देश के आजाद होने के बाद सन् 1947 में 26 अगस्त को भोपाल रियासत ने भारत में शामिल होने का एलान किया था लेकिन भोपाल रियासत ने अपने यहां दो साल भारत का तिरंगा नहीं लहराया बल्कि अपना अलग झंडा लहराता रहा। हालांकि एक सैद्धान्तिक सहमति के बावजूद भोपाल रियासत का भारत में औपचारिक विलय साल 1949 को हुआ था।
कश्मीर, हैदराबाद की तरह भोपाल रियासत भी भारत में विलय के पक्ष में नहीं थी, जानिए इसका इतिहास
भोपाल के नवाब का समर्थन मुस्लिम लीग को
साल 1926 में भोपाल के नवाब बने हमीदुल्लाह खान मुस्लिम लीग के सक्रिया सदस्य थे और 1930-32 में हुए गोलमेज सम्मेलन में खास प्रतिनिधि भी चुने गए थे। पूरे जग में मोहम्मद अली जिन्ना और हमीदुल्लाह खान की दोस्ती और वफादारी के किस्से गूंजते थे।
बावजूद इसके साल 1947 में जब भारत और पाकिस्तान में से किसी एक को चुनने की बात आई तो हमीदुल्लाह ने कश्मीर, हैदराबाद, सिक्किम जैसी रियासतों की तरह खुद के लिए अपनी एक स्वायत्त रियासत की दलील दी और दोनों विकल्पों में विलय करने के लिए मना कर दिया।
माउंटबेटन ने भोपाल रियासत की अपील की खारिज
भोपाल के स्वतंत्र रियासत बने रहने की हमीदुल्लाह की अपील को माउंटबेटन ने खारिज किया और लिखा था कि दो देशों के बीच में एक छोटी सी रियासत कैसे स्वतंत्र स्टेट बनकर रह सकती है। क्योंकि आजादी का दिन पास आ रहा था, इसलिए रियासतों के नवाबों के लिए किसी एक विकल्प के साथ जाना मजबूरी हो गया था।
जब भोपाल के नवाब हमीदुल्लाह ने जाना कि उनके दोस्त और कुछ रियासतें भारत में शामिल हो रही हैं तो साल 1947 में उन्होंने भी भारत में शामिल होने में अपनी सहमति दर्ज कर दी। हालांकि कुछ समय तक हमीदुल्लाह इसी कोशिश में लगे रहे कि भोपाल रियासत एक स्वतंत्र रियासत बनकर उभरे।
विलय के लिए आंदोलन की शुरुआत
हमीदुल्लाह ने भारत सरकार के साथ वार्तालाप के दौरान भोपाल के एक स्वतंत्र राज्य घोषित करने की वकालत की। वास्तव में मसला यह था कि भोपाल एक मुस्लिम नवाबी स्टेट था लेकिन वहां आबादी हिंदू बहुल थी। जब नवाब के अलग रहने की इच्छा सामने आई तो दिसंबर 1948 में भोपाल में एक जनआंदोलन शुरू हुआ।
जब नवाब हज के लिए गए हुए थे तो शंकरदयाल शर्मा, भाई रतन कुमार गुप्ता जैसे नेताओं के नेतृत्व में भोपाल के भारत में विलय के लिए 'विलीनीकरण आंदोलन' शुरू हुआ। जैसे-जैसे आंदोलन ने जोर पकड़ा तो वैसे ही नवाबी व्यवस्था ने इसे कुचलने की कोशिश भी की, जिसमें कुछ आंदोलनकारी शहीद हुए और शर्मा जैसे कुछ नेताओं को कई महीनों के लिए जेल में रहना पड़ा।
आंदोलन के बाद वल्लभभाई पटेल का हस्तक्षेप
भोपाल में आंदोलन इतना तेज भड़का कि नवाबी पुलिस ने आंदोलनकारियों पर गोलियां चलवा दीं और इसमें कई आंदोलनकारी शहीद हो गए। तब सरदार पटेल ने अपने दूत वीपी मेनन को स्थिति को काबू में करने के लिए कहा था। मेनन ने भोपाल के नवाब पर दबाव बनाया और साथ में एक करार किया। जिसके बाद एक जून 1949 तक भोपाल भारत में शामिल हुआ। अब पहली बार भोपाल में औपचारिक रूप से तिरंगा लहराया और नवाबी झंडा उतारा गया।
भोपाल में पहले कमिश्नरी व्यवस्था लागू हुई
साल 1949 में भोपाल के भारत में विलय होने के बाद भारत के राष्ट्रपति ने वहां सबसे पहले मुख्य कमिश्नर की नियुक्ति की और शासन संभालने का आदेश दिया। सिंध क्षेत्र से आने वाले शरणार्थियों के लिए भोपाल के पश्चिम के उपनगर बैरागढ़ में रिहाइश की व्यवस्था की गई। साल 1952 में यहां पहली बार चुनाव हुए और तब शंकरदयाल शर्मा पहले मुख्यमंत्री बने।
