{"_id":"69c2eef7c02af5770f067e53","slug":"order-directing-insurance-company-to-pay-claim-amount-with-9-interest-yamuna-nagar-news-c-246-1-sknl1018-153343-2026-03-25","type":"story","status":"publish","title_hn":"Yamuna Nagar News: बीमा कंपनी को नौ प्रतिशत ब्याज दावाराशि देने आदेश","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Yamuna Nagar News: बीमा कंपनी को नौ प्रतिशत ब्याज दावाराशि देने आदेश
संवाद न्यूज एजेंसी, यमुना नगर
Updated Wed, 25 Mar 2026 01:37 AM IST
विज्ञापन
जिला उपभोक्ता आयोग। आर्काइव
- फोटो : संवाद
विज्ञापन
संवाद न्यूज एजेंसी
यमुनानगर। जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग ने बीमा कंपनी की ओर से दावा खारिज करने के मामले में सख्त रुख अपनाते हुए कंपनी को सेवा में कमी का दोषी ठहराया है। आयोग ने आदेश दिया कि कंपनी शिकायतकर्ताओं को 3,05,611 रुपये नौ प्रतिशत वार्षिक ब्याज के साथ अदा करें।
मामले के अनुसार सोंधी मोहल्ला निवासी किशोर शर्मा ने अपनी पत्नी नीरू शर्मा के साथ फैमिली हेल्थ ऑप्टिमा इंश्योरेंस पॉलिसी वर्ष 2017 में ली थी, जिसे समय-समय पर नवीनीकृत किया जाता रहा। पॉलिसी के तहत नीरू शर्मा को कवर किया गया था। वर्ष 2020 में नीरू शर्मा को दोनों घुटनों में दर्द की समस्या के चलते जगाधरी के एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां उनका ऑपरेशन हुआ। इलाज पर करीब 3.30 लाख रुपये खर्च हुए।
इलाज के बाद जब बीमा कंपनी से क्लेम मांगा गया तो कंपनी ने इसे यह कहते हुए खारिज कर दिया कि मरीज को पिछले पांच वर्षों से घुटनों में दर्द था, जो पॉलिसी से पहले की बीमारी (प्री-एग्जिस्टिंग डिजीज) है। कंपनी ने अपनी शर्तों का हवाला देते हुए कहा कि ऐसी बीमारी पर 48 महीने की निरंतर पॉलिसी के बाद ही दावा मान्य होता है।
शिकायतकर्ताओं ने इस निर्णय को गलत बताते हुए आयोग में याचिका दायर की। उन्होंने दलील दी कि अस्पताल के रिकॉर्ड में बीमारी की अवधि गलत दर्ज हो गई थी, जिसे बाद में डॉक्टर ने स्वयं स्वीकार करते हुए स्पष्ट किया कि मरीज को घुटने का दर्द करीब डेढ़ साल पहले शुरू हुआ था, न कि पांच साल पहले।
आयोग ने सुनवाई के दौरान पाया कि बीमा कंपनी ने केवल तकनीकी आधार पर क्लेम खारिज किया और उपलब्ध साक्ष्यों का सही मूल्यांकन नहीं किया। आयोग ने यह भी माना कि यदि पॉलिसी लगातार नवीनीकृत हो रही थी तो कंपनी बाद में प्री-एग्जिस्टिंग बीमारी का हवाला देकर जिम्मेदारी से नहीं बच सकती।
आदेश में आयोग ने सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का भी हवाला देते हुए कहा कि बीमा कंपनियां मनमाने तरीके से क्लेम खारिज नहीं कर सकतीं। आयोग ने स्पष्ट किया कि इस मामले में कंपनी का रवैया सेवा में कमी और उपभोक्ता के साथ अन्यायपूर्ण व्यवहार को दर्शाता है। आयोग के अस्टिटेंट रजिस्ट्रार नीरज वालिया ने कहा कि फैसला बताता है कि अगर हक के लिए डटकर लड़ाई लड़ी जाए, तो देर से ही सही, न्याय जरूर मिलता है। आयोग में आने वाली हर शिकायत पर पीड़ित पक्ष को न्याय दिलाया जा रहा है।
Trending Videos
यमुनानगर। जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग ने बीमा कंपनी की ओर से दावा खारिज करने के मामले में सख्त रुख अपनाते हुए कंपनी को सेवा में कमी का दोषी ठहराया है। आयोग ने आदेश दिया कि कंपनी शिकायतकर्ताओं को 3,05,611 रुपये नौ प्रतिशत वार्षिक ब्याज के साथ अदा करें।
मामले के अनुसार सोंधी मोहल्ला निवासी किशोर शर्मा ने अपनी पत्नी नीरू शर्मा के साथ फैमिली हेल्थ ऑप्टिमा इंश्योरेंस पॉलिसी वर्ष 2017 में ली थी, जिसे समय-समय पर नवीनीकृत किया जाता रहा। पॉलिसी के तहत नीरू शर्मा को कवर किया गया था। वर्ष 2020 में नीरू शर्मा को दोनों घुटनों में दर्द की समस्या के चलते जगाधरी के एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां उनका ऑपरेशन हुआ। इलाज पर करीब 3.30 लाख रुपये खर्च हुए।
विज्ञापन
विज्ञापन
इलाज के बाद जब बीमा कंपनी से क्लेम मांगा गया तो कंपनी ने इसे यह कहते हुए खारिज कर दिया कि मरीज को पिछले पांच वर्षों से घुटनों में दर्द था, जो पॉलिसी से पहले की बीमारी (प्री-एग्जिस्टिंग डिजीज) है। कंपनी ने अपनी शर्तों का हवाला देते हुए कहा कि ऐसी बीमारी पर 48 महीने की निरंतर पॉलिसी के बाद ही दावा मान्य होता है।
शिकायतकर्ताओं ने इस निर्णय को गलत बताते हुए आयोग में याचिका दायर की। उन्होंने दलील दी कि अस्पताल के रिकॉर्ड में बीमारी की अवधि गलत दर्ज हो गई थी, जिसे बाद में डॉक्टर ने स्वयं स्वीकार करते हुए स्पष्ट किया कि मरीज को घुटने का दर्द करीब डेढ़ साल पहले शुरू हुआ था, न कि पांच साल पहले।
आयोग ने सुनवाई के दौरान पाया कि बीमा कंपनी ने केवल तकनीकी आधार पर क्लेम खारिज किया और उपलब्ध साक्ष्यों का सही मूल्यांकन नहीं किया। आयोग ने यह भी माना कि यदि पॉलिसी लगातार नवीनीकृत हो रही थी तो कंपनी बाद में प्री-एग्जिस्टिंग बीमारी का हवाला देकर जिम्मेदारी से नहीं बच सकती।
आदेश में आयोग ने सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का भी हवाला देते हुए कहा कि बीमा कंपनियां मनमाने तरीके से क्लेम खारिज नहीं कर सकतीं। आयोग ने स्पष्ट किया कि इस मामले में कंपनी का रवैया सेवा में कमी और उपभोक्ता के साथ अन्यायपूर्ण व्यवहार को दर्शाता है। आयोग के अस्टिटेंट रजिस्ट्रार नीरज वालिया ने कहा कि फैसला बताता है कि अगर हक के लिए डटकर लड़ाई लड़ी जाए, तो देर से ही सही, न्याय जरूर मिलता है। आयोग में आने वाली हर शिकायत पर पीड़ित पक्ष को न्याय दिलाया जा रहा है।