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CAPF: नए कानून को सांविधानिक आधार पर चुनौती देंगे पूर्व कैडर अफसर, क्या है 122 'आईपीएस और मिथक' की कहानी?

डिजिटल ब्यूरो, अमर उजाला, नई दिल्ली। Published by: Jyoti Bhaskar Updated Fri, 10 Apr 2026 06:57 PM IST
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CAPF Former Cadre Officers New Law Challenge on Constitutional Grounds know Story Behind 122 IPS and the Myth
CAPF से जुड़े सांविधानिक सवाल पर अदालत में लड़ाई की तैयारी (सांकेतिक) - फोटो : अमर उजाला प्रिंट / एजेंसी
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'सीएपीएफ (सामान्य प्रशासन) विधेयक 2026' को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने मंजूरी दे दी है। पिछले दिनों इस विधेयक को संसद के दोनों सदनों में पारित किया गया था। गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने इस विधेयक का उद्देश्य, सीएपीएफ में 'ग्रुप ए सामान्य ड्यूटी' के अधिकारियों की भर्ती और सेवा शर्तों से संबंधित सामान्य नियमों को विनियमित करना है। इससे देश का आंतरिक सुरक्षा ढांचा मजबूत होगा और सीएपीएफ अधिकारियों की सेवा शर्तों में अधिक स्पष्टता व एकरूपता आएगी। दूसरी ओर पूर्व कैडर अफसरों ने इस विधेयक को कैडर अफसरों के साथ-साथ निचले रैंक के हितों के लिए नुकसानदायक बताया है। बीएसएफ के पूर्व एडीजी एसके सूद का कहना है कि सीएपीएफ के नए अधिनियम को संवैधानिक आधार पर चुनौती दी जाएगी। सुप्रीम कोर्ट ने कैडर अफसरों के पक्ष में जो फैसला दिया था, उसे पलटने के लिए ही सरकार ने यह नया कानून बनाया है। सूद ने इस मामले में 122 'आईपीएस और मिथक' का राज खोला है। 

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इसे बड़े सुधार के रूप में देखा जाए: नित्यानंद राय... 
गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने इस विधेयक के पारित होने के बाद कहा था, इसे देश की सुरक्षा संरचना को मजबूत, सुदृढ़ और अधिक संगठित बनाने के लिए एक बड़े सुधार के तौर पर देखा जाना चाहिए। यह कानून, सीएपीएफ अधिकारियों की सेवा शर्तों में लंबे समय से चले आ रहे संरचनात्मक असंतुलन और कैडर प्रबंधन में चुनौतियों का समाधान करने के साथ-साथ परिचालन दक्षता में सुधार लाने का प्रयास करता है। समय के साथ सीएपीएफ की भूमिका और जिम्मेदारियों का काफी विस्तार हुआ है, लेकिन विभिन्न बलों में सेवा शर्तें, अलग-अलग नियमों, निर्देशों और प्रशासनिक उपायों द्वारा शासित होती रही हैं। यह विधेयक, मौजूदा व्यवस्थाओं में जो भी विसंगतियां हैं, उन्हें दूर करेगा। इन बलों में वित्तीय लाभों की निरंतरता सुनिश्चित होगी। यह विधेयक ग्रुप 'ए' जनरल ड्यूटी अधिकारियों की भर्ती, पदोन्नति, वरिष्ठता और अन्य सेवा शर्तों को नियंत्रित करने के लिए एक स्पष्ट व्यापक ढांचा प्रदान करता है। 
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इस सांविधानिक आधार पर दी जाएगी चुनौती...  
बीएसएफ के पूर्व एडीजी एसके सूद कहते हैं कि सीएपीएफ के नए कानून को इस संवैधानिक आधार पर चुनौती दिया जाना निश्चित है, क्योंकि यह किसी भी कानूनी खामी को दूर नहीं करता है। अनुच्छेद 14 और 16 के तहत कैडर अधिकारियों को प्राप्त मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के आधार पर भी चुनौती दी जाएगी। सरकार ने नया कानून बनाकर, सर्वोच्च न्यायालय का फैसला पलटा है। इसके जरिए केंद्र सरकार ने संवैधानिक मुद्दों और राष्ट्रीय सुरक्षा संबंधी निहितार्थों से ध्यान हटाकर 'आईपीएस' अधिकारियों की समन्वय क्षमता, प्रशिक्षण और रणनीतिक दृष्टि की कथित श्रेष्ठता का समर्थन किया है। बतौर सूद, इस मामले को सही परिप्रेक्ष्य में रखने की आवश्यकता है। यह धारणा केवल सेवारत और पूर्व आईपीएस अधिकारियों के साथ-साथ सत्ताधारी दल के राजनेताओं द्वारा व्यक्त की जा रही है। 

क्यों किया प्रधानमंत्री चर्चिल का जिक्र... 
बीएसएफ के पूर्व एडीजी ने बताया कि सीएपीएफ के कैडर अफसरों के प्रति एक विशेष वर्ग का व्यवहार ठीक नहीं है। यह स्थिति उस तिरस्कार की याद दिलाती है, जो कथित तौर पर ब्रिटेन के तत्कालीन प्रधानमंत्री चर्चिल ने स्वतंत्रता के समय भारतीय नेताओं के प्रति दर्शाया था। एसके सूद ने आईपीएस की श्रेष्ठता के मिथक को लेकर एक उदाहरण दिया है। उन्होंने कहा, सरदार वल्लभभाई पटेल राष्ट्रीय पुलिस अकादमी (एसवीपीएनपीए) में 2016 बैच के 122 आईपीएस परिवीक्षुओं में से 119, एक या अधिक शैक्षणिक या शारीरिक परीक्षाओं में असफल रहे। सूद का दावा है कि उन्हें संभावित कार्रवाई से पहले तीन प्रयासों की अनुमति के साथ परीक्षा दोबारा देनी पड़ी। संभवतः अन्य बैचों में भी ऐसे ही उदाहरण हों, जिनकी जानकारी सार्वजनिक नहीं हो सकी।

पुलिसिंग और जांच कार्य में कुशल हो सकते हैं...   
पूर्व एडीजी का कहना है कि आईपीएस अधिकारी पुलिसिंग और जांच कार्य में बेहतर हो सकते हैं, लेकिन देश के अधिकांश राज्यों में कानून-व्यवस्था की खराब स्थिति, व्यापक भ्रष्टाचार और जांच के निम्न स्तर को देखते हुए यह कौशल भी संदिग्ध बन रहा है। वे सीएपीएफ के परिचालन, रसद और कार्मिक प्रबंधन संबंधी मुद्दों को संभालने में सफल नहीं हो रहे। उन्हें सीएपीएफ के शीर्ष पर बैठाया जाता है, लेकिन वे इन बलों की गंभीर समस्याओं का समाधान करने में असमर्थ हैं। दशकों से इन बलों में डीजी/एसडीजी/एडीजी, आईजी व डीआईजी बनकर आ रहे आईपीएस, जवानों एवं कैडर अधिकारियों की समस्याओं का निदान नहीं कर सके। अधिकांश बलों में सिपाही से लेकर उच्च रैंकों में पदोन्नति का संकट गहराता जा रहा है। विभिन्न रैंकों में एक पदोन्नति लेने में ही 15 से 20 साल का समय लग रहा है। जवानों, अधीनस्थों और अधिकारियों पर अत्यधिक कार्यभार का दबाव है। आईपीएस अधिकारी, इन दिक्कतों का हल नहीं कर सके। नतीजा, सीएपीएफ कार्मिकों को अदालत में जाना पड़ रहा है। 

मानव संसाधन नीतियों की विफलता... 
जब इन बलों में लंबे समय तक जवानों और अफसरों की दिक्कतों का समाधान नहीं हुआ तो उनके कार्य-जीवन में असंतुलन पैदा हो गया। इसके चलते इन बलों में बड़ी संख्या में स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति के मामले सामने आए। इन बलों के विशेषीकृत परिचालन क्षेत्र के लिए उपयुक्त प्रौद्योगिकी की पहचान और उसे अपनाने में उनकी घोर विफलता जमीनी स्तर के परिचालन वातावरण से उनकी अनभिज्ञता से उत्पन्न होती है। सीएपीएफ में मानव संसाधन नीतियों की विफलता, न केवल अफसरों के बीच, बल्कि अधीनस्थ अधिकारियों और पांचों बलों के अन्य रैंकों में भी तीव्र गतिरोध के रूप में स्पष्ट हो रही है। कार्य-जीवन संतुलन की उचित व्यवस्था और बीओपी/सीओबी में पर्याप्त सुविधाओं का अभाव, स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेने का एक बड़ा कारण है।

सर्वोच्च न्यायालय का फैसला पलटने का मकसद... 
सर्वोच्च न्यायालय ने मई 2025 में अहम फैसला सुनाया था। उसमें कहा गया कि सीएपीएफ में संयुक्त सचिव यानी महानिरीक्षक स्तर तक आईपीएस प्रतिनियुक्ति को 'धीरे-धीरे' कम किया जाए। सीएपीएफ कैडर के अधिकारियों को उस स्तर तक के सभी पदों पर आसीन होने की अनुमति दी गई। इससे कैडर अधिकारियों के कुछ हद तक ही सही, पदोन्नति के अवसर बढ़ जाते। साथ ही उन्हें गैर-कार्यात्मक उन्नयन का लाभ भी मिलता। कैडर अधिकारियों को अपने-अपने पेशेवर क्षेत्र में व्यापक अनुभव का उच्च पर्यवेक्षण और नीति निर्माण के स्तरों पर उपयोग करने में काफी मदद मिलती। वे इन बलों की नीतियों को परिचालन आवश्यकताओं के अनुरूप ढालने में सक्षम बना सकते थे। सीएपीएफ (सामान्य प्रशासन) विधेयक, 2026, बिना किसी ठोस आधार का उल्लेख किए बिना ही सर्वोच्च न्यायालय के आदेश को पलट देता है। 

यह किसी भी कानूनी खामी को दूर नहीं करता... 
नवंबर 2025 को सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया था कि विधायिका, न्यायालय के निर्णयों को रद्द नहीं कर सकती, लेकिन संशोधनों के माध्यम से कानूनी खामियों को दूर कर सकती है। अब सीएपीएफ (सामान्य प्रशासन) विधेयक, 2026 को राष्ट्रपति की मंजूरी मिल गई है। पूर्व कैडर अफसर, इस विधेयक को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देंगे। वजह, यह किसी भी कानूनी खामी को दूर नहीं करता है। कैडर अधिकारियों ने लंबी कानूनी लड़ाई के बाद जीत हासिल की थी। उन्हें उम्मीद थी कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले का क्रियान्वयन होगा। इससे डेढ़ दो दशक से चल रहा उनका संघर्ष समाप्त हो जाएगा। बतौर एसके सूद, ऐसा नहीं हुआ। उन्हें न्याय पाने के लिए कुछ और साल इंतजार करना पड़ेगा। सीएपीएफ के कैडर अफसरों को सुप्रीम कोर्ट के न्याय पर पूरा भरोसा है।

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