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बजट में विकास निवेश का संदेश, प्रावधान की कमी : अनिल

संवाद न्यूज एजेंसी, हमीरपुर (हि. प्र.) Updated Sun, 01 Feb 2026 11:14 PM IST
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हमीरपुर। केंद्रीय बजट 2026-27 का विश्लेषण करते राजकीय महाविद्यालय बड़सर के अर्थशास्त्र विषय के सहायक प्रोफेसर अनिल डोगरा ने कहा कि देश के लिए विकास और निवेश का संदेश देता है लेकिन हिमाचल प्रदेश जैसे सीमित संसाधनों और कठिन भौगोलिक परिस्थितियों वाले राज्य के लिए इसकी तस्वीर संतोषजनक नहीं दिखती। बजट में बड़े राष्ट्रीय आंकड़े जरूर सामने रखे गए हैं पर पहाड़ी राज्य की जमीनी जरूरतों के अनुरूप विशेष प्रावधानों की कमी साफ झलकती है।
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केंद्रीय बजट में कुल व्यय 53.47 लाख करोड़ रुपये रखा गया है। शिक्षा के लिए 1.39 लाख करोड़, स्वास्थ्य के लिए 1.04 लाख करोड़ और बुनियादी ढांचे के लिए 12.2 लाख करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। इसके बावजूद हिमाचल को मिलने वाला प्रत्यक्ष लाभ सीमित ही रहता है। राज्य की आय का लगभग 75 प्रतिशत हिस्सा केंद्र से मिलने वाले कर राजस्व और अनुदानों पर निर्भर है, लेकिन इसमें से औसतन केवल 36 प्रतिशत हिस्सा ही राज्य को मिल पाता है।
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वर्ष 2025-26 में हिमाचल का कुल वार्षिक व्यय करीब 34,000 करोड़ रुपये रहा, जबकि केंद्र से मिलने वाला अनुदान और कर हिस्सा लगभग 12,500 करोड़ रुपये तक सीमित रहा। स्थिति तब और चुनौतीपूर्ण हो जाती है जब कुल व्यय का 18 से 20 प्रतिशत हिस्सा केवल पुराने कर्ज के ब्याज भुगतान में खर्च हो जाता है। इससे विकास कार्यों के लिए उपलब्ध संसाधन और सिमट जाते हैं। इसका सीधा असर शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे अहम क्षेत्रों में दिखाई देता है।
राज्य ने शिक्षा पर अपने कुल व्यय का लगभग 18.9 प्रतिशत खर्च किया और स्वास्थ्य क्षेत्र में 3,481 करोड़ रुपये लगाए, लेकिन इसके बावजूद सरकारी स्कूलों में लगभग 40 प्रतिशत स्थानों पर डिजिटल शिक्षा की बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं। विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में 25 से 30 प्रतिशत पद रिक्त पड़े हैं। सड़क और बुनियादी ढांचे की स्थिति भी चिंता का विषय बनी हुई है। हिमाचल में सड़क निर्माण की प्रति किलोमीटर लागत 12 से 15 करोड़ रुपये तक पहुंच जाती है, जो मैदानी राज्यों की तुलना में कहीं अधिक है।
पिछले वर्ष 2,100 किलोमीटर ग्रामीण सड़कों का निर्माण किया गया, लेकिन केंद्रीय अनुदान में देरी के कारण कई परियोजनाएं अधूरी रह गईं।कुल मिलाकर, केंद्रीय बजट 2026-27 राष्ट्रीय स्तर पर संतुलन दिखाता है, लेकिन हिमाचल की विशिष्ट जरूरतों के अनुरूप इसमें ठोस और विशेष राहत का अभाव नजर आता है।
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