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प्रोजेक्ट: गोबर-जूट की कुटीर में दस मिनट तक एकांत, ध्वनियां करेंगी मन शांत; आईआईटी में पेश किया प्रोटोटाइप

संवाद न्यूज एजेंसी, मंडी। Published by: Ankesh Dogra Updated Fri, 05 Jun 2026 11:17 AM IST
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सार

आईआईटी मंडी में गोबर और जूट से बनी एक विशेष ध्यान कुटीर का प्रोटोटाइप प्रदर्शित किया गया, जिसमें प्राकृतिक ध्वनियों और अरोमा थेरेपी के जरिए मानसिक तनाव कम करने का प्रयास किया जाता है। परियोजना का पूर्ण संस्करण जल्द बाजार में उतारे जाने की योजना है। पढ़ें पूरी खबर...

iit mandi cow dung jute meditation cottage sound therapy project
आईआईटी मंडी में पेश किया प्रोटोटाइप - फोटो : अमर उजाला नेटवर्क
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विस्तार

आधुनिक जीवन की भागदौड़, बढ़ता तनाव और मानसिक दबाव लोगों के लिए बड़ी चुनौती बनते जा रहे हैं। ऐसे माहौल में पुणे स्थित आई स्मार्ट लाइफ फाउंडेशन ने ध्यान कुटीर विकसित की है। आईआईटी मंडी में माइंड, ब्रेन एंड कॉन्शसनेस कॉन्फ्रेंस-2026 में इस प्रोजेक्च का प्रोटोटाइप प्रदर्शित किया गया, जिसने शोधकर्ताओं, वैज्ञानिकों और प्रतिभागियों का ध्यान अपनी ओर खींचा है। यह प्रोजेक्ट भावनाओं, मानसिक तनाव और चेतना पर ध्वनि एवं ध्यान के प्रभावों को समझने के उद्देश्य से विकसित किया जा रहा है।

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गोबर और जूट जैसी प्राकृतिक एवं पर्यावरण अनुकूल सामग्री से तैयार इस कुटीर को बनाया गया है। कुटीर के भीतर व्यक्ति को लगभग 10 मिनट तक एकांत में बैठाया जाता है। इस दौरान उसे विभिन्न प्राकृतिक ध्वनियां सुनाई जाती हैं, जिनमें समुद्र की लहरों की आवाज, पानी की बौछारों की ध्वनि, घंटियों और विभिन्न धातुओं से उत्पन्न कंपन शामिल हैं।
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इन ध्वनियों को विशेष आवृत्तियों के साथ संयोजित किया गया है, जिससे मन और मस्तिष्क को शांत वातावरण का अनुभव कराया जा सके। समुद्र की लहरों व पानी की बौछारों को भी मौके पर ही प्राकृतिक तौर पर बनाए उपकरणों से सुनाया जाता है। यह परियोजना केवल ध्वनि चिकित्सा तक सीमित नहीं है। इसमें अरोमा थेरेपी, मेडिटेशन और साउंड थेरेपी को एकीकृत किया गया है। विभिन्न सुगंधों और ध्वनि तरंगों के संयोजन से भावनात्मक तनाव को कम करने और मानसिक संतुलन को बेहतर बनाने का प्रयास किया जाता है। 

दावा है कि तनाव, अवसाद और चिंता से जुड़े कुछ मामलों में इस मॉडल के प्रारंभिक परीक्षण किए गए हैं। कई प्रतिभागियों ने सत्र के बाद मानसिक शांति, भावनात्मक संतुलन और बेहतर एकाग्रता का अनुभव साझा किया। फिलहाल सम्मेलन में इसका प्रोटोटाइप प्रदर्शित किया गया है। अगले एक-दो महीनों में परियोजना का पूर्ण संस्करण तैयार होने की उम्मीद है, जिसके बाद इसे बाजार में उतारने की योजना है।

भारतीय ज्ञान परंपरा के नाद सिद्धांत से प्रेरित है प्रोजेक्ट
फाउंडेशन की मुख्य कार्यकारी अधिकारी एवं शोध वैज्ञानिक डॉ. नेहा साटम ने बताया कि परियोजना भारतीय ज्ञान परंपरा के नाद सिद्धांत से भी प्रेरित है। भारतीय दर्शन में ध्वनि को चेतना और मानसिक संतुलन से जोड़कर देखा गया है। इसी अवधारणा को आधुनिक विज्ञान और शोध से जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है। 
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