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Bilaspur News: जिले में 36 हजार वन क्षेत्र में से 26 हजार हेक्टेयर संवेदनशील
संवाद न्यूज एजेंसी, बिलासपुर
Updated Fri, 01 May 2026 11:48 PM IST
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गर्मी बढ़ते ही जंगलों की आग से निपटने को वन विभाग अलर्ट
डिवीजन से लेकर सातों रेंज में कंट्रोल रूम सक्रिय
गांव-गांव चलाया जा रहा जागरूकता अभियान
दुर्गम इलाकों में मानवीय रूप में बुझानी पड़ती है आग
संवाद न्यूज एजेंसी
बिलासपुर। गर्मी का मौसम शुरू होते ही जंगलों में आग लगने की घटनाओं की आशंका बढ़ गई है। इसे देखते हुए वन विभाग ने पूरे डिवीजन में फायर सीजन को लेकर तैयारियां तेज कर दी हैं। विभाग की ओर से कंट्रोल सिस्टम को मजबूत करने के साथ आम लोगों को जागरूक करने पर विशेष जोर दिया जा रहा है, ताकि आग की घटनाओं को शुरुआती स्तर पर ही रोका जा सके।
फॉरेस्ट फायर से प्रभावी तरीके से निपटने के लिए डिवीजन स्तर पर कंट्रोल रूम स्थापित किया गया है। इसके साथ ही डिवीजन की सभी सात रेंज में भी अलग-अलग कंट्रोल रूम बनाए गए हैं, जो 24 घंटे निगरानी में लगे रहते हैं। किसी भी स्थान से आग की सूचना मिलने पर तुरंत संबंधित टीम को अलर्ट कर मौके पर भेजा जाता है। आग की घटनाओं को रोकने के लिए केवल विभागीय प्रयास ही पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि इसमें आम जनता की भूमिका भी बेहद अहम है। इसी उद्देश्य से विभाग स्कूलों, पंचायतों और ग्रामीण क्षेत्रों में लगातार जागरूकता अभियान चला रहा है। लोगों के साथ बैठक आयोजित की जा रही हैं, उन्हें आग लगने के कारणों और बचाव के तरीकों के बारे में जानकारी दी जा रही है। साथ ही पर्चें वितरित कर लोगों को सतर्क रहने के लिए प्रेरित किया जा रहा है। जिन क्षेत्रों में आग लगने की संभावना अधिक रहती है, वहां फायर लाइनों का निर्माण किया गया है। इसके अलावा कंट्रोल बर्निंग जैसी वैज्ञानिक विधियों का उपयोग भी किया जा रहा है, ताकि सूखी घास और पत्तियों को पहले ही नियंत्रित तरीके से हटाकर आग फैलने की आशंका को कम किया जा सके।
जंगलों में आग बुझाने के दौरान सबसे बड़ी चुनौती दुर्गम क्षेत्रों की होती है। फायर ब्रिगेड की गाड़ियां केवल सड़क किनारे तक ही पहुंच पाती हैं और उनके पाइप भी करीब 500 से 700 मीटर तक ही प्रभावी रहते हैं। इसके बाद के क्षेत्रों में कर्मचारियों को पैदल पहुंचकर मैन्युअल तरीके से आग पर काबू पाना पड़ता है, जो जोखिम भरा और समय लेने वाला कार्य होता है। वन विभाग ने फायर सीजन को देखते हुए मैनपावर की भी उचित व्यवस्था की है। विभाग के पास वन रक्षक और वन मित्र उपलब्ध हैं, जो नियमित रूप से निगरानी कर रहे हैं। इसके अलावा प्रत्येक ब्लॉक में एक से दो फायर वाचर तैनात किए गए हैं। पूरे डिवीजन में करीब 20 से 25 फायर वाचर लगाए गए हैं, जिन्हें जरूरत के अनुसार संवेदनशील क्षेत्रों में भेजा जाता है। डीएफओ राजीव कुमार ने बताया कि जिले में लगभग 590 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में करीब 36 हजार हेक्टेयर क्षेत्र वन क्षेत्र के अंतर्गत आता है। इसमें से करीब 25 से 26 हजार हेक्टेयर क्षेत्र ऐसा है, जहां आग लगने की संभावना अधिक रहती है। खासतौर पर चीड़ के जंगल और सूखी झाड़ियों वाले इलाके आग के लिहाज से सबसे ज्यादा संवेदनशील माने जाते हैं।
बताया कि विभाग लगातार निगरानी बनाए हुए है और समय-समय पर जागरूकता शिविर आयोजित किए जा रहे हैं। साथ ही लोगों से अपील की जा रही है कि वे जंगलों में आग लगाने जैसी गतिविधियों से बचें और कहीं भी आग की घटना दिखने पर तुरंत विभाग को सूचित करें। कहा कि प्रशासन और आम जनता के संयुक्त प्रयासों से ही जंगलों को आग जैसी आपदाओं से सुरक्षित रखा जा सकता है।
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डिवीजन से लेकर सातों रेंज में कंट्रोल रूम सक्रिय
गांव-गांव चलाया जा रहा जागरूकता अभियान
दुर्गम इलाकों में मानवीय रूप में बुझानी पड़ती है आग
संवाद न्यूज एजेंसी
बिलासपुर। गर्मी का मौसम शुरू होते ही जंगलों में आग लगने की घटनाओं की आशंका बढ़ गई है। इसे देखते हुए वन विभाग ने पूरे डिवीजन में फायर सीजन को लेकर तैयारियां तेज कर दी हैं। विभाग की ओर से कंट्रोल सिस्टम को मजबूत करने के साथ आम लोगों को जागरूक करने पर विशेष जोर दिया जा रहा है, ताकि आग की घटनाओं को शुरुआती स्तर पर ही रोका जा सके।
फॉरेस्ट फायर से प्रभावी तरीके से निपटने के लिए डिवीजन स्तर पर कंट्रोल रूम स्थापित किया गया है। इसके साथ ही डिवीजन की सभी सात रेंज में भी अलग-अलग कंट्रोल रूम बनाए गए हैं, जो 24 घंटे निगरानी में लगे रहते हैं। किसी भी स्थान से आग की सूचना मिलने पर तुरंत संबंधित टीम को अलर्ट कर मौके पर भेजा जाता है। आग की घटनाओं को रोकने के लिए केवल विभागीय प्रयास ही पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि इसमें आम जनता की भूमिका भी बेहद अहम है। इसी उद्देश्य से विभाग स्कूलों, पंचायतों और ग्रामीण क्षेत्रों में लगातार जागरूकता अभियान चला रहा है। लोगों के साथ बैठक आयोजित की जा रही हैं, उन्हें आग लगने के कारणों और बचाव के तरीकों के बारे में जानकारी दी जा रही है। साथ ही पर्चें वितरित कर लोगों को सतर्क रहने के लिए प्रेरित किया जा रहा है। जिन क्षेत्रों में आग लगने की संभावना अधिक रहती है, वहां फायर लाइनों का निर्माण किया गया है। इसके अलावा कंट्रोल बर्निंग जैसी वैज्ञानिक विधियों का उपयोग भी किया जा रहा है, ताकि सूखी घास और पत्तियों को पहले ही नियंत्रित तरीके से हटाकर आग फैलने की आशंका को कम किया जा सके।
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जंगलों में आग बुझाने के दौरान सबसे बड़ी चुनौती दुर्गम क्षेत्रों की होती है। फायर ब्रिगेड की गाड़ियां केवल सड़क किनारे तक ही पहुंच पाती हैं और उनके पाइप भी करीब 500 से 700 मीटर तक ही प्रभावी रहते हैं। इसके बाद के क्षेत्रों में कर्मचारियों को पैदल पहुंचकर मैन्युअल तरीके से आग पर काबू पाना पड़ता है, जो जोखिम भरा और समय लेने वाला कार्य होता है। वन विभाग ने फायर सीजन को देखते हुए मैनपावर की भी उचित व्यवस्था की है। विभाग के पास वन रक्षक और वन मित्र उपलब्ध हैं, जो नियमित रूप से निगरानी कर रहे हैं। इसके अलावा प्रत्येक ब्लॉक में एक से दो फायर वाचर तैनात किए गए हैं। पूरे डिवीजन में करीब 20 से 25 फायर वाचर लगाए गए हैं, जिन्हें जरूरत के अनुसार संवेदनशील क्षेत्रों में भेजा जाता है। डीएफओ राजीव कुमार ने बताया कि जिले में लगभग 590 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में करीब 36 हजार हेक्टेयर क्षेत्र वन क्षेत्र के अंतर्गत आता है। इसमें से करीब 25 से 26 हजार हेक्टेयर क्षेत्र ऐसा है, जहां आग लगने की संभावना अधिक रहती है। खासतौर पर चीड़ के जंगल और सूखी झाड़ियों वाले इलाके आग के लिहाज से सबसे ज्यादा संवेदनशील माने जाते हैं।
बताया कि विभाग लगातार निगरानी बनाए हुए है और समय-समय पर जागरूकता शिविर आयोजित किए जा रहे हैं। साथ ही लोगों से अपील की जा रही है कि वे जंगलों में आग लगाने जैसी गतिविधियों से बचें और कहीं भी आग की घटना दिखने पर तुरंत विभाग को सूचित करें। कहा कि प्रशासन और आम जनता के संयुक्त प्रयासों से ही जंगलों को आग जैसी आपदाओं से सुरक्षित रखा जा सकता है।
