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Rampur Bushahar News: टांकरी लिपि और क्षेत्रीय बोलियों का किया जाएगा संरक्षण
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हिम संस्कृति शोध संस्थान देहुरी ने चंबा के सलूणी कॉलेज के साथ किया एमओयू
संवाद न्यूज एजेंसी
आनी (कुल्लू)। हिमाचल प्रदेश की सांस्कृतिक और भाषाई धरोहर को सहेजने की दिशा में एक अहम कदम उठाया गया है। आनी उपमंडल की हिम संस्कृति शोध संस्थान देहुरी ने राजकीय महाविद्यालय सलूणी, जिला चंबा के साथ वर्चुअल माध्यम से एक समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर हस्ताक्षर किए। इस पहल के तहत विशेष रूप से विलुप्त होती टांकरी लिपि और क्षेत्रीय बोलियों का संरक्षण किया जाएगा। दोनों संस्थान मिलकर कार्यशालाएं, सेमिनार, प्रशिक्षण कार्यक्रम और प्रमाणपत्र पाठ्यक्रम आयोजित करेंगे ताकि छात्र और शोधार्थी टांकरी लिपि को सीख सकें और उससे जुड़ सकें। समझौते के अंतर्गत क्षेत्रीय सर्वेक्षण, प्राचीन पांडुलिपियों का दस्तावेजीकरण, पारंपरिक अभिलेखों का डिजिटलीकरण और स्थानीय सांस्कृतिक परंपराओं के संरक्षण जैसे कार्य भी किए जाएंगे। हिम संस्कृति शोध संस्थान देहुरी के डॉ. यज्ञदत्त ने बताया कि यह सहयोग हिमाचल प्रदेश की समृद्ध सांस्कृतिक पहचान को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। साथ ही यह भाषा विज्ञान, इतिहास और सांस्कृतिक अध्ययन के क्षेत्र में नए शोध अवसर भी प्रदान करेगा। यह एमओयू तीन वर्षों के लिए प्रभावी रहेगा और आपसी सहमति से इसे आगे भी बढ़ाया जा सकता है।
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आनी (कुल्लू)। हिमाचल प्रदेश की सांस्कृतिक और भाषाई धरोहर को सहेजने की दिशा में एक अहम कदम उठाया गया है। आनी उपमंडल की हिम संस्कृति शोध संस्थान देहुरी ने राजकीय महाविद्यालय सलूणी, जिला चंबा के साथ वर्चुअल माध्यम से एक समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर हस्ताक्षर किए। इस पहल के तहत विशेष रूप से विलुप्त होती टांकरी लिपि और क्षेत्रीय बोलियों का संरक्षण किया जाएगा। दोनों संस्थान मिलकर कार्यशालाएं, सेमिनार, प्रशिक्षण कार्यक्रम और प्रमाणपत्र पाठ्यक्रम आयोजित करेंगे ताकि छात्र और शोधार्थी टांकरी लिपि को सीख सकें और उससे जुड़ सकें। समझौते के अंतर्गत क्षेत्रीय सर्वेक्षण, प्राचीन पांडुलिपियों का दस्तावेजीकरण, पारंपरिक अभिलेखों का डिजिटलीकरण और स्थानीय सांस्कृतिक परंपराओं के संरक्षण जैसे कार्य भी किए जाएंगे। हिम संस्कृति शोध संस्थान देहुरी के डॉ. यज्ञदत्त ने बताया कि यह सहयोग हिमाचल प्रदेश की समृद्ध सांस्कृतिक पहचान को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। साथ ही यह भाषा विज्ञान, इतिहास और सांस्कृतिक अध्ययन के क्षेत्र में नए शोध अवसर भी प्रदान करेगा। यह एमओयू तीन वर्षों के लिए प्रभावी रहेगा और आपसी सहमति से इसे आगे भी बढ़ाया जा सकता है।