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Bilaspur News: फूड इंस्पेक्टर को इडियट कहकर दुकान से निकाला, अदालत ने माना ड्यूटी में बाधा

संवाद न्यूज एजेंसी, बिलासपुर Updated Mon, 16 Mar 2026 11:30 PM IST
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A food inspector was called an idiot and thrown out of a shop; the court held that it was obstruction of duty.
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अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश घुमारवीं की अदालत ने ट्रायल कोर्ट का आदेश किया रद्द
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कोरोना काल और बल प्रयोग न होने के आधार पर ट्रायल कोर्ट ने किया था डिस्चार्ज
कहा- सरकारी कार्य में बाधा के लिए बल प्रयोग जरूरी नहीं
तीनों आरोपियों के खिलाफ फिर चलेगा अदालत में मुकदमा

सरोज पाठक
बिलासपुर। सरकारी अधिकारी के साथ अभद्र व्यवहार कर उसे ड्यूटी करने से रोकना भी सरकारी कार्य में बाधा माना जाएगा, भले ही उसमें शारीरिक बल का प्रयोग न हुआ हो। अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश घुमारवीं डॉ. मोहित बंसल की अदालत ने इसी आधार पर ट्रायल कोर्ट के आदेश को रद्द करते हुए मामले की सुनवाई दोबारा शुरू करने के निर्देश दिए हैं।
अदालत ने राज्य सरकार की ओर से दायर क्रिमिनल रिवीजन याचिका को स्वीकार करते हुए घुमारवीं की न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी अदालत की ओर से 13 सितंबर 2021 को दिए गए आदेश को निरस्त कर दिया। उस आदेश में तीन आरोपियों को आरोपों से मुक्त कर दिया गया था। अभियोजन के अनुसार 14 मई 2021 को खाद्य, नागरिक आपूर्ति एवं उपभोक्ता मामले विभाग के फूड इंस्पेक्टर अमित कुमार निरीक्षण के लिए बाड़ां-दा-घाट क्षेत्र में पहुंचे थे। उस समय उन्हें घुमारवीं क्षेत्र का अतिरिक्त कार्यभार भी सौंपा गया था। निरीक्षण के दौरान वह एक दुकान पर पहुंचे और उनसे दुकान में प्रदर्शित रेट लिस्ट और लाइसेंस दिखाने को कहा। आरोप है कि उसने बताया कि उनके पास न तो लाइसेंस है और न ही रेट लिस्ट लगी हुई है। इसी दौरान उसका भाई भी वहां आ गया और फूड इंस्पेक्टर से पहले अपनी पहचान दिखाने को कहा। फूड इंस्पेक्टर ने अपनी पहचान बताई, लेकिन इसके बावजूद आरोप है कि दुकानदार के भाई उनसे अभद्र व्यवहार किया। इसी बीच उनका तीसरा भाई भी वहां पहुंच गया। शिकायत के अनुसार तीनों आरोपियों ने फूड इंस्पेक्टर को इडियट कहा और उन्हें दुकान से बाहर जाने के लिए कहा। उस समय दुकान पर कुछ ग्राहक भी मौजूद थे। घटना के दौरान चौक पर ड्यूटी दे रहे दो होमगार्ड विशाल ठाकुर और तरसेम सिंह शोर सुनकर मौके पर पहुंचे। उन्हें घटना की जानकारी दी गई। इसके बाद पुलिस थाना भराड़ी को फोन पर सूचना दी गई। पुलिस कर्मी मौके पर पहुंचे और फूड इंस्पेक्टर की लिखित शिकायत के आधार पर मामला दर्ज किया गया। क्योंकि यह गैर-संज्ञेय अपराध था, इसलिए जांच के लिए अदालत से अनुमति ली गई। अनुमति मिलने के बाद पुलिस ने गवाहों के बयान दर्ज कर कालंद्रा तैयार कर अदालत में पेश किया।
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मामले की सुनवाई के दौरान घुमारवीं की न्यायिक मजिस्ट्रेट अदालत ने 13 सितंबर 2021 को तीनों आरोपियों को आरोपों से मुक्त कर दिया था। अदालत ने अपने आदेश में कहा था कि आरोपियों द्वारा न तो किसी प्रकार का बल प्रयोग किया गया और न ही ऐसा कोई स्पष्ट इरादा सामने आया जिससे यह साबित हो कि उन्होंने सरकारी अधिकारी को ड्यूटी करने से रोका। ट्रायल कोर्ट ने यह भी कहा था कि उस समय कोविड के कारण दुकानों के खुलने का समय सुबह 8 से 11 बजे तक सीमित था और संभव है कि दुकान बंद करने के समय विवाद हुआ हो। अदालत ने यह भी उल्लेख किया था कि फूड इंस्पेक्टर उस क्षेत्र में नए थे और आरोपियों को उनकी पहचान का पता नहीं था। ट्रायल कोर्ट के इस आदेश को राज्य सरकार ने सत्र न्यायालय में चुनौती दी। अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश ने अपने निर्णय में कहा कि धारा 186 के तहत अपराध साबित करने के लिए शारीरिक बल का प्रयोग होना आवश्यक नहीं है। यदि किसी व्यक्ति के व्यवहार के कारण सरकारी कर्मचारी को अपना कर्तव्य निभाने में बाधा आती है तो वह भी इस धारा के अंतर्गत आता है। अदालत ने यह भी कहा कि कोविड-19 के दौरान भी फूड इंस्पेक्टर को दुकानों का निरीक्षण करने से कोई रोक नहीं थी। इसलिए यह मानना उचित नहीं है कि निरीक्षण का समय अनुचित था। सत्र न्यायालय ने पाया कि रिकॉर्ड पर मौजूद तथ्यों से प्रथम दृष्टया आरोप बनते हैं और ट्रायल कोर्ट द्वारा आरोपियों को डिस्चार्ज करना उचित नहीं था। इसी आधार पर अदालत ने ट्रायल कोर्ट का आदेश रद्द कर दिया। संवाद
इनसेट
गवाहों के समय बताने पर भी उठाए गए संदेह खारिज
ट्रायल कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की थी कि गवाहों ने घटना का समय ठीक 10:44 बजे बताया, जिससे संदेह पैदा होता है। सत्र न्यायालय ने इस तर्क को भी असंगत माना और कहा कि केवल समय का एक जैसा होना गवाहों के बयान को अविश्वसनीय नहीं बनाता। अदालत ने कहा कि मौके पर मौजूद होमगार्ड पुलिस गवाह थे और उनका शिकायतकर्ता से कोई निजी संबंध नहीं था, इसलिए उनके बयान पर केवल समय के आधार पर संदेह नहीं किया जा सकता।
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