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Sirmour News: शिव कथा में आचार्य साक्षी चैतन्य ने समझाया शिव तत्व
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आचार्य साक्षी चैतन्य। फाइल फोटो
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माया के प्रभाव और उससे मुक्ति पाने के बताए उपाय
संवाद न्यूज एजेंसी
नाहन (सिरमौर)। सुरला के प्राचीन ब्रह्मा जी मंदिर में आयोजित शिव महापुराण कथा में आचार्य साक्षी चैतन्य ने शिव तत्व की व्याख्या वेदांत दर्शन के आधार पर की। उन्होंने कहा कि मूल रूप से निर्गुण और निराकार ब्रह्म ही अपनी शक्ति के प्रभाव से सगुण और साकार ईश्वर के रूप में प्रकट होता है। वेदांत के अनुसार जीव और ब्रह्म में वास्तविक रूप से कोई भेद नहीं है। उन्होंने कहा कि माया के कारण ही जीव स्वयं को ईश्वर से पृथक अनुभव करता है, जबकि तत्वतः दोनों एक ही हैं। आचार्य ने उपनिषदों और वेदांत दर्शन के विभिन्न सूत्रों का उल्लेख करते हुए ब्रह्म, ईश्वर, जीव और माया के पारस्परिक संबंधों पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि माया का प्रभाव अत्यंत सूक्ष्म होता है। इसे स्पष्ट करने के लिए उन्होंने देवर्षि नारद और भगवान विष्णु से जुड़े प्रसंग का वर्णन किया।
उन्होंने बताया कि किस प्रकार देवर्षि नारद भी एक समय माया के प्रभाव में आ गए थे, जिससे यह सिद्ध होता है कि आध्यात्मिक साधना में सजगता अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने मानसिक अशांति और भ्रम से मुक्ति के लिए शतनाम स्तोत्र के पाठ का महत्व भी बताया। नियमित स्तोत्र पाठ व्यक्ति के मन को स्थिरता प्रदान करता है और आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त करता है।
संवाद न्यूज एजेंसी
नाहन (सिरमौर)। सुरला के प्राचीन ब्रह्मा जी मंदिर में आयोजित शिव महापुराण कथा में आचार्य साक्षी चैतन्य ने शिव तत्व की व्याख्या वेदांत दर्शन के आधार पर की। उन्होंने कहा कि मूल रूप से निर्गुण और निराकार ब्रह्म ही अपनी शक्ति के प्रभाव से सगुण और साकार ईश्वर के रूप में प्रकट होता है। वेदांत के अनुसार जीव और ब्रह्म में वास्तविक रूप से कोई भेद नहीं है। उन्होंने कहा कि माया के कारण ही जीव स्वयं को ईश्वर से पृथक अनुभव करता है, जबकि तत्वतः दोनों एक ही हैं। आचार्य ने उपनिषदों और वेदांत दर्शन के विभिन्न सूत्रों का उल्लेख करते हुए ब्रह्म, ईश्वर, जीव और माया के पारस्परिक संबंधों पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि माया का प्रभाव अत्यंत सूक्ष्म होता है। इसे स्पष्ट करने के लिए उन्होंने देवर्षि नारद और भगवान विष्णु से जुड़े प्रसंग का वर्णन किया।
उन्होंने बताया कि किस प्रकार देवर्षि नारद भी एक समय माया के प्रभाव में आ गए थे, जिससे यह सिद्ध होता है कि आध्यात्मिक साधना में सजगता अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने मानसिक अशांति और भ्रम से मुक्ति के लिए शतनाम स्तोत्र के पाठ का महत्व भी बताया। नियमित स्तोत्र पाठ व्यक्ति के मन को स्थिरता प्रदान करता है और आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त करता है।
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