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सायरस मिस्त्री के वो फैसले जो उनके लिए घातक साबित हुए 

अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली/ मुंबई Updated Thu, 27 Oct 2016 03:16 AM IST
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अपने काम के प्रति जुनूनी और साप्ताहिक अवकाश वाले दिन भी ऑफिस पहुंच जाने वाले युवा अध्यक्ष सायरस मिस्त्री के कुछ फैसले टाटा ग्रुप को रास नहीं आए और उनके लिए घातक साबित हुए। मसलन, मिस्त्री ने कुछ वरिष्ठ पदों को खाली रखा और कुछ ऐसे लोगों की भर्ती कर ली जिनकी प्रतिभा पर सवाल उठने लगे। मिस्त्री ने अधिक मुनाफे पर ध्यान देते हुए कर्ज घटाने के लिए ग्रुप की परिसंपत्तियां बेचनी शुरू कर दी जो पुरानी पीढ़ी को नागवार गुजरी। मिस्त्री के अध्यक्ष बनने के बाद भी टाटा ग्रुप और शापूरजी पालोनजी ग्रुप के कारोबारी सौदे को लेकर हितों का टकराव जारी रहा। टाटा ग्रुप ने इसे बिजनेस हाउस की आचार संहिता का उल्लंघन माना।  
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अगस्त 2016 में जब टाटा मोटर्स के शेयरधारकों को सिर्फ 20 पैसे का लाभांश दिया तो वे नाराज हो गए। इस पर मिस्त्री ने कहा था कि हमने पिछले साल ही आपसे पूंजी जुटाई है। इसे हम नए कारोबार में लगा रहे हैं। यात्रा लंबी होगी, दिल छोटा न करें। अपने चार साल के कार्यकाल में कोई बड़ा प्रदर्शन नहीं कर पाए। उन्होंने तीन साल टाटा के विशाल साम्राज्य और इसकी पेचीदगियां समझने में ही लगा दिए। 
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मिस्त्री बोले, महत्वहीन चेयरमैन बना दिया गया था मुझे
अचानक बाहर का रास्ता दिखाए जाने से क्षुब्ध सायरस मिस्त्री ने रतन टाटा के खिलाफ आरोपों की बौछार लगा दी है। सायरस का कहना है फैसले लेने की वैकल्पिक व्यवस्था करके मुझे महत्वहीन चेयरमैन बना दिया गया था। टाटा संस के बोर्ड मेंबर्स को लिखे ईमेल में कहा है कि 24 अक्तूबर की बोर्ड बैठक के घटनाक्रम से मुझे इतना सदमा लगा जिसे शब्दों में बताना मुश्किल है। मुझे दिसंबर 2012 में चेयरमैन बनाते वक्त फ्रीहैंड देने की बात कही गई थी लेकिन बाद में टाटा फैमिली ट्रस्ट और टाटा संस बोर्ड के बीच तालमेल के नियम बदल दिए गए। मिस्त्री के इन आरोपों के संबंध में टाटा संस की प्रतिक्रिया नहीं मिल सकी।

शेयर बाजार में टाटा समूह की कंपनियों को 21 हजार करोड़ की चपत
सायरस मिस्त्री को चेयरमैन पद से हटाए जाने के बाद दूसरे दिन टाटा समूह की प्रमुख कंपनियों को शेयर बाजार में 10 हजार करोड़ का नुकसान झेलना पड़ा। इस तरह दो दिनों में समूह की प्रमुख कंपनियों की मार्केट कैपिटल में करीब 21 हजार करोड़ की कमी दर्ज की गई है।  

रतन टाटा के चार चहेते, कोई भी हो सकता है अगला अध्यक्ष 

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ratan tata
रतन टाटा के खास चहेतों में कुछ ऐसे चेहरे हैं जिन्हें ग्रुप का अगला अध्यक्ष बनाया जा सकता है। इन्हीं नोशीर सूनावाला, आरके कृष्ण कुमार, आर वेंकटरमण और जिया मोदी उनके ज्यादा करीबी हैं। सूनावाला टाटा संस में 75 साल की उम्र तक उपाध्यक्ष रहे। कुछ लोगों का मानना है कि रतन टाटा ने खास तौर से ग्रुप में उपाध्यक्ष का पद उनके लिए ही बनाया था। इसके अलावा वह कई ट्रस्टों में ट्रस्टी भी हैं। 

आरके कृष्ण कुमार टाटा संस के पूर्व निदेशक अब टाटा ग्रुप की कंसल्टिंग फर्म का हिस्सा हैं। वह अब टाटा ग्रुप के ट्रस्टों के साथ सक्रिय हैं। सन 2000 में टेटली के अधिग्रहण में कुमार ने अहम भूमिका निभाई थी। इससे टाटा ग्लोबल बेवरीज दुनिया की चाय कंपनियों में दूसरे नंबर पर पहुंच गई थी। इसके साथ ही ग्रुप ने अंतरराष्ट्रीय क्षेत्र में भी कदम रखा था। रतन के विश्वासपात्र कुमार को टाटा ग्रुप का दूसरा सबसे ताकतवर शख्स माना जाता है। आर वेंकटरमण टाटा ग्रुप के सभी नौ ट्रस्टों में ट्रस्टी हैं। कई वर्षों तक रतन टाटा के एक्जीक्यूटिव असिस्टेंट रहने के कारण उनके बेहद करीब आ गए। जिया मोदी को विलय और अधिग्रहण में महारत हासिल है और टाटा ग्रुप इसी के जरिये दुनिया में छा जाना चाहता है। 

इसलिए नैनो को बंद नहीं किया गया
टाटा संस के पूर्व चेयरमैन सायरस मिस्त्री ने बोर्ड के निदेशकों को भेजी चिट्ठी में लिखा है कि घाटे की नैनो कार को बंद न करने के पीछे कंपनी के भावनात्मक कारण थे। साथ ही ऐसा करने से कार के ग्लाइडर्स की सप्लाई ठप हो जाती। उन्होंने आरोप लगाया कि ग्लाइडर्स बनाने वाली कंपनी में रतन टाटा की हिस्सेदारी है।

स्टॉक एक्सचेंज ने मांगी सफाई
टाटा समूह की कंपनियों को 18 अरब डॉलर की चपत लगने की आशंका जताए जाने पर स्टॉक एक्सचेंजों ने सफाई मांगी है। सायरस मिस्त्री ने अपनी चिट्ठी में समूह की कंपनियों की मार्केट वैल्यू 18 अरब डॉलर तक घटने की आशंका जताई है। इस पर बांबे स्टॉक एक्सचेंज और नेशनल स्टॉक एक्सचेंज ने टाटा मोटर्स, टाटा स्टील, इंडियन होटल्स आदि से मसले पर विस्तृत जानकारी दने को कहा है।
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