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Hamirpur (Himachal) News: वन अधिकार के दावे में बड़ा खुलासा, जांच में एफआरसी के ही 11 सदस्य निकले आवेदक
Thu, 06 Aug 2026 12:54 AM IST
शिमला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, हमीरपुर (हि. प्र.)
संवाद न्यूज एजेंसी, हमीरपुर (हि. प्र.)
Updated Thu, 06 Aug 2026 12:54 AM IST
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हमीरपुर। वन अधिकार अधिनियम (एफआरए) के तहत व्यक्तिगत वन अधिकार पाने के लिए सुजानपुर उपमंडल से किए गए सभी 13 दावों को जिला स्तरीय समिति (डीएलसी) ने खारिज कर दिया है। जांच में सबसे चौंकाने वाला तथ्य यह सामने आया कि 13 में से 11 दावा करने वाले स्वयं वन अधिकार समिति (एफआरसी) के सदस्य थे।
हालांकि, अधिनियम के तहत एफआरसी का सदस्य होने से किसी व्यक्ति के व्यक्तिगत वन अधिकार का दावा करने पर रोक नहीं है, लेकिन अपने ही दावे की जांच, सत्यापन और निर्णय प्रक्रिया से उसे अलग रहना अनिवार्य होता है। ऐसे में एफआरसी गठन और निगरानी तंत्र भी सवालों में घेरे में आ गया है।
जांच में अधिकांश आवेदन अधिनियम में निर्धारित पात्रता और दस्तावेजी साक्ष्य की कसौटी पर भी खरे नहीं उतर सके। इसके चलते जिला स्तरीय समिति ने सभी दावे निरस्त कर दिए। वन अधिकार अधिनियम, 2006 के तहत व्यक्तिगत वन अधिकार केवल उन्हीं पात्र परिवारों को दिया जा सकता है, जिनका 13 दिसंबर 2005 या उससे पहले से वन भूमि पर कब्जा या आजीविका के लिए वास्तविक उपयोग रहा हो।
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अन्य पारंपरिक वन निवासियों के लिए कम से कम तीन पीढ़ियों (75 वर्ष) से उस क्षेत्र में निवास का प्रमाण देना भी अनिवार्य है। एक परिवार को अधिकतम चार हेक्टेयर तक भूमि का अधिकार मिल सकता है, जिसे बेचा नहीं जा सकता और उसका उपयोग केवल आजीविका व स्वयं की खेती के लिए ही किया जा सकता है।
सूत्रों के अनुसार सुजानपुर से आए अधिकांश दावों में 13 दिसंबर 2005 से पहले के कब्जे, तीन पीढ़ियों के निवास और अन्य आवश्यक दस्तावेजों के पर्याप्त प्रमाण प्रस्तुत नहीं किए जा सके। जांच के दौरान संबंधित भूमि वन विभाग के रिकॉर्ड में दर्ज मिलने से भी दावे कमजोर पाए गए।
एक साथ बड़ी संख्या में एफआरसी सदस्यों के ही आवेदनकर्ता होने से प्रक्रिया को लेकर सवाल जरूर उठे हैं, हालांकि नियमों के अनुसार यदि कोई सदस्य स्वयं दावा करता है तो उसे अपने मामले की जांच और निर्णय प्रक्रिया से पूरी तरह अलग रहना होता है, ताकि हितों का टकराव न हो।
द्वितीय विश्व युद्ध के समय मिले अधिकार का दावा भी नहीं हुआ साबित
आवेदनकर्ताओं ने दावा किया था कि द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान उन्हें इस भूमि पर अधिकार मिले थे, लेकिन इसके समर्थन में कोई वैध दस्तावेज प्रस्तुत नहीं कर सके। जांच के दौरान उपलब्ध राजस्व अभिलेखों में वर्ष 1945 से भूमि का वर्गीकरण वन भूमि के रूप में दर्ज पाया गया। ऐसे में दावा किए गए उपभोग अधिकारों की पुष्टि नहीं हो सकी और समिति ने इन दावों को भी स्वीकार नहीं किया।
कोट
सुजानपुर से प्राप्त व्यक्तिगत वन अधिकार के सभी 13 दावे खारिज किए गए हैं। कुछ आवेदनकर्ता वन अधिकार समिति के सदस्य भी हैं। सदस्य होने से दावा करने पर कोई रोक नहीं है, लेकिन सभी मामलों में आवश्यक दस्तावेज और कानूनी शर्तें पूरी नहीं मिलीं। इसी कारण सभी दावे निरस्त किए गए हैं। -विकास शुक्ला, एसडीएम, सुजानपुर
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हालांकि, अधिनियम के तहत एफआरसी का सदस्य होने से किसी व्यक्ति के व्यक्तिगत वन अधिकार का दावा करने पर रोक नहीं है, लेकिन अपने ही दावे की जांच, सत्यापन और निर्णय प्रक्रिया से उसे अलग रहना अनिवार्य होता है। ऐसे में एफआरसी गठन और निगरानी तंत्र भी सवालों में घेरे में आ गया है।
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जांच में अधिकांश आवेदन अधिनियम में निर्धारित पात्रता और दस्तावेजी साक्ष्य की कसौटी पर भी खरे नहीं उतर सके। इसके चलते जिला स्तरीय समिति ने सभी दावे निरस्त कर दिए। वन अधिकार अधिनियम, 2006 के तहत व्यक्तिगत वन अधिकार केवल उन्हीं पात्र परिवारों को दिया जा सकता है, जिनका 13 दिसंबर 2005 या उससे पहले से वन भूमि पर कब्जा या आजीविका के लिए वास्तविक उपयोग रहा हो।
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अन्य पारंपरिक वन निवासियों के लिए कम से कम तीन पीढ़ियों (75 वर्ष) से उस क्षेत्र में निवास का प्रमाण देना भी अनिवार्य है। एक परिवार को अधिकतम चार हेक्टेयर तक भूमि का अधिकार मिल सकता है, जिसे बेचा नहीं जा सकता और उसका उपयोग केवल आजीविका व स्वयं की खेती के लिए ही किया जा सकता है।
सूत्रों के अनुसार सुजानपुर से आए अधिकांश दावों में 13 दिसंबर 2005 से पहले के कब्जे, तीन पीढ़ियों के निवास और अन्य आवश्यक दस्तावेजों के पर्याप्त प्रमाण प्रस्तुत नहीं किए जा सके। जांच के दौरान संबंधित भूमि वन विभाग के रिकॉर्ड में दर्ज मिलने से भी दावे कमजोर पाए गए।
एक साथ बड़ी संख्या में एफआरसी सदस्यों के ही आवेदनकर्ता होने से प्रक्रिया को लेकर सवाल जरूर उठे हैं, हालांकि नियमों के अनुसार यदि कोई सदस्य स्वयं दावा करता है तो उसे अपने मामले की जांच और निर्णय प्रक्रिया से पूरी तरह अलग रहना होता है, ताकि हितों का टकराव न हो।
द्वितीय विश्व युद्ध के समय मिले अधिकार का दावा भी नहीं हुआ साबित
आवेदनकर्ताओं ने दावा किया था कि द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान उन्हें इस भूमि पर अधिकार मिले थे, लेकिन इसके समर्थन में कोई वैध दस्तावेज प्रस्तुत नहीं कर सके। जांच के दौरान उपलब्ध राजस्व अभिलेखों में वर्ष 1945 से भूमि का वर्गीकरण वन भूमि के रूप में दर्ज पाया गया। ऐसे में दावा किए गए उपभोग अधिकारों की पुष्टि नहीं हो सकी और समिति ने इन दावों को भी स्वीकार नहीं किया।
कोट
सुजानपुर से प्राप्त व्यक्तिगत वन अधिकार के सभी 13 दावे खारिज किए गए हैं। कुछ आवेदनकर्ता वन अधिकार समिति के सदस्य भी हैं। सदस्य होने से दावा करने पर कोई रोक नहीं है, लेकिन सभी मामलों में आवश्यक दस्तावेज और कानूनी शर्तें पूरी नहीं मिलीं। इसी कारण सभी दावे निरस्त किए गए हैं। -विकास शुक्ला, एसडीएम, सुजानपुर