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पूर्वाग्रह की धुंध: बंगाल के जनादेश पर विदेशी मीडिया गढ़ने लगा हिंदू राष्ट्रवाद का नैरेटिव, असली वजह क्या है?

Rajkishor राजकिशोर
Updated Thu, 07 May 2026 05:24 AM IST
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सार

सच्चाई यह है कि नरेंद्र मोदी और भाजपा का बढ़ता राजनीतिक विस्तार विदेशी वैचारिक प्रतिष्ठानों की सबसे बड़ी बेचैनी बन चुका है। भाजपा अधिकांश राज्यों में प्रत्यक्ष या गठबंधन के जरिए सत्ता में है। ऐसे में भारत को सत्तावादी लोकतंत्र और एकदलीय प्रभुत्व के फ्रेम में फिट करने की कोशिशें और तेज होती दिख रही हैं।

Foreign media prejudice building Hindu nationalist narrative on Bengal mandate real concern PM Modi power
पश्चिम बंगाल की जीत पर विदेशी मीडिया की प्रतिक्रिया - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार

पश्चिम बंगाल में भाजपा के सत्ता तक पहुंचते ही वैश्विक वैचारिक गलियारों में भी बेचैनी पैदा कर दी। विदेशी मीडिया के बड़े हिस्से ने भारत में लोकतंत्र, अल्पसंख्यक अधिकार और चुनावी निष्पक्षता पर अचानक सवाल उठाने शुरू कर दिए। न्यूयॉर्क टाइम्स, द गार्जियन और अल जजीरा जैसे मंचों पर यह नैरेटिव तेजी से गढ़ा जाने लगा कि भारत हिंदू राष्ट्रवाद की ऐसी दिशा में बढ़ रहा है, जहां लोकतंत्र व बहुलता खतरे में है।


दिलचस्प यह है कि यही बेचैनी तमिलनाडु व केरल के परिणामों पर लगभग गायब रही, जहां भाजपा सत्ता से दूर रही। असम में भाजपा की हैट्रिक भी उतना वैचारिक तूफान नहीं खड़ा कर सकी, जितना बंगाल में सत्ता परिवर्तन ने कर दिया। सवाल यही है कि क्या चिंता वास्तव में लोकतंत्र की है या उस सियासी बदलाव की, जिसने दशकों पुराने वामपंथ और छद्म-सेकुलर वैचारिक गढ़ को ध्वस्त कर दिया? जब भाजपा हारती है, तो विदेशी मीडिया भारत की लोकतांत्रिक परिपक्वता की तारीफ करता है, पर जैसे ही वह निर्णायक जनादेश लेकर आती है, तो लोकतांत्रिक प्रक्रिया संदेह और संस्थागत संकट की भाषा में बदल जाती है। यह चयनात्मक दृष्टि सिर्फ संयोग नहीं लगती।
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पश्चिमी मीडिया भारत को अक्सर यूरोपीय राजनीतिक अनुभवों के फ्रेम से समझने की कोशिश करता है। वहां राष्ट्रवाद का अर्थ सत्ता विस्तार व नस्लीय वर्चस्व के इतिहास से जुड़ा रहा है। वहीं, भारत में राष्ट्रवाद सांस्कृतिक स्मृति, सभ्यतागत पहचान और ऐतिहासिक आत्मबोध से जुड़ा है। इसे विदेशी मीडिया समझ नहीं पाता। इसीलिए हमारे सांस्कृतिक पुनर्जागरण को सीधे बहुसंख्यकवादी खतरे से जोड़ देते हैं। यही कारण है कि बंगाल में भाजपा की जीत को लोकतांत्रिक परिवर्तन के बजाय हिंदू राष्ट्रवादी कब्जे की तरह प्रस्तुत किया गया।
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एसआईआर पर आधा सच ही दिखाने की कोशिश
कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने परिणामों के बाद वोट चोरी का आरोप लगाया। ममता बनर्जी ने चुनाव आयोग को भाजपा का आयोग बताया। विदेशी मीडिया ने इन आरोपों को लगभग बिना तथ्य जांचे ही अपने विमर्श का आधार बना लिया। विशेष रूप से एसआईआर को मुस्लिम मतदाताओं को हटाने की साजिश के रूप में पेश किया गया, जबकि हटाए गए 91 लाख नामों में 63% हिंदू मतदाता थे।

बड़ी संख्या में नाम मृत, डुप्लिकेट, स्थायी रूप से स्थानांतरित या फर्जी पाए गए थे। इसके बावजूद विदेशी मीडिया के बड़े हिस्से ने केवल मुस्लिम वोट हटाए गए वाली लाइन को प्रमुखता दी। यही नहीं, न्यूयॉर्क टाइम्स जैसे मंचों ने बिना ठोस प्रमाण के मुख्य चुनाव आयुक्त की निष्पक्षता तक पर सवाल खड़े किए। चुनाव आयोग को सरकार नियंत्रित संस्था की तरह पेश करने की कोशिश हुई, जबकि यही संस्थाएं तब तक विश्वसनीय मानी जाती हैं जब तक परिणाम उनकी वैचारिक अपेक्षाओं के अनुरूप हों।

असली बेचैनी मोदी की बढ़ती शक्ति  
सच्चाई यह है कि नरेंद्र मोदी और भाजपा का बढ़ता राजनीतिक विस्तार विदेशी वैचारिक प्रतिष्ठानों की सबसे बड़ी बेचैनी बन चुका है। भाजपा अधिकांश राज्यों में प्रत्यक्ष या गठबंधन के जरिए सत्ता में है। ऐसे में भारत को सत्तावादी लोकतंत्र और एकदलीय प्रभुत्व के फ्रेम में फिट करने की कोशिशें और तेज होती दिख रही हैं।

बंगाल का फैसला यह भी साबित करता है कि भारत का मतदाता अपनी प्राथमिकताएं जमीन, अनुभव और आकांक्षाओं के आधार पर तय कर रहा है, न कि न्यूयॉर्क, लंदन या दोहा में बैठे नैरेटिव निर्माताओं की वैचारिक सुविधा के अनुसार।

हिंसा पर चुप्पी, जनादेश पर हंगामा
सबसे बड़ा विरोधाभास बंगाल की हिंसा को लेकर दिखाई देता है। एक दशक में पंचायत से लेकर विधानसभा चुनावों तक बंगाल राजनीतिक हिंसा, हत्याओं व प्रतिशोध की घटनाओं के कारण राष्ट्रीय बहस का केंद्र रहा। विपक्षी कार्यकर्ताओं की हत्याएं, बूथ कब्जाने के आरोप और सिंडिकेट राज की चर्चा भारत के भीतर लगातार होती रही।

विदेशी मीडिया के बड़े हिस्से ने इन्हें कभी उतनी प्रमुखता नहीं दी, जितनी भाजपा की जीत के बाद अल्पसंख्यकों के खतरे को दी जा रही है। अल जजीरा जैसे मंच यह याद दिलाते हैं कि 1984 के दंगों और बाबरी विवाद के बाद बंगाल अपेक्षाकृत शांत रहा, लेकिन वे हाल के वर्षों की सियासी हिंसा पर लगभग मौन दिखते हैं। विडंबना यह है कि इस बार अपेक्षाकृत शांतिपूर्ण चुनाव हुआ और उसी के बाद लोकतंत्र पर संकट का शोर सबसे ज्यादा सुनाई देने लगा।

बंगाल ने सिर्फ हिंदुत्व पर वोट नहीं दिया
विदेशी विश्लेषणों में बंगाल की जीत को लगभग पूरी तरह हिंदू ध्रुवीकरण के फ्रेम में समेट दिया गया। लेकिन वे यह देखने में विफल रहे कि जनता की नाराजगी के केंद्र में आर्थिक बदहाली, बेरोजगारी, उद्योगों का पलायन और भ्रष्टाचार भी थे।

प. बंगाल पर कर्ज का बोझ 7.7 लाख करोड़ रुपये से ऊपर पहुंच चुका है। हजारों कंपनियां राज्य छोड़ चुकी हैं। युवाओं का बड़ा वर्ग रोजगार के लिए पलायन कर रहा है। कट मनी, भर्ती घोटाले और सिंडिकेट संस्कृति जैसे मुद्दे वर्षों से जनता में असंतोष पैदा कर रहे थे। लेकिन विदेशी रिपोर्टों में इन सवालों की जगह हिंदू राष्ट्रवाद बनाम अल्पसंख्यक की बहस ने ले ली।

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