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Kangra News: आम की बहार तो आई, पर फीकी पड़ी पापड़ की परंपरा
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धर्मशाला। कांगड़ा घाटी में इन दिनों देसी आमों की खुशबू बाग-बगीचों से लेकर घरों तक फैल रही है। पेड़ों पर लदे रसीले आम लोगों को बचपन के उन सुनहरे दिनों की याद दिला रहे हैं, जब बरसात के मौसम में घर में पारंपरिक आम पापड़ बनाया जाता था। हालांकि बागों में आम की बहार तो आ गई है, लेकिन घर के आंगन में आम पापड़ बनाने की परंपरा अब धीरे-धीरे फीकी पड़ती जा रही है।
कुछ दशक पहले आम का मौसम आने पर घर के आंगन में पूरा परिवार एक साथ बैठकर पके आमों का गूदा निकालता था। उसे कपड़ों या थालियों पर फैलाकर कई दिनों तक धूप में सुखाया जाता था। बच्चों के लिए यह किसी उत्सव से कम नहीं होता था। धूप में सूखते आम पापड़ की रखवाली से लेकर उसके तैयार होने का इंतजार पूरे परिवार को रहता था।
यह केवल एक खाद्य पदार्थ नहीं, बल्कि पारिवारिक एकता, लोक परंपरा और ग्रामीण जीवनशैली की पहचान भी था। समय बदलने के साथ अब संयुक्त परिवारों के बिखरने, धूप में घंटों मेहनत करने की घटती रुचि और बाजार में आसानी से मिलने वाले पैकेटबंद उत्पादों के कारण यह परंपरा तेजी से सिमट रही है। अब बहुत कम परिवार इस पारंपरिक विधि को जानते हैं और उसे अगली पीढ़ी तक पहुंचा रहे हैं।
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कांगड़ा में आम का मौजूदा मौसम केवल फलों का आनंद लेने का नहीं, बल्कि अपनी इस अनमोल विरासत को फिर से संजोने का अवसर है। मीनाक्षी, सपना, रेखा व सविता आदि ग्रामीण महिलाओं ने बाताय कि आम पापड़ केवल स्वाद का नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा है। आम का मौजूदा मौसम केवल फलों का आनंद लेने का नहीं, बल्कि अपनी विरासत को संजोने का भी अवसर है।
उन्होंने कहा कि यदि ऐसी पारंपरिक विधियों को बच्चों तक नहीं पहुंचाया गया तो आने वाले समय में वे केवल बुजुर्गों की यादों और किस्सों तक सीमित रह जाएंगी। परिवारों को फिर से घरों में आम पापड़ बनाने की परंपरा शुरू करनी चाहिए, ताकि बच्चों को प्राकृतिक स्वाद के साथ अपनी लोक संस्कृति से जुड़ने का मौका मिले।
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कुछ दशक पहले आम का मौसम आने पर घर के आंगन में पूरा परिवार एक साथ बैठकर पके आमों का गूदा निकालता था। उसे कपड़ों या थालियों पर फैलाकर कई दिनों तक धूप में सुखाया जाता था। बच्चों के लिए यह किसी उत्सव से कम नहीं होता था। धूप में सूखते आम पापड़ की रखवाली से लेकर उसके तैयार होने का इंतजार पूरे परिवार को रहता था।
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यह केवल एक खाद्य पदार्थ नहीं, बल्कि पारिवारिक एकता, लोक परंपरा और ग्रामीण जीवनशैली की पहचान भी था। समय बदलने के साथ अब संयुक्त परिवारों के बिखरने, धूप में घंटों मेहनत करने की घटती रुचि और बाजार में आसानी से मिलने वाले पैकेटबंद उत्पादों के कारण यह परंपरा तेजी से सिमट रही है। अब बहुत कम परिवार इस पारंपरिक विधि को जानते हैं और उसे अगली पीढ़ी तक पहुंचा रहे हैं।
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कांगड़ा में आम का मौजूदा मौसम केवल फलों का आनंद लेने का नहीं, बल्कि अपनी इस अनमोल विरासत को फिर से संजोने का अवसर है। मीनाक्षी, सपना, रेखा व सविता आदि ग्रामीण महिलाओं ने बाताय कि आम पापड़ केवल स्वाद का नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा है। आम का मौजूदा मौसम केवल फलों का आनंद लेने का नहीं, बल्कि अपनी विरासत को संजोने का भी अवसर है।
उन्होंने कहा कि यदि ऐसी पारंपरिक विधियों को बच्चों तक नहीं पहुंचाया गया तो आने वाले समय में वे केवल बुजुर्गों की यादों और किस्सों तक सीमित रह जाएंगी। परिवारों को फिर से घरों में आम पापड़ बनाने की परंपरा शुरू करनी चाहिए, ताकि बच्चों को प्राकृतिक स्वाद के साथ अपनी लोक संस्कृति से जुड़ने का मौका मिले।