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Una News: मासूम बच्चों की सूनी आंखें निहारती रहीं, पापा अब लौटकर नहीं आएंगे
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होशियारपुर हादसे ने चलेट गांव के कई बच्चों से छीन लिया बचपन
नम आंखों से रविवार को गांव के श्मशान घाट में चचेरे भाइयों का अंतिम संस्कार
संवाद न्यूज एजेंसी
दौलतपुर चौक (ऊना)। होशियारपुर के दसूहा में हुए भीषण सड़क हादसे में चार चचेरे भाइयों की मौत ने न सिर्फ चार परिवार उजाड़ दिए, बल्कि कई बच्चों का भविष्य भी अनिश्चितता के अंधेरे में धकेल दिया। चलेट गांव के मासूम बच्चों के सिर से एक ही झटके में पिता का साया उठ गया। जब रविवार को गांव के श्मशान घाट पर अंतिम संस्कार हुआ तो सैकड़ों नम आंखों के बीच कुछ आंखें ऐसी भी थीं, जिन्हें अभी यह समझ ही नहीं आ रहा था कि उनके पापा अब कभी घर नहीं लौटेंगे। सेना से सेवानिवृत्त सुखविंदर सिंह अपने पीछे बारहवीं कक्षा में पढ़ने वाली बेटी और छठी कक्षा में पढ़ने वाले बेटे को छोड़ गए। बेटी जो कुछ ही महीनों में बोर्ड की परीक्षा देने वाली है। आज किताबों से ज़्यादा पिता की तस्वीर को देखती नजर आई। निजी फैक्ट्री में काम करने वाले सुशील कुमार अपने पीछे आठवीं और चौथी कक्षा में पढ़ने वाली दो मासूम बेटियां छोड़ गए हैं। ऑटो चालक अरुण कुमार परिवार के एकमात्र कमाने वाले थे। उनकी मौत ने पत्नी के साथ-साथ छोटे बच्चों को भी बेसहारा कर दिया। जिस अमित कुमार को विदेश भेजने की तैयारी थी, उसी खुशी में बच्चे मिठाई खाने के सपने देख रहे थे लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। एक ही मोहल्ले के चार चचेरे भाइयों की मौत ने पूरे गांव को झकझोर दिया है। हर जुबान पर अब एक ही सवाल है इन मासूम बच्चों की पढ़ाई, परवरिश और भविष्य का सहारा कौन बनेगा। लोगों ने कहा कि यह सड़क हादसा नहीं था, बल्कि वह दिन था जब चलेट गांव के कई बच्चों से उनका बचपन, उनका भरोसा और उनका सबसे मजबूत सहारा छिन गया।
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नम आंखों से रविवार को गांव के श्मशान घाट में चचेरे भाइयों का अंतिम संस्कार
संवाद न्यूज एजेंसी
दौलतपुर चौक (ऊना)। होशियारपुर के दसूहा में हुए भीषण सड़क हादसे में चार चचेरे भाइयों की मौत ने न सिर्फ चार परिवार उजाड़ दिए, बल्कि कई बच्चों का भविष्य भी अनिश्चितता के अंधेरे में धकेल दिया। चलेट गांव के मासूम बच्चों के सिर से एक ही झटके में पिता का साया उठ गया। जब रविवार को गांव के श्मशान घाट पर अंतिम संस्कार हुआ तो सैकड़ों नम आंखों के बीच कुछ आंखें ऐसी भी थीं, जिन्हें अभी यह समझ ही नहीं आ रहा था कि उनके पापा अब कभी घर नहीं लौटेंगे। सेना से सेवानिवृत्त सुखविंदर सिंह अपने पीछे बारहवीं कक्षा में पढ़ने वाली बेटी और छठी कक्षा में पढ़ने वाले बेटे को छोड़ गए। बेटी जो कुछ ही महीनों में बोर्ड की परीक्षा देने वाली है। आज किताबों से ज़्यादा पिता की तस्वीर को देखती नजर आई। निजी फैक्ट्री में काम करने वाले सुशील कुमार अपने पीछे आठवीं और चौथी कक्षा में पढ़ने वाली दो मासूम बेटियां छोड़ गए हैं। ऑटो चालक अरुण कुमार परिवार के एकमात्र कमाने वाले थे। उनकी मौत ने पत्नी के साथ-साथ छोटे बच्चों को भी बेसहारा कर दिया। जिस अमित कुमार को विदेश भेजने की तैयारी थी, उसी खुशी में बच्चे मिठाई खाने के सपने देख रहे थे लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। एक ही मोहल्ले के चार चचेरे भाइयों की मौत ने पूरे गांव को झकझोर दिया है। हर जुबान पर अब एक ही सवाल है इन मासूम बच्चों की पढ़ाई, परवरिश और भविष्य का सहारा कौन बनेगा। लोगों ने कहा कि यह सड़क हादसा नहीं था, बल्कि वह दिन था जब चलेट गांव के कई बच्चों से उनका बचपन, उनका भरोसा और उनका सबसे मजबूत सहारा छिन गया।