीएस की कुर्सी

संवाद न्यूज एजेंसी, सोनीपत Updated Thu, 25 Jun 2026 03:26 AM IST
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Wounds of the Emergency remain fresh: Some took exams in handcuffs, while others turned down the HCS post.
फोटो :: ललित बत्रा
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सोनीपत। 26 जून 1975 का दिन भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का वह अध्याय है जिसे याद करते ही आज भी कई लोगों की रूह कांप उठती है। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की तरफ से लगाए गए आपातकाल ने देशभर में नागरिक अधिकारों को सीमित कर दिया था। सोनीपत भी इससे अछूता नहीं रहा।

जिले के करीब 150 लोगों को विभिन्न आरोपों में बंदी बनाकर जेलों में डाल दिया गया। अनेक राजनीतिक और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने पुलिसिया उत्पीड़न, जेल और यातनाएं झेलीं लेकिन अपने विचारों और लोकतांत्रिक अधिकारों से समझौता नहीं किया।
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हथकड़ी में दी परीक्षा, 14 साल की उम्र में पहुंचे जेल
आपातकाल के दौरान राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) के आह्वान पर सत्याग्रह में शामिल होने वाले ललित बत्रा उस समय मात्र 14 वर्ष के थे और नौवीं कक्षा में पढ़ते थे। अक्तूबर 1975 में उन्होंने अन्य युवाओं के साथ सोनीपत के गंज बाजार में सरकार के खिलाफ नारेबाजी की। पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर पहले सिटी थाना और बाद में रोहतक जेल भेज दिया जहां उन्हें 13 महीने तक रहना पड़ा। वरिष्ठ भाजपा नेता ललित बत्रा बताते हैं कि गिरफ्तारी के बाद उन्हें 10 बाई 10 फुट के एक कमरे में 17 अन्य लोगों के साथ रखा गया। लॉकअप में न रोशनी थी न शौचालय की व्यवस्था। रात को ओढ़ने के लिए जो कंबल दिए गए वह खटमलों से भरे थे। जेल प्रवास के दौरान उनकी नौवीं कक्षा की परीक्षा भी आ गई। जेल प्रशासन की अनुमति से उन्हें हथकड़ी लगाकर हिंदू स्कूल के परीक्षा केंद्र ले जाया जाता था। परीक्षा के दौरान एक पुलिसकर्मी हथकड़ी का दूसरा सिरा पकड़े उनके साथ बैठा रहता था। रोहतक जेल पहुंचने पर जेलर ने कम उम्र देखकर उन्हें छोड़ने की पेशकश भी की लेकिन उन्होंने साफ कह दिया कि बाहर जाकर फिर से सरकार के खिलाफ नारेबाजी करेंगे। इसके बाद उन्हें अन्य सत्याग्रहियों के साथ जेल में ही रखा गया। ललित बत्रा बताते हैं कि उनकी बैरक में करीब 110 लोग थे जबकि दूसरी बैरक में बीजू पटनायक, सिकंदर बख्त, पीलू मोदी और समर गुहा जैसे बड़े नेता बंद थे।
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एचसीएस का सपना छोड़ा, लेकिन सिद्धांतों से समझौता नहीं किया
आपातकाल में वरिष्ठ अधिवक्ता राजेंद्र सिंह दहिया ने भी जमकर संघर्ष किया। गांव सिसाना हॉल सेक्टर-23 निवासी राजेंद्र सिंह दहिया तब उच्च शिक्षा प्राप्त कर चुके थे। उन्होंने दो विषयों में स्नातकोत्तर, एलएलबी ऑनर्स तथा हरियाणा सिविल सेवा (एचसीएस) की परीक्षा भी उत्तीर्ण कर ली थी। केवल साक्षात्कार बाकी था लेकिन आपातकाल के दौरान उन्हें जेल जाना पड़ा। दहिया बताते हैं कि परिजन जेल में एचसीएस साक्षात्कार का पत्र लेकर पहुंचे थे। उन्हें बताया गया कि यदि वह माफीनामा दे दें तो साक्षात्कार में शामिल हो सकते हैं। लेकिन उन्होंने अपने सिद्धांतों से समझौता करने से इनकार कर दिया और एचसीएस का अवसर छोड़ दिया। जेल से बाहर आने के बाद उन्होंने वकालत को अपना पेशा बनाया और आगे चलकर सोनीपत बार एसोसिएशन तथा ऑल हरियाणा बार एसोसिएशन के अध्यक्ष भी बने। दहिया नसबंदी अभियान के विरोध में हुए चर्चित पिपली कांड में भी सक्रिय रहे। 2 दिसंबर 1975 को जबरन नसबंदी के विरोध में हुए आंदोलन में उन्होंने लोगों की आवाज बुलंद की और इसके चलते उन्हें जेल भी जाना पड़ा। आज भी वह सामाजिक सरोकारों से जुड़े हुए हैं। लोकतंत्र के सेनानियों ने कठिन परिस्थितियों में भी अपने विचारों से समझौता नहीं किया और आने वाली पीढ़ी के लिए साहस व प्रतिबद्धता की मिसाल कायम की।

फोटो :: ललित बत्रा

फोटो :: ललित बत्रा

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