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Rampur Bushahar News: बुरांस की लालिमा से सराबोर चौपाल-नेरवा की पहाड़ियां
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नेरवा चौपाल में खिल रहे बुरांस के फूल। संवाद
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पर्यटकों और स्थानीय लोगों के लिए बनीं आकर्षण का केंद्र
संवाद न्यूज एजेंसी
चौपाल (रोहड़ू)।
वसंत ऋतु के आगमन के साथ ही चौपाल और नेरवा क्षेत्र की पहाड़ियां इन दिनों बुरांस की लालिमा से सराबोर हो गई हैं। देवदार के घने जंगलों के बीच खिले बुरांस के फूल प्राकृतिक सौंदर्य में चार चांद लगा रहे हैं। दूर-दूर तक फैली लालिमा पर्यटकों और स्थानीय लोगों के लिए आकर्षण का केंद्र बनी हुई है। बुरांस केवल सुंदरता का प्रतीक ही नहीं, बल्कि स्थानीय संस्कृति और परंपराओं का भी अहम हिस्सा है। हिमाचल की परंपरा के अनुसार ग्रामीण इन फूलों को सबसे पहले अपने कुलदेवताओं को अर्पित करते हैं और इसे शुभ मानते हुए घरों की देहरी पर सजाते हैं। चौपाल क्षेत्र के लोकगीतों में भी बुरांस के खिलने को प्रेम और प्रकृति के अद्भुत संगम के रूप में दर्शाया गया है, जो खुशहाली और आध्यात्मिक जुड़ाव का प्रतीक माना जाता है। बैसाखी पर्व के दौरान बुरांस का विशेष महत्व होता है। इस अवसर पर लोग बुरांस के फूलों और पत्तों से अपने आराध्य देवताओं की पूजा-अर्चना करते हैं और मालाओं से घरों को सजाते हैं। आयुर्वेद में ‘लाल सोना’ के नाम से प्रसिद्ध बुरांस सेहत के लिए भी बेहद लाभकारी माना जाता है। विशेषज्ञों के अनुसार इसके एंटीऑक्सीडेंट गुण हृदय रोग और उच्च रक्तचाप को नियंत्रित करने में सहायक होते हैं। बुरांस का जूस गर्मियों में लू से बचाव के लिए कारगर उपाय माना जाता है। स्थानीय लोग इसके फूलों से बनी चटनी और शरबत का उपयोग पाचन को बेहतर बनाने और शरीर को ठंडक पहुंचाने के लिए करते हैं। वहीं, अब बुरांस ग्रामीण क्षेत्रों में स्वरोजगार का सशक्त माध्यम भी बनता जा रहा है। चौपाल और कुपवी के स्वयं सहायता समूह बुरांस से जूस, जैम और चटनी तैयार कर बाजारों में बेच रहे हैं। इससे विशेष रूप से ग्रामीण महिलाओं की आर्थिकी को नई मजबूती मिल रही है और स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर बढ़ रहे हैं। कुल मिलाकर, बुरांस के फूल चौपाल-नेरवा क्षेत्र में न केवल प्रकृति की खूबसूरती बिखेर रहे हैं, बल्कि संस्कृति, स्वास्थ्य और आजीविका का भी मजबूत आधार बनकर उभर रहे हैं।
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संवाद न्यूज एजेंसी
चौपाल (रोहड़ू)।
वसंत ऋतु के आगमन के साथ ही चौपाल और नेरवा क्षेत्र की पहाड़ियां इन दिनों बुरांस की लालिमा से सराबोर हो गई हैं। देवदार के घने जंगलों के बीच खिले बुरांस के फूल प्राकृतिक सौंदर्य में चार चांद लगा रहे हैं। दूर-दूर तक फैली लालिमा पर्यटकों और स्थानीय लोगों के लिए आकर्षण का केंद्र बनी हुई है। बुरांस केवल सुंदरता का प्रतीक ही नहीं, बल्कि स्थानीय संस्कृति और परंपराओं का भी अहम हिस्सा है। हिमाचल की परंपरा के अनुसार ग्रामीण इन फूलों को सबसे पहले अपने कुलदेवताओं को अर्पित करते हैं और इसे शुभ मानते हुए घरों की देहरी पर सजाते हैं। चौपाल क्षेत्र के लोकगीतों में भी बुरांस के खिलने को प्रेम और प्रकृति के अद्भुत संगम के रूप में दर्शाया गया है, जो खुशहाली और आध्यात्मिक जुड़ाव का प्रतीक माना जाता है। बैसाखी पर्व के दौरान बुरांस का विशेष महत्व होता है। इस अवसर पर लोग बुरांस के फूलों और पत्तों से अपने आराध्य देवताओं की पूजा-अर्चना करते हैं और मालाओं से घरों को सजाते हैं। आयुर्वेद में ‘लाल सोना’ के नाम से प्रसिद्ध बुरांस सेहत के लिए भी बेहद लाभकारी माना जाता है। विशेषज्ञों के अनुसार इसके एंटीऑक्सीडेंट गुण हृदय रोग और उच्च रक्तचाप को नियंत्रित करने में सहायक होते हैं। बुरांस का जूस गर्मियों में लू से बचाव के लिए कारगर उपाय माना जाता है। स्थानीय लोग इसके फूलों से बनी चटनी और शरबत का उपयोग पाचन को बेहतर बनाने और शरीर को ठंडक पहुंचाने के लिए करते हैं। वहीं, अब बुरांस ग्रामीण क्षेत्रों में स्वरोजगार का सशक्त माध्यम भी बनता जा रहा है। चौपाल और कुपवी के स्वयं सहायता समूह बुरांस से जूस, जैम और चटनी तैयार कर बाजारों में बेच रहे हैं। इससे विशेष रूप से ग्रामीण महिलाओं की आर्थिकी को नई मजबूती मिल रही है और स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर बढ़ रहे हैं। कुल मिलाकर, बुरांस के फूल चौपाल-नेरवा क्षेत्र में न केवल प्रकृति की खूबसूरती बिखेर रहे हैं, बल्कि संस्कृति, स्वास्थ्य और आजीविका का भी मजबूत आधार बनकर उभर रहे हैं।