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RLA Bilaspur Scam: बामटा और जुखाला के व्यक्ति के नाम पर किया था गाड़ियों का फर्जी पंजीकरण, जानें विस्तार से

संवाद न्यूज एजेंसी, बिलासपुर। Published by: अंकेश डोगरा Updated Thu, 29 Jan 2026 06:00 AM IST
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सार

आरएलए बिलासपुर वाहन चोरी और फर्जी पंजीकरण मामले में दो गाड़ियों का पंजीकरण बामटा और जुखाला निवासी के नाम और पते पर किया गया था। पढ़ें पूरी खबर...

RLA Bilaspur Scam Vehicles were fraudulently registered in the names of individuals from Bamta and Jukhala
आरएलए बिलासपुर। - फोटो : अमर उजाला नेटवर्क
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विस्तार
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दिल्ली क्राइम ब्रांच की इंटर स्टेट सेल की ओर से दर्ज एक बड़े अंतरराज्यीय वाहन चोरी और फर्जी पंजीकरण मामले में बिलासपुर आरएलए से पंजीकृत दो टोयोटा फॉर्च्यूनर एसयूवी वाहनों को वर्ष 2024 में आरएलए से पंजीकरण संख्या एचपी-24इ-4948 और एचपी-24इ-3974 जारी की गई थी, वही वाहन वर्ष 2025 में दिल्ली में दर्ज चोरी के मामलों की जांच के दौरान बरामद किए गए। दोनों गाड़ियों का पंजीकरण बामटा और जुखाला निवासी के नाम और पते पर किया गया था। हालांकि अभी यह भी तय नहीं है कि इस नाम पता के व्यक्ति हैं भी या वो भी फर्जी हैं।

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अभी तक की जांच के अनुसार ये दोनों गाड़ियां गिरोह द्वारा पूरी तरह वैध बताकर दिल्ली के ग्राहकों को बेची गई थीं। बाद में जब वाहन चोरी के मामलों की जांच आगे बढ़ी, तो इनके वर्तमान मालिकों को निर्देश जारी कर गाड़ियों को इंटर स्टेट सेल चाणक्यपुरी, नई दिल्ली में पेश कराया गया। जांच में यह सामने आया है कि टोयोटा फॉर्च्यूनर वाहन संख्या एचपी-24इ-3974 का पंजीकरण 29 अगस्त 2024 को मोहम्मद नदीम सैफी पुत्र निजामुद्दीन सैफी, निवासी ग्राम व डाकघर बामटा, तहसील सदर, जिला बिलासपुर के नाम पर किया गया था। वहीं टोयोटा फॉर्च्यूनर वाहन संख्या एचपी-24इ-4948 का पंजीकरण 07 अगस्त 2024 को मनोज कुमार पुत्र मस्त राम, निवासी ग्राम व डाकघर जुखाला, तहसील सदर, जिला बिलासपुर के नाम पर दर्ज पाया गया।
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वहीं अभी तक इन नामों पर दर्ज व्यक्तियों की वास्तविक भूमिका और पहचान की पुष्टि अभी नहीं हो पाई है, और इस पहलू पर जांच जारी है। जांच में जिन दो नामों का खुलासा हुआ है कि मोहम्मद नदीम सैफी और मनोज कुमार ये रिकॉर्ड के अनुसार इन गाड़ियों के प्रथम मालिक हैं। इनका काम सिर्फ गाड़ी को पहली बार आरएलए बिलासपुर में रजिस्टर करवाना था। गिरोह ने इनके दस्तावेजों का इस्तेमाल किया ताकि चोरी की गाड़ी को पहली बार सरकारी सिस्टम (वाहन पोर्टल) में चढ़ाया जा सके। अक्सर ये लोग या तो गिरोह के सदस्य होते हैं या फिर बहुत ही गरीब लोग जिन्हें चंद पैसों का लालच देकर उनके नाम पर गाड़ियां रजिस्टर करा दी जाती हैं।

जांच में जिक्र है कि ये गाड़ियां बाद में दिल्ली के ग्राहकों को बेची गईं। ये ग्राहक कागजों पर द्वितीय मालिक बने। ये वे आम लोग हैं जिन्होंने दमनदीप लकी के जालंधर वाले शोरूम या किसी विज्ञापन के जरिए गाड़ी खरीदी। इन्हें गाड़ी के फर्स्ट ओनर नदीम या मनोज के नाम वाले कागजात दिखाए गए और यह यकीन दिलाया गया कि गाड़ी पूरी तरह लीगल है। इसके बाद गाड़ी इनके नाम ट्रांसफर कर दी गई।

जब पुलिस ने जांच की, तो इन द्वितीय मालिकों से गाड़ियां जब्त कर ली गईं। अब इनके पास न गाड़ी बची और न ही इनके पैसे वापस मिले। सिंडिकेट ने सीधे चोरी की गाड़ी ग्राहक को नहीं बेची, बल्कि पहले उसे एक प्रथम मालिक के नाम पर रजिस्टर कराया। इसके पीछे दो बड़े कारण थे। सीधे चोरी की गाड़ी बेचना मुश्किल है। लेकिन अगर गाड़ी एक बार आरएलए बिलासपुर से किसी के नाम पर रजिस्टर हो गई, तो खरीदार को लगता है कि सरकारी रिकॉर्ड (आरसी) सही है। जब गाड़ी सेकंड ओनर को ट्रांसफर होती है, तो अक्सर पुराने दस्तावेजों की उतनी गहराई से जांच नहीं होती जितनी फ्रेश रजिस्ट्रेशन के वक्त होती है। क्राइम ब्रांच द्वारा कराई गई भौतिक और फॉरेंसिक जांच में यह स्पष्ट हुआ कि दोनों फॉर्च्यूनर एसयूवी के चेसिस नंबरों के साथ जानबूझकर छेड़छाड़ की गई थी।

जांच में पाया गया कि गाड़ियों के असली पहचान चिन्हों को मिटाया गया था, ताकि यह पता न चल सके कि ये वाहन मूल रूप से कहां से चोरी हुए थे। यह छेड़छाड़ किसी तकनीकी त्रुटि का परिणाम नहीं, बल्कि चोरी की पहचान छुपाने के उद्देश्य से की गई सोची-समझी कार्रवाई थी। इस मामले के सामने आने के बाद पंजीकरण प्रक्रिया और जांच प्रणाली पर भी सवाल उठने लगे हैं। बामटा पंचायत के प्रधान विक्रम ठाकुर ने कहा कि उनकी पंचायत में इस तरह का कोई भी व्यक्ति नहीं है, जिसके नाम पर पंजीकरण हुआ है। लेकिन फिर भी वो इसकी जांच करेंगे। वहीं जुखाला से संबंधित नाम की भी पुष्टि नहीं हो पाई है।
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