{"_id":"6a79861f7512bef29407a02e","slug":"jharkhand-student-protest-assembly-peaceful-march-cm-hemant-soren-rules-for-use-of-police-force-manual-supreme-2026-08-10","type":"feature-story","status":"publish","title_hn":"झारखंड में युवाओं का विधानसभा मार्च: क्या हैं शांतिपूर्ण प्रदर्शन के नियम, कब पुलिस को बल प्रयोग की इजाजत?","category":{"title":"India News","title_hn":"देश","slug":"india-news"}}
झारखंड में युवाओं का विधानसभा मार्च: क्या हैं शांतिपूर्ण प्रदर्शन के नियम, कब पुलिस को बल प्रयोग की इजाजत?
Mon, 10 Aug 2026 01:34 PM IST
कीर्तिवर्धन मिश्र
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र
Updated Mon, 10 Aug 2026 01:34 PM IST
सार
झारखंड में JPSC-JSSC पेपर लीक के विरोध में युवाओं का विधानसभा मार्च जारी। आइये जानते हैं प्रदर्शनकारी छात्रों-युवाओं की मुख्य मांगें, प्रदर्शन-मार्च से जुड़े सांविधानिक अधिकार और पुलिस बल प्रयोग के कानूनी नियम।
विज्ञापन
झारखंड में छात्रों का प्रदर्शन।
- फोटो : अमर उजाला
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
झारखंड की राजधानी रांची में सोमवार को पेपर लीक के खिलाफ युवाओं ने विधानसभा घेरने के लिए मार्च निकाला। इस दौरान युवाओं ने झारखंड पब्लिक सर्विस कमीशन (जेपीएससी) और झारखंड स्टाफ सेलेक्शन कमीशन (जेएसएससी) में वर्षों से गड़बड़ियों, भ्रष्टाचार और पेपर लीक जैसी धांधलियों का मुद्दा उठाया और इसकी जांच केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) जैसी संस्था को सौंपने की मांग की। इस मार्च में बीते कई दिनों से अनशन कर रहे छात्र नेता देवेंद्र नाथ महतो को छात्रों का एक वर्ग स्ट्रेचर पर मार्च के लिए लेकर निकला। युवाओं ने झारखंड सरकार से पूरी व्यवस्था में बड़े बदलावों और मांग की और इसे और पारदर्शी बनाने का आह्वान किया।
इस पूरे घटनाक्रम के दौरान कई जगहों पर छात्र बैरिकेंडिंग हटाकर विधानसभा की तरफ आगे बढ़े। इस दौरान उनका कई जगहों पर पुलिस से टकराव भी हुआ, हालांकि स्थिति बिगड़ी नहीं। पुलिस ने फिलहाल संयम बरकरार रखा है और छात्रों को रोकने के लिए पानी की बौछारें की हैं। वहीं, कुछ जगहों पर लाठीचार्ज की खबरें आई हैं।
ये भी पढ़ें: JPSC-JSSC Protest Live: विधानसभा परिसर में डटे प्रदर्शनकारी, पुलिस ने किया लाठीचार्ज; बढ़ा तनाव
विज्ञापन
विज्ञापन
इस पूरे घटनाक्रम के दौरान कई जगहों पर छात्र बैरिकेंडिंग हटाकर विधानसभा की तरफ आगे बढ़े। इस दौरान उनका कई जगहों पर पुलिस से टकराव भी हुआ, हालांकि स्थिति बिगड़ी नहीं। पुलिस ने फिलहाल संयम बरकरार रखा है और छात्रों को रोकने के लिए पानी की बौछारें की हैं। वहीं, कुछ जगहों पर लाठीचार्ज की खबरें आई हैं।
विज्ञापन
ये भी पढ़ें: JPSC-JSSC Protest Live: विधानसभा परिसर में डटे प्रदर्शनकारी, पुलिस ने किया लाठीचार्ज; बढ़ा तनाव
विज्ञापन
इस बीच यह जानना अहम है कि आखिर पेपर लीक को लेकर झारखंड में इतने बड़े स्तर पर छात्रों का प्रदर्शन क्यों हो रहा है? युवाओं की मांगें क्या हैं? आज छात्रों की तरफ से विधानसभा घेराव के लिए जिस तरह का मार्च निकाला जा रहा है, उसके लिए कानून और नियम क्या कहते हैं? पुलिस युवाओं को रोकने के लिए कब और कैसे बल प्रयोग कर सकती है? आइये जानते हैं...
झारखंड में छात्रों का प्रदर्शन।
- फोटो : अमर उजाला
प्रदर्शनकारी युवाओं की मांगें क्या-क्या हैं?
- प्रदर्शनकारी युवाओं की सबसे प्रमुख मांग जेएसएससी कंबाइंड ग्रेजुएट लेवल (जेएसएससी-सीजीएल) परीक्षा सहित अन्य भर्ती परीक्षाओं में हुई कथित अनियमितताओं और पेपर लीक की केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) से स्वतंत्र जांच कराने की है।
- वे साल 2019 के बाद आयोजित की गई कई परीक्षाओं, जैसे जेएसएससी सीजीएल, जेएसएससी जूनियर इंजीनियर और पीजीटी परीक्षाओं को रद्द करने की मांग कर रहे हैं। छात्र नेताओं के मुताबिक, वे कुल 13 परीक्षाओं को रद्द करने की मांग कर रहे हैं, जबकि सरकार सिर्फ तीन परीक्षाओं को रद्द करने के लिए तैयार हुई है।
- छात्र मांग कर रहे हैं कि परीक्षाओं के श्रेणीवार कट-ऑफ घोषित किए जाएं और परीक्षार्थियों की ओएमआर शीट व रिस्पॉन्स शीट सार्वजनिक की जाएं।
- इसके अलावा परीक्षाओं में धांधली, पेपर लीक और भ्रष्टाचार के लिए जिम्मेदार अधिकारियों, कर्मचारियों और बाहरी बिचौलियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई सुनिश्चित करने की मांग हुई है।
- भर्ती की पूरी प्रक्रिया को समयबद्ध, निष्पक्ष, सुलभ और पारदर्शी बनाए जाने की मांग की गई है, ताकि बार-बार होने वाले पेपर लीक और परीक्षा परिणामों में होने वाली देरी से युवाओं का भविष्य प्रभावित न हो।
युवाओं की ओर से विधानसभा तक निकाला जा रहा मार्च, इसके नियम क्या?
भारत में छात्रों या किसी भी नागरिक समूहों की ओर से प्रदर्शन मार्च या रैली निकालने के लिए देश का संविधान, कानूनी संहिताएं और अदालतों की तरफ से नियम पहले से तय किए गए हैं।1. विरोध प्रदर्शन का सांविधानिक अधिकार और उसकी सीमाएं
- भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत देश के नागरिकों को विरोध करने का अधिकार प्राप्त है। इसके तहत अनुच्छेद 19(1)(अ) अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है और अनुच्छेद 19(1)(ब) बिना हथियारों के शांतिपूर्वक किसी सार्वजनिक स्थान पर एकत्र होने का अधिकार प्रदान करता है।
- हालांकि, यह अधिकार असीमित या बिना किसी शर्त के नहीं है। अनुच्छेद 19(3) के तहत राज्य लोक व्यवस्था, भारत की संप्रभुता और अखंडता और राज्य की सुरक्षा के हित में इस अधिकारों पर उचित प्रतिबंध लगा सकता है। इसका मतलब है कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन के लिए अधिकारियों से अनुमति लेना और कानून-व्यवस्था बनाए रखना अनिवार्य है।
मौलिक अधिकार
- फोटो : Amar Ujala
2. पुलिस की अनुमति और एनओसी की अनिवार्यता
संविधान के मुताबिक, कानून और व्यवस्था राज्य सूची (स्टेट लिस्ट) का विषय है, इसलिए प्रदर्शन और रैलियों की अनुमति से जुड़े नियम अलग-अलग राज्यों में अलग हो सकते हैं। प्रदर्शनकारियों को उस संबंधित पुलिस स्टेशन से अनापत्ति प्रमाण पत्र (एनओसी) लेना होता है, जिसके अधिकार क्षेत्र में वह स्थल आता है। अगर मार्च एक से ज्यादा पुलिस स्टेशनों के अधिकार क्षेत्र से गुजरता है, तो पुलिस उपायुक्त (डीसीपी) या कमिश्नरेट कार्यालय से एनओसी लेना अनिवार्य है।
मार्च को रोकने की सही वजह हो
अगर पुलिस को लगता है कि प्रदर्शन से सार्वजनिक व्यवस्था बिगड़ेगी, देश की संप्रभुता या सुरक्षा को खतरा होगा, विदेशी राज्यों के साथ संबंध प्रभावित होंगे, नैतिकता का उल्लंघन होगा, या किसी अपराध को बढ़ावा मिलेगा, तो वह अनुमति देने से मना कर सकती है। अदालत की अवमानना या मानहानि की आशंका होने पर भी अनुमति रोकी जा सकती है।
संविधान के मुताबिक, कानून और व्यवस्था राज्य सूची (स्टेट लिस्ट) का विषय है, इसलिए प्रदर्शन और रैलियों की अनुमति से जुड़े नियम अलग-अलग राज्यों में अलग हो सकते हैं। प्रदर्शनकारियों को उस संबंधित पुलिस स्टेशन से अनापत्ति प्रमाण पत्र (एनओसी) लेना होता है, जिसके अधिकार क्षेत्र में वह स्थल आता है। अगर मार्च एक से ज्यादा पुलिस स्टेशनों के अधिकार क्षेत्र से गुजरता है, तो पुलिस उपायुक्त (डीसीपी) या कमिश्नरेट कार्यालय से एनओसी लेना अनिवार्य है।
पुलिस कब प्रदर्शन-मार्च रोक सकती है, इजाजत से मना कर सकती है?
मार्च को रोकने की सही वजह हो
अगर पुलिस को लगता है कि प्रदर्शन से सार्वजनिक व्यवस्था बिगड़ेगी, देश की संप्रभुता या सुरक्षा को खतरा होगा, विदेशी राज्यों के साथ संबंध प्रभावित होंगे, नैतिकता का उल्लंघन होगा, या किसी अपराध को बढ़ावा मिलेगा, तो वह अनुमति देने से मना कर सकती है। अदालत की अवमानना या मानहानि की आशंका होने पर भी अनुमति रोकी जा सकती है।
2. उचित सुरक्षा कारण हों
इसके अलावा भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 163 (पूर्व में सीआरपीसी की धारा 144) के तहत निषेधाज्ञा लागू कर सकते हैं। इसके तहत किसी संवेदनशील क्षेत्र या मार्ग पर बिना अनुमति के मार्च निकालने, भीड़ एकत्र करने पर प्रतिबंध लगाया जा सकता है। अगर कोई शांतिपूर्ण प्रदर्शन चल रहा हो, तो भी सुरक्षा कारणों से उसे इस धारा के तहत मार्च को निरस्त किया जा सकता है या कर्फ्यू लगाकर रोका जा सकता है। अनुमति खारिज होने या वापस लेने की स्थिति में अधिकारियों को लिखित में इसका स्पष्ट कारण और खतरे की प्रकृति बतानी होती है।
3. जुटाव गैरकानूनी हो
भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) के मुताबिक, पांच या उससे ज्यादा लोगों के जुटाव को तब गैर-कानूनी सभा घोषित किया जा सकता है, जब उसका मकसद आपराधिक बल का इस्तेमाल, कानूनी प्रक्रिया का विरोध करना या कोई अपराध करना हो। एक सभा जो शुरुआत में कानूनी थी, वह भी अपने बर्ताव में बदलाव की वजह से बाद में गैर-कानूनी हो सकती है।
ये भी पढ़ें: Jharkhand: ‘गुरुजी जिंदा होते तो हमारे साथ खड़े होते’, शिबू सोरेन का नाम लेकर देवेंद्र नाथ महतो ने साधा निशाना
इसके अलावा भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 163 (पूर्व में सीआरपीसी की धारा 144) के तहत निषेधाज्ञा लागू कर सकते हैं। इसके तहत किसी संवेदनशील क्षेत्र या मार्ग पर बिना अनुमति के मार्च निकालने, भीड़ एकत्र करने पर प्रतिबंध लगाया जा सकता है। अगर कोई शांतिपूर्ण प्रदर्शन चल रहा हो, तो भी सुरक्षा कारणों से उसे इस धारा के तहत मार्च को निरस्त किया जा सकता है या कर्फ्यू लगाकर रोका जा सकता है। अनुमति खारिज होने या वापस लेने की स्थिति में अधिकारियों को लिखित में इसका स्पष्ट कारण और खतरे की प्रकृति बतानी होती है।
3. जुटाव गैरकानूनी हो
भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) के मुताबिक, पांच या उससे ज्यादा लोगों के जुटाव को तब गैर-कानूनी सभा घोषित किया जा सकता है, जब उसका मकसद आपराधिक बल का इस्तेमाल, कानूनी प्रक्रिया का विरोध करना या कोई अपराध करना हो। एक सभा जो शुरुआत में कानूनी थी, वह भी अपने बर्ताव में बदलाव की वजह से बाद में गैर-कानूनी हो सकती है।
ये भी पढ़ें: Jharkhand: ‘गुरुजी जिंदा होते तो हमारे साथ खड़े होते’, शिबू सोरेन का नाम लेकर देवेंद्र नाथ महतो ने साधा निशाना
कब और कैसे पुलिस को प्रदर्शन के दौरान बल प्रयोग का अधिकार?
संविधान और देश का कानून पुलिस को व्यवस्था बनाए रखने के अधिकार तो देता है, लेकिन प्रदर्शन के दौरान बल प्रयोग (जैसे लाठीचार्ज या आंसू गैस का इस्तेमाल) करने के पुलिस के अधिकार पूरी तरह से सीमित और कड़े नियमों के दायरे में हैं।पुलिस कब बल प्रयोग कर सकती है?
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) के तहत अगर कोई जुटाव गैर-कानूनी हो जाता है या सार्वजनिक शांति भंग करने की आशंका पैदा करती है, तो कार्यकारी मजिस्ट्रेट या अधिकृत पुलिस अधिकारी उसे खुद से तितर-बितर होने का आदेश दे सकते हैं। अगर वह भीड़ इस आदेश का पालन नहीं करती है, तभी कानून के तहत उसे बल प्रयोग के जरिए तितर-बितर करने की अनुमति मिलती है।
पुलिस कैसे बल प्रयोग कर सकती है?
कानून या पुलिस मैनुअल अधिकारियों को मनमाना या असीमित बल प्रयोग करने की छूट नहीं देते। इसके लिए कुछ तय अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय सुरक्षा मानकों का पालन करना अनिवार्य है।
अंतरराष्ट्रीय कानून
- फोटो : Amar Ujala
चेतावनी और सलाह पहला कदम: भारत में पुलिस आचार संहिता यह निर्धारित करती है कि पुलिस को जहां तक संभव हो, सीधे बल प्रयोग करने के बजाय समझाने, सलाह देने और चेतावनी देने के तरीकों का इस्तेमाल करना चाहिए।
कम से कम बल प्रयोग: पुलिस को बल प्रयोग की इजाजत तब ही है, जब भीड़ को रोकने के लिए यह बिल्कुल ही जरूरी हो जाए, तब भी पुलिस केवल उतना ही न्यूनतम बल इस्तेमाल कर सकती है जो भीड़ को तितर-बितर करने के लिए बेहद जरूरी हो।
अनुपातिकता और जरूरत का आधार: संयुक्त राष्ट्र (यूएन) के बुनियादी सिद्धांतों के तहत बल का प्रयोग हमेशा कानूनी, जरूरत के हिसाब से और आनुपातिक होना चाहिए। यानी, भीड़ की तरफ से पैदा किए गए खतरे और पुलिस की ओर से इस्तेमाल किए गए बल के बीच एक तार्किक संतुलन होना चाहिए।
कम से कम बल प्रयोग: पुलिस को बल प्रयोग की इजाजत तब ही है, जब भीड़ को रोकने के लिए यह बिल्कुल ही जरूरी हो जाए, तब भी पुलिस केवल उतना ही न्यूनतम बल इस्तेमाल कर सकती है जो भीड़ को तितर-बितर करने के लिए बेहद जरूरी हो।
अनुपातिकता और जरूरत का आधार: संयुक्त राष्ट्र (यूएन) के बुनियादी सिद्धांतों के तहत बल का प्रयोग हमेशा कानूनी, जरूरत के हिसाब से और आनुपातिक होना चाहिए। यानी, भीड़ की तरफ से पैदा किए गए खतरे और पुलिस की ओर से इस्तेमाल किए गए बल के बीच एक तार्किक संतुलन होना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट की ओर से क्या हैं बल प्रयोग पर हिदायतें?
भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने भी पुलिस की ओर से किए जाने वाले बल प्रयोग की सीमाओं को बेहद कड़े शब्दों में परिभाषित किया है। इससे जुड़े दो खास मामले सामने आते हैं...रामलीला मैदान मामला (2012): सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पुलिस की तरफ से किया जाने वाला कोई भी बल प्रयोग हमेशा बेहद संयम के साथ और सिर्फ उतनी ही सीमा तक होना चाहिए जितना कि अपरिहार्य रूप से जरूरी हो।
अनीता ठाकुर बनाम जम्मू-कश्मीर राज्य (2016): इस मामले में न्यायालय ने यह ऐतिहासिक व्यवस्था दी कि पुलिस की ओर से अत्यधिक बल प्रयोग नागरिकों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है और ऐसी ज्यादती के लिए पीड़ित मुआवजा पाने के हकदार हैं।