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Chamba News: सैलाब तो थमा, पर चक्की नहीं चली, एक साल से मलबे में दबे तीन घराट
Wed, 19 Aug 2026 11:00 PM IST
शिमला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, चम्बा
संवाद न्यूज एजेंसी, चम्बा
Updated Wed, 19 Aug 2026 11:00 PM IST
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मैहला के उपलेडी खड्ड में मिट्टी में दबा घराट : ग्राउंड रिपोर्ट के साथ
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उपलेड़ी खड्ड की बाढ़ ने बहा दिए तीन पारंपरिक घराट, अब गेहूं पिसवाने के लिए लग रही लंबी दौड़
आपदा के एक साल बाद भी घराटों की नहीं हुई बहाली
संवाद न्यूज एजेंसी
मैहला (चंबा)। एक साल पहले खड्ड में आया सैलाब तीन घराट बहा ले गया लेकिन ग्रामीणों की परेशानी का सैलाब आज भी थमा नहीं है।
उपलेड़ी खड्ड में आपदा के बाद मलबे में दबे घराट अब सिर्फ बीते नुकसान की निशानी नहीं, बल्कि रोजमर्रा की बढ़ी मुश्किलों की वजह बन गए हैं। जहां कभी घर से कुछ कदम दूर पानी की ताकत से गेहूं पिस जाता था, वहां अब ग्रामीणों को अनाज लेकर तीन किलोमीटर का सफर तय करना पड़ रहा है। बुजुर्गों और बिना वाहन वाले परिवारों के लिए यह दूरी और भी भारी पड़ रही है। घराटों की बहाली के आश्वासन के बावजूद एक साल में न निरीक्षण हुआ और न काम आगे बढ़ा। आपदा गुजर गई, मगर ग्रामीणों की चक्की अब भी ठप है।
ग्रामीणों को उम्मीद थी कि प्रशासन नुकसान का निरीक्षण करवाकर इन्हें दोबारा बहाल करवाएगा लेकिन लंबा समय बीतने के बाद भी यह उम्मीद पूरी नहीं हुई। घराट बहने के बाद अब क्षेत्र के लोगों को अनाज पिसवाने के लिए करीब तीन किलोमीटर दूर जाना पड़ रहा है। पहले घर के नजदीक ही खड्ड के पानी से घराट चलने के कारण ग्रामीणों को आसानी से गेंहू पिसवाने की सुविधा मिल जाती थी। बीडीओ मैहला बशीर खान ने कहा कि उन्हें इस मामले की जानकारी नहीं है। पंचायत की ओर से यदि इस संबंध में प्रस्ताव दिया जाता है तो उसे आगे बढ़ाकर समस्या का समाधान करवाने का प्रयास किया जाएगा।
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एक साल बाद भी न तो मौके पर निरीक्षण हुआ और न ही घराटों की बहाली को लेकर कोई ठोस पहल सामने आई। मामला रिपोर्ट और आश्वासन तक ही सीमित रह गया। - मुकेश कुमार
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आपदा में हमारे घराट बह गए। पहले यहीं अनाज पिस जाता था लेकिन अब तीन किलोमीटर दूर जाना पड़ता है। एक साल से इंतजार कर रहे हैं कि प्रशासन कुछ करेगा। - विकास कुमार
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बीडीओ मैहला कार्यालय को भी बताया था। निरीक्षण का आश्वासन मिला था लेकिन आज तक मौके पर कोई नहीं आया। ग्रामीणों की समस्या को गंभीरता से लिया जाना चाहिए। - मुकेश कुमार
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घराट बंद होने से सबसे ज्यादा परेशानी बुजुर्गों और उन परिवारों को है जिनके पास अपना वाहन नहीं है। गेहूं पिसवाने के लिए दूर जाना पड़ता है। अतिरिक्त खर्च भी उठाना पड़ता है। - संजय कुमार
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आपदा के एक साल बाद भी घराटों की नहीं हुई बहाली
संवाद न्यूज एजेंसी
मैहला (चंबा)। एक साल पहले खड्ड में आया सैलाब तीन घराट बहा ले गया लेकिन ग्रामीणों की परेशानी का सैलाब आज भी थमा नहीं है।
उपलेड़ी खड्ड में आपदा के बाद मलबे में दबे घराट अब सिर्फ बीते नुकसान की निशानी नहीं, बल्कि रोजमर्रा की बढ़ी मुश्किलों की वजह बन गए हैं। जहां कभी घर से कुछ कदम दूर पानी की ताकत से गेहूं पिस जाता था, वहां अब ग्रामीणों को अनाज लेकर तीन किलोमीटर का सफर तय करना पड़ रहा है। बुजुर्गों और बिना वाहन वाले परिवारों के लिए यह दूरी और भी भारी पड़ रही है। घराटों की बहाली के आश्वासन के बावजूद एक साल में न निरीक्षण हुआ और न काम आगे बढ़ा। आपदा गुजर गई, मगर ग्रामीणों की चक्की अब भी ठप है।
ग्रामीणों को उम्मीद थी कि प्रशासन नुकसान का निरीक्षण करवाकर इन्हें दोबारा बहाल करवाएगा लेकिन लंबा समय बीतने के बाद भी यह उम्मीद पूरी नहीं हुई। घराट बहने के बाद अब क्षेत्र के लोगों को अनाज पिसवाने के लिए करीब तीन किलोमीटर दूर जाना पड़ रहा है। पहले घर के नजदीक ही खड्ड के पानी से घराट चलने के कारण ग्रामीणों को आसानी से गेंहू पिसवाने की सुविधा मिल जाती थी। बीडीओ मैहला बशीर खान ने कहा कि उन्हें इस मामले की जानकारी नहीं है। पंचायत की ओर से यदि इस संबंध में प्रस्ताव दिया जाता है तो उसे आगे बढ़ाकर समस्या का समाधान करवाने का प्रयास किया जाएगा।
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एक साल बाद भी न तो मौके पर निरीक्षण हुआ और न ही घराटों की बहाली को लेकर कोई ठोस पहल सामने आई। मामला रिपोर्ट और आश्वासन तक ही सीमित रह गया। - मुकेश कुमार
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आपदा में हमारे घराट बह गए। पहले यहीं अनाज पिस जाता था लेकिन अब तीन किलोमीटर दूर जाना पड़ता है। एक साल से इंतजार कर रहे हैं कि प्रशासन कुछ करेगा। - विकास कुमार
बीडीओ मैहला कार्यालय को भी बताया था। निरीक्षण का आश्वासन मिला था लेकिन आज तक मौके पर कोई नहीं आया। ग्रामीणों की समस्या को गंभीरता से लिया जाना चाहिए। - मुकेश कुमार
घराट बंद होने से सबसे ज्यादा परेशानी बुजुर्गों और उन परिवारों को है जिनके पास अपना वाहन नहीं है। गेहूं पिसवाने के लिए दूर जाना पड़ता है। अतिरिक्त खर्च भी उठाना पड़ता है। - संजय कुमार