Supreme Court: MLA विशेषाधिकार पर सुप्रीम कोर्ट का मंथन, 6 अक्तूबर से सात जज सुनेंगे मामला; क्या बदलेगा नियम?
सुप्रीम कोर्ट की सात जजों वाली संविधान पीठ 6 अक्तूबर से विधायकों के विधायी विशेषाधिकार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार के बीच संबंध से जुड़े अहम मामले की सुनवाई करेगी। यह विवाद 2003 से लंबित है। क्या मौलिक अधिकार और विशेषाधिकार के टकराव पर अब अंतिम स्थिति साफ होगी? क्या बदलेगा? आइए, सबकुछ विस्तार से जानते हैं...
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विस्तार
सुप्रीम कोर्ट की सात जजों वाली संविधान पीठ 6 अक्तूबर से विधायकों के विधायी विशेषाधिकार के दायरे और उसके अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार पर प्रभाव से जुड़े मामले की सुनवाई शुरू करेगी। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने बुधवार को सुनवाई की तारीख तय की। मामला विधायकों के विशेषाधिकार की व्याख्या और संविधान के तहत मिले मौलिक अधिकारों के साथ इसके संबंध से जुड़ा है।
क्या विधायी विशेषाधिकार मौलिक अधिकारों पर भारी पड़ेंगे?
इस मामले में संविधान के अनुच्छेद 194(3), अनुच्छेद 19(1)(a) और अनुच्छेद 21 समेत अन्य प्रावधानों की व्याख्या से जुड़े महत्वपूर्ण कानूनी सवाल शामिल हैं। दिसंबर 2003 में यह मामला पांच जजों की पीठ को भेजा गया था। दिसंबर 2004 में पांच जजों की पीठ के सामने सुनवाई के दौरान दो अलग-अलग पीठों के फैसलों में मामले को लेकर विरोधाभासी विचार सामने आए। इसके बाद पांच जजों की पीठ ने इस मुद्दे को अंतिम और आधिकारिक निर्धारण के लिए सात जजों की संविधान पीठ के पास भेजने की सिफारिश की थी।
क्या पत्रकारों की गिरफ्तारी से जुड़ा पुराना मामला अब तय करेगा दिशा?
मामले की एक याचिका एन. रवि और अन्य बनाम तमिलनाडु विधानसभा अध्यक्ष से संबंधित है। यह विवाद 2003 का है, जब पत्रकार एन. रवि और अन्य ने तमिलनाडु विधानसभा के तत्कालीन अध्यक्ष के. कालिमुथु के उस आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था, जिसमें विशेषाधिकार हनन और अवमानना के आरोप में उनकी गिरफ्तारी का निर्देश दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने उस समय छह पत्रकारों की गिरफ्तारी पर रोक लगा दी थी। इसके बाद अलग-अलग फैसलों के कारण पैदा हुए मतभेद को देखते हुए मामला सात जजों की पीठ को भेजा गया।
क्या इस मामले में पुराने फैसलों का विरोधाभास भी सुलझेगा?
मामले से जुड़े पुराने फैसलों में मौलिक अधिकारों और विधायी विशेषाधिकारों की प्राथमिकता को लेकर अलग-अलग विचार सामने आए थे। एक फैसले में कहा गया था कि मौलिक अधिकारों को प्राथमिकता मिलनी चाहिए, जबकि 1965 के फैसले में मौलिक अधिकारों को संसदीय विशेषाधिकारों के अधीन माना गया था। अब सात जजों की संविधान पीठ इस पूरे मुद्दे की आधिकारिक व्याख्या करेगी और विधायी विशेषाधिकार तथा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बीच संबंध से जुड़े सवालों पर सुनवाई करेगी।
क्या एक और अहम मामले की सुनवाई 22 सितंबर से होगी?
सुप्रीम कोर्ट ने राज्य विधानमंडल की ओर से बिक्री कर पर अतिरिक्त लेवी लगाने की शक्ति से जुड़े एक अलग मामले की सुनवाई भी सात जजों की पीठ द्वारा किए जाने की जानकारी दी है। इस मामले की सुनवाई 22 सितंबर से होगी। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची तथा न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने कहा कि 22 सितंबर वाले मामले की सुनवाई दोपहर 2 बजे से शाम 4 बजे तक की जा सकती है, ताकि दिन के पहले हिस्से में अन्य मामलों की सुनवाई हो सके। वहीं 6 अक्टूबर से शुरू होने वाली सुनवाई सुबह 11 बजे के आसपास शुरू किए जाने की संभावना है।