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भगवान के अवतार जीवन को देते हैं दिशा : राबिया
संवाद न्यूज एजेंसी, यमुना नगर
Updated Wed, 18 Mar 2026 01:07 AM IST
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प्रवचन करतीं साध्वी राबिया भारती। आयोजक
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संवाद न्यूज एजेंसी
साढौरा। भोगपुर गांव में दिव्य ज्योति जागृति संस्थान की ओर से आयोजित तीन दिवसीय श्री हरि कथा के अंतिम साध्वी राबिया भारती ने कहा कि भगवान के अवतार केवल धार्मिक आस्था का विषय नहीं, बल्कि जीवन जीने की दिशा भी देते हैं।
उन्होंने श्री हरि के दशावतारों का वर्णन करते हुए बताया कि हर युग में धर्म की स्थापना और अधर्म के अंत का संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है। साध्वी ने हनुमान की लंका यात्रा को एक आदर्श जीवन यात्रा के रूप में प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि मैनाक पर्वत संसार की सुख-सुविधाओं का प्रतीक है, जिसे छूकर आगे बढ़ना चाहिए, उसमें उलझना नहीं चाहिए।
सुरसा को उन्होंने बढ़ती इच्छाओं का रूप बताया, जिन पर नियंत्रण पाने के लिए आत्मचिंतन जरूरी है। सिंघिका को ईर्ष्या का प्रतीक बताते हुए कहा कि यह व्यक्ति की प्रगति में सबसे बड़ी बाधा बनती है, जिसे दृढ़ संकल्प से समाप्त करना चाहिए। लंकिनी के प्रसंग के माध्यम से उन्होंने सत्संग के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि सकारात्मक संगति व्यक्ति के भीतर की नकारात्मकता को समाप्त कर सकती है।
उन्होंने जोर देकर कहा कि आज के दौर में आध्यात्मिकता का मतलब केवल पूजा-पाठ नहीं, बल्कि अपने विचारों और व्यवहार में सकारात्मक बदलाव लाना है। कथा के दौरान भजनों ने माहौल को भावनात्मक बना दिया और श्रद्धालु भक्ति में लीन नजर आए। अंत में आरती और प्रसाद वितरण के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ।
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साढौरा। भोगपुर गांव में दिव्य ज्योति जागृति संस्थान की ओर से आयोजित तीन दिवसीय श्री हरि कथा के अंतिम साध्वी राबिया भारती ने कहा कि भगवान के अवतार केवल धार्मिक आस्था का विषय नहीं, बल्कि जीवन जीने की दिशा भी देते हैं।
उन्होंने श्री हरि के दशावतारों का वर्णन करते हुए बताया कि हर युग में धर्म की स्थापना और अधर्म के अंत का संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है। साध्वी ने हनुमान की लंका यात्रा को एक आदर्श जीवन यात्रा के रूप में प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि मैनाक पर्वत संसार की सुख-सुविधाओं का प्रतीक है, जिसे छूकर आगे बढ़ना चाहिए, उसमें उलझना नहीं चाहिए।
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सुरसा को उन्होंने बढ़ती इच्छाओं का रूप बताया, जिन पर नियंत्रण पाने के लिए आत्मचिंतन जरूरी है। सिंघिका को ईर्ष्या का प्रतीक बताते हुए कहा कि यह व्यक्ति की प्रगति में सबसे बड़ी बाधा बनती है, जिसे दृढ़ संकल्प से समाप्त करना चाहिए। लंकिनी के प्रसंग के माध्यम से उन्होंने सत्संग के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि सकारात्मक संगति व्यक्ति के भीतर की नकारात्मकता को समाप्त कर सकती है।
उन्होंने जोर देकर कहा कि आज के दौर में आध्यात्मिकता का मतलब केवल पूजा-पाठ नहीं, बल्कि अपने विचारों और व्यवहार में सकारात्मक बदलाव लाना है। कथा के दौरान भजनों ने माहौल को भावनात्मक बना दिया और श्रद्धालु भक्ति में लीन नजर आए। अंत में आरती और प्रसाद वितरण के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ।