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Chamba News: परंपरा के साथ हुनर के हाथों खोला रोजगार का द्वार
संवाद न्यूज एजेंसी, चम्बा
Updated Mon, 02 Feb 2026 10:53 PM IST
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लुआंचडी पहने रुमना। संवाद
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चंबा। हिम्मत, मेहनत और आत्मनिर्भरता की मिसाल बनी ग्राम पंचायत गुवाड़ के जजरेड़ गांव की रुमना ने साबित कर दिया कि अगर इरादे मजबूत हों तो हालात भी रास्ता दे देते हैं। 20 वर्ष की उम्र में पारंपरिक चंबियाली परिधान लुआंचड़ी की सिलाई-कढ़ाई में महारत हासिल कर उन्होंने न सिर्फ अपनी पहचान बनाई बल्कि परिवार को आर्थिक तौर पर मजबूती देने में भी अहम योगदान दे रही हैं।
तीन बहनों प्रीतमा, पिंकी और मीना की शादी करने के बाद किसान पिता सरनो की आर्थिक हालत को देख चंबा कॉलेज से ग्रेजुएशन करने वाली रुमना ने घर बैठने की जगह कपड़े सिलने का काम सीखा। शहर के साथ लगते ओबड़ी मोहल्ला स्थित मशहूर दर्जी किशोरी लाल से उन्होंने लुआंचड़ी का प्रशिक्षण अर्जित किया।
इस दौरान कई बार लुआंचड़ी सही से तैयार न होने पर गुरु की डांट भी मिली, लेकिन काम सीखने की ललक और बल मेहनत करते हुए उन्होंने चार माह में लुआंचड़ी बनाना सीख लिया। अब उनकी बनाई लुआंचड़ी की शहर में मांग है और लोग पहले ही इसकी बुकिंग करवाने पहुंच जाते हैं।
रुमना ने बताया कि लुआंचड़ी बनाने में एक से दो दिन का समय लगता है। इसकी कीमत 4,500 से लेकर 7,000 रुपये तक है। कपड़ा समेत अन्य सामान कर खरीद कर देने पर कुछ अदद रियायत रहती है। वह अब तक 7,000 रुपये की कई लुआंचड़ी परिधान बेच चुकी हैं।
उन्होंने बताया कि उनकी माता नीता एक कुशल गृहिणी हैं। अब उनके छोटे भाई का चयन भारतीय सेना में हो गया है। अब दोनों भाई-बहन किसान पिता का सहारा बनें हैं। उन्होंने परिवार की किसी न किसी तरीके से मदद करने की सोच लिए पढ़ाई के बाद पारंपरिक कपड़े सिलने का काम आरंभ किया था। यह व्यवसाय अब उनकी पहचान बन चुका है।
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तीन बहनों प्रीतमा, पिंकी और मीना की शादी करने के बाद किसान पिता सरनो की आर्थिक हालत को देख चंबा कॉलेज से ग्रेजुएशन करने वाली रुमना ने घर बैठने की जगह कपड़े सिलने का काम सीखा। शहर के साथ लगते ओबड़ी मोहल्ला स्थित मशहूर दर्जी किशोरी लाल से उन्होंने लुआंचड़ी का प्रशिक्षण अर्जित किया।
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इस दौरान कई बार लुआंचड़ी सही से तैयार न होने पर गुरु की डांट भी मिली, लेकिन काम सीखने की ललक और बल मेहनत करते हुए उन्होंने चार माह में लुआंचड़ी बनाना सीख लिया। अब उनकी बनाई लुआंचड़ी की शहर में मांग है और लोग पहले ही इसकी बुकिंग करवाने पहुंच जाते हैं।
रुमना ने बताया कि लुआंचड़ी बनाने में एक से दो दिन का समय लगता है। इसकी कीमत 4,500 से लेकर 7,000 रुपये तक है। कपड़ा समेत अन्य सामान कर खरीद कर देने पर कुछ अदद रियायत रहती है। वह अब तक 7,000 रुपये की कई लुआंचड़ी परिधान बेच चुकी हैं।
उन्होंने बताया कि उनकी माता नीता एक कुशल गृहिणी हैं। अब उनके छोटे भाई का चयन भारतीय सेना में हो गया है। अब दोनों भाई-बहन किसान पिता का सहारा बनें हैं। उन्होंने परिवार की किसी न किसी तरीके से मदद करने की सोच लिए पढ़ाई के बाद पारंपरिक कपड़े सिलने का काम आरंभ किया था। यह व्यवसाय अब उनकी पहचान बन चुका है।
