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अलग रह रही पत्नी और बच्चे को भरण-पोषण न देना भी घरेलू हिंसा : सीजेएम
Thu, 23 Jul 2026 06:37 AM IST
शिमला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, कांगड़ा
संवाद न्यूज एजेंसी, कांगड़ा
Updated Thu, 23 Jul 2026 06:37 AM IST
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धर्मशाला। मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी (सीजेएम) कांगड़ा डॉ. हकीकत ढांडा की अदालत ने घरेलू हिंसा से जुड़े मामले में बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने कहा है कि पति से अलग रह रही पत्नी और नाबालिग बच्चे को भरण-पोषण का खर्च न देना भी घरेलू हिंसा की श्रेणी में आता है।
अदालत ने महिला की ओर से दायर शिकायत को स्वीकार करते हुए पति को पत्नी और बेटे के भरण-पोषण के लिए हर महीने 6,000 रुपये देने के आदेश दिए हैं। इसके साथ ही अदालत ने पति को निर्देश दिया है कि वह पत्नी के रहने के लिए एक कमरा, शौचालय और स्नानघर की समुचित सुविधा उपलब्ध कराए।
अदालत में प्रस्तुत मामले के अनुसार धर्मशाला तहसील की पीड़िता का विवाह पांच अक्तूबर 2017 को शाहपुर तहसील के निवासी के साथ हुआ था। दंपती का एक पुत्र है। महिला का आरोप था कि शादी के कुछ समय बाद ही पति शराब और चरस का सेवन करने लगा। वह नशे के लिए पैसे मांगता था और मना करने पर शारीरिक व मानसिक रूप से प्रताड़ित करता था।
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महिला ने अदालत को बताया कि प्रताड़ना से तंग आकर महिला अपने मायके रहने को मजबूर हो गई। उसके पास आजीविका का कोई साधन नहीं है और पति भरण-पोषण का खर्च देने से इन्कार कर रहा है। सुनवाई के दौरान पति ने आरोपों से मुकरते हुए तर्क दिया कि कोविड के दौरान उसकी नौकरी चली गई थी और वह मनरेगा में मजदूरी करता है। उसने दावा किया कि पत्नी अपनी मर्जी से मायके गई है। हालांकि, दोनों पक्षों की दलीलें और साक्ष्य देखने के बाद अदालत ने माना कि महिला घरेलू हिंसा का शिकार हुई है।
अदालत ने आदेश जारी करते हुए कहा कि याचिका दायर करने की तिथि से प्रभावी मानते हुए पति अपनी पत्नी को 4,000 रुपये और नाबालिग बेटे को 2,000 रुपये प्रतिमाह गुजारा भत्ता देगा। यदि पूर्व में कोई अंतरिम राशि दी गई है तो उसे इस भुगतान में समायोजित किया जाएगा।
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अदालत ने महिला की ओर से दायर शिकायत को स्वीकार करते हुए पति को पत्नी और बेटे के भरण-पोषण के लिए हर महीने 6,000 रुपये देने के आदेश दिए हैं। इसके साथ ही अदालत ने पति को निर्देश दिया है कि वह पत्नी के रहने के लिए एक कमरा, शौचालय और स्नानघर की समुचित सुविधा उपलब्ध कराए।
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अदालत में प्रस्तुत मामले के अनुसार धर्मशाला तहसील की पीड़िता का विवाह पांच अक्तूबर 2017 को शाहपुर तहसील के निवासी के साथ हुआ था। दंपती का एक पुत्र है। महिला का आरोप था कि शादी के कुछ समय बाद ही पति शराब और चरस का सेवन करने लगा। वह नशे के लिए पैसे मांगता था और मना करने पर शारीरिक व मानसिक रूप से प्रताड़ित करता था।
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महिला ने अदालत को बताया कि प्रताड़ना से तंग आकर महिला अपने मायके रहने को मजबूर हो गई। उसके पास आजीविका का कोई साधन नहीं है और पति भरण-पोषण का खर्च देने से इन्कार कर रहा है। सुनवाई के दौरान पति ने आरोपों से मुकरते हुए तर्क दिया कि कोविड के दौरान उसकी नौकरी चली गई थी और वह मनरेगा में मजदूरी करता है। उसने दावा किया कि पत्नी अपनी मर्जी से मायके गई है। हालांकि, दोनों पक्षों की दलीलें और साक्ष्य देखने के बाद अदालत ने माना कि महिला घरेलू हिंसा का शिकार हुई है।
अदालत ने आदेश जारी करते हुए कहा कि याचिका दायर करने की तिथि से प्रभावी मानते हुए पति अपनी पत्नी को 4,000 रुपये और नाबालिग बेटे को 2,000 रुपये प्रतिमाह गुजारा भत्ता देगा। यदि पूर्व में कोई अंतरिम राशि दी गई है तो उसे इस भुगतान में समायोजित किया जाएगा।