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Bilaspur News: जमीन का मुआवजा सिर्फ खेती करने वाले का नहीं, सब हिस्सेदारों का बराबर का हक

संवाद न्यूज एजेंसी, बिलासपुर Updated Mon, 08 Jun 2026 11:56 PM IST
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Compensation for land is not just for the cultivator, all stakeholders have equal rights.
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अदालत से ------------------
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बिलासपुर कोर्ट ने 11 साल पुराने विवाद में सुनाया बड़ा फैसला
गलत सरकारी कागजों के दम पर पूरा पैसा हड़पने की कोशिश नाकाम
सभी असली मालिकों और हिस्सेदारों में ब्याज समेत बंटेगी 94 लाख की राशि

संवाद न्यूज एजेंसी
बिलासपुर। भूमि अधिग्रहण के मुआवजे के बंटवारे को लेकर चले लंबे विवाद में कोर्ट ने साझा मालिकों के पक्ष में फैसला सुनाया है। अतिरिक्त जिला न्यायाधीश नविश भारद्वाज की अदालत ने फैसले में साफ कहा कि भराथु की अधिग्रहित जमीन का 94 लाख रुपये का मुआवजा सभी साझा मालिकों के बीच उनके हिस्से के अनुसार बांटा जाएगा। कुछ लोगों द्वारा काश्तकार के आधार पर पूरे मुआवजे पर दावा करने की कोशिश खारिज कर दी गई।
अदालत ने जमीन के मुआवजे को लेकर एक ऐसा ऐतिहासिक फैसला सुनाया है, जो उन हजारों परिवारों के लिए बहुत मददगार साबित होगा जिनकी साझा जमीनें सरकारी प्रोजेक्ट्स के लिए ली जाती हैं। अदालत ने साफ-साफ कहा है कि अगर किसी संयुक्त जमीन पर कोई एक हिस्सेदार खुद खेती कर रहा है या पटवारी के कागजों में उसका नाम काश्तकार के कॉलम में दर्ज है, तो इसका मतलब यह कतई नहीं है कि जमीन का पूरा मुआवजा अकेले वही रख लेगा। कोर्ट ने ऐसी कागजी चालाकियों को पूरी तरह खारिज करते हुए आदेश दिया है कि 94 लाख की पूरी मुआवजा राशि उसके सभी असली हिस्सेदारों में उनके पुराने पैतृक हिस्से के हिसाब से बांटी जाए। यह पूरा मामला बिलासपुर सदर तहसील के भराथू गांव का है। यहां के एक बड़े साझा खानदानी खेत में से करीब साढ़े चार बीघा टुकड़ा सिंचाई विभाग ने पानी का टैंक बनाने के लिए सरकारी कब्जे में लिया था। सरकार की तरफ से साल 2015 में इस जमीन का कुल मुआवजा चौरानवे लाख रुपये तय हुआ था। इस पैसे को सरकारी अधिकारियों ने हिमाचल ग्रामीण बैंक (मंडी) में एक फिक्स्ड डिपॉजिट खाते में सुरक्षित जमा करा दिया था। जैसे ही मुआवज़े की इतनी बड़ी रकम बैंक में जमा हुई, जमीन पर खेती कर रहे कुछ लोगों यानी काश्तकारों की नीयत डोल गई। उन्होंने सरकारी कागजों में खुद को गैर-मरूसी यानी जमीन पर कब्जा रखने वाला किरायेदार या काश्तकार बताकर पूरे पैसे पर अकेले अपना दावा ठोक दिया। उन्होंने बाकी भाइयों और वैध हिस्सेदारों को फूटी कौड़ी देने से भी मना कर दिया। इसके विरोध में असली भू-स्वामियों, सदा राम (अब स्वर्गीय) और अन्य हिस्सेदारों ने साल 2015 में अपने हक के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाया। पीड़ित पक्ष के वकील ने अदालत में पुख्ता सबूत पेश करते हुए बताया कि इस जमीन को लेकर साल 1983 में ही बिलासपुर की दीवानी अदालत (सिविल कोर्ट) ने एक फैसला सुनाया था। उस समय कोर्ट ने साफ कहा था कि इस जमीन से जुड़े सभी लोग आपस में सह-मालिक हैं, कोई भी किसी का नौकर, किरायेदार या अकेला काश्तकार नहीं है। लेकिन इतने साल बीत जाने के बाद भी पटवारखाने के रिकॉर्ड में सुधार नहीं हुआ। प्रतिवादियों ने इसी बात का फायदा उठाया और खुद को सर्वेसर्वा बताकर पूरा पैसा हड़पना चाहा। 31 अक्टूबर 2025 को भी सीनियर सिविल कोर्ट ने इन गलत कागजी प्रविष्टियों को पूरी तरह गैर-कानूनी और रद्द घोषित किया था।
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मामले के सभी पहलुओं और गवाहों के बयानों को देखने के बाद एडिशनल डिस्ट्रिक्ट जज नवीश भारद्वाज ने अपने फैसले में देश के संविधान का हवाला देते हुए बड़ी बात कही। कोर्ट ने कहा कि किसी भी नागरिक को धोखे से उसकी संपत्ति के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता। जो व्यक्ति खुद जमीन का सह-मालिक (हिस्सेदार) है, वह उसी भूमि पर अपने ही भाई-बंधुओं या दूसरे सह-मालिकों के नीचे किरायेदार या काश्तकार कैसे हो सकता है? कागजों की ऐसी पुरानी गलतियों के भरोसे किसी को असली मालिकों का हक मारने की इजाजत नहीं दी जा सकती। प्रतिवादियों का दावा पूरी तरह गलत है। करीब 11 साल तक चली इस लंबी कानूनी लड़ाई को खत्म करते हुए कोर्ट ने भूमि अधिग्रहण अधिकारी को सीधे निर्देश दिए हैं कि बैंक में जमा 94 लाख की मूल रकम और उस पर पिछले 11 साल में जितना भी बैंक का ब्याज बना है, वह सब जोड़कर सभी असली हिस्सेदारों को उनके खानदानी शेयर के हिसाब से तुरंत बांटा जाए। इस लंबी लड़ाई के दौरान जिन बुजुर्ग हिस्सेदारों की मौत हो चुकी है, उनका पैसा रोकने के बजाय उनके बच्चों या कानूनी वारिसों को उनके पहचान-पत्र देखकर दिया जाएगा। केवल काश्तकारी या खेती करने के दम पर पूरा पैसा अकेले हजम करने का दावा कोर्ट ने पूरी तरह से खारिज कर दिया है।
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