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कुरुक्षेत्र: महिला आरक्षण बनेगा भविष्य की राजनीति का सबसे बड़ा मुद्दा! क्या जनता के बीच जाएंगे प्रधानमंत्री?

Vinod Agnihotri विनोद अग्निहोत्री
Updated Mon, 20 Apr 2026 12:12 PM IST
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सार

महिला आरक्षण भविष्य की राजनीति का सबसे बड़ा मुद्दा बन सकता है। संसद के विशेष सत्र में संविधान संशोधन पर हुई चर्चा और विधेयकों के पारित कराने में मिली विफलता के बाद पीएम मोदी ने कांग्रेस समेत कई विपक्षी दलों को आड़े हाथ लिया है। अब सवाल ये है कि क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस मुद्दे पर जनता के बीच जा सकते हैं? पढ़ें विश्लेषण

Kurukshetra 33pc Women Quota Biggest Issue of Future Politics Will PM Modi raise opposition issue among People
2023 के महिला आरक्षण कानून को लागू करने की अधिसूचना जारी - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार

लोकसभा में महिला आरक्षण को लेकर सरकार द्वारा लाया गया संशोधन विधेयक आवश्यक संख्या बल न जुटा पाने की वजह से गिर गया. इसे जहां कांग्रेस समेत पूरा विपक्ष मोदी सरकार के पिछले 12 वर्षों में पहली बार संसद में अपनी जीत के रूप में देख रहा है, वहीं सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी अभी मैदान छोड़ने को तैयार नहीं है। दोनों ही पक्ष महिला आरक्षण की तलवार लेकर एक दूसरे के सामने डट गए हैं। इस मुद्दे पर उनके बीच होने वाली तकरार से भविष्य की राजनीति की दिशा तय होगी। क्या महिलाओं के राजनीतिक आर्थिक सशक्तीकरण को बड़ा राष्ट्रीय मुद्दा बनाकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समय से पहले नया जनादेश मांगने जनता के बीच जा सकते हैं?

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विधेयक गिरने के अगले दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्र के नाम अपने संबोधन में दिए गए अपने पूरे भाषण में इसी मुद्दे को लेकर विपक्ष पर जमकर हमला किया। प्रधानमंत्री ने विपक्ष के इस कदम को देश की महिलाओं के राजनीतिक सशक्तीकरण के खिलाफ बताते हुए कहा कि कांग्रेस और विपक्ष ने महिला आरक्षण की भ्रूण हत्या कर दी। जवाब में विपक्ष की तरफ से कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी ने कमान संभाली और संवाददाता सम्मेलन को संबोधित करते हुए सरकार को चुनौती दी कि यदि वह संसद और विधानसभाओं में महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण देने के प्रति जरा भी गंभीर है तो लोकसभा की मौजूदा 543 सीटों का एक तिहाई महिलाओं के लिए तत्काली आरक्षित करने का विधेयक लेकर आए, पूरा विपक्ष उसका समर्थन करेगा। सरकार और विपक्ष के इन तेवरों से साफ है कि देश की राजनीति में अब प्रमुख मुद्दा महिला आरक्षण ही होगा। जिसे सत्ता पक्ष और विपक्ष अपने-अपने तरीके से जनता के बीच ले जाएंगे। अब देखना है कि देश की आधी आबादी यानी महिलाएं किसके माथे पर अपने समर्थन का तिलक लगाकर उसे सत्ता के सिंहासन तक पहुंचाती हैं।
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सवाल है कि जो मोदी सरकार अपना हर कदम फूंक-फूंक कर नफा-नुकसान का हिसाब लगाकर उठाती है। खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह सारी रणनीति तय करते हैं और उसे अंजाम देते हैं. पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के दौरान लोकसभा के बजट सत्र को बढ़ाकर तीन दिन की विशेष बैठक बुलाकर उसमें इतनी हड़बड़ी में महिला आरक्षण कानून 2023 में संविधान संशोधन लाने, 2011 की जनगणना के आंकड़ों को आधार बनाकर नया परिसीमन करके लोकसभा की सीटें 850 तक करके उसमें महिलाओं के लिए एक तिहाई आरक्षित करने का विधेयक लाने की क्या जरूरत पड़ गई. वह भी तब जब सरकार अच्छी तरह जानती थी कि उसके पास संसद के दोनों सदनों में सांविधानिक संशोधन मंजूर कराने के लिए आवश्यक दो तिहाई सदस्य नहीं हैं। फिर लोकसभा में विधेयक पर बहस के दौरान जिस तरह पूरा विपक्ष एकजुट दिखा उससे यह साफ हो गया था कि संविधान संशोधन का मंजूर होना मुमकिन नहीं है। तब सरकार अपनी फजीहत से बचने के लिए विधेयकों को किसी संसदीय समिति को भेजकर कुछ समय के लिए टाल सकती थी। लेकिन उसने ऐसा न करके मत विभाजन का रास्ता क्यों अख्तियार किया? क्यों गुजरात से लेकर केंद्र तक अपने 25 साल के संसदीय और विधायी जीवन में कभी पराजय का मुंह न देखने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके सबसे भरोसेमंद सिपहसालार गृह मंत्री अमित शाह ने ऐसा होने दिया। इसके पीछे आखिर उनकी क्या रणनीति है। क्या ये कदम सिर्फ प.बंगाल और तमिलनाडु के विधानसभा चुनावों भाजपा को राजनीतिक फायदा देने के लिए उठाया गया और अब भाजपा महिलाओं के राजनीतिक सशक्तीकरण के मुद्दे को लेकर इन चुनावों में महिलाओं के वोट पाने की उम्मीद कर रही है या फिर उनकी रणनीति इससे भी बड़े किसी राजनीतिक लाभ पाने के लिए है। ये सारे सवाल सियासी गलियारों में पूछे जा रहे हैं और हर कोई अपने-अपने हिसाब से इनके जवाब तलाश रहा है और दे रहा है।

अपनी हार को जीत में और अपने ऊपर होने वाले हमलों को अपना हथियार बनाने की राजनीतिक कला में माहिर रहे नरेंद्र मोदी गुजरात के दिनों से ही बाहर भीतर के विरोधियों पर हमेशा भारी पड़ते रहे हैं। इसलिए ये बात किसी के भी गले नहीं उतर रही है कि उन्हें कैसे महिला आरक्षण के नारी शक्ति वंदन अधिनियम 2023 के संशोधन विधेयक के राजनीतिक भविष्य का अंदाज नहीं रहा होगा। ज्यादातर की राय यही है कि सरकार के इस कदम के पीछे मोदी की कोई बड़ी दीर्घकालिक रणनीति है। जबकि विपक्षी नेताओं का मानना है कि सरकार का अति आत्मविश्वास अब सत्ता के अहंकार में बदल चुका है इसलिए मोदी सरकार को लगता था कि वह महिला आरक्षण की गुलाबी पैकिंग के भीतर सीटों के परिसीमन का विधेयक लेकर आएगी तो विपक्ष संसद में विरोध नहीं कर पाएगा और सरकार अपनी सुविधा और सियासी गणित के मुताबिक लोकसभा की सीटों के ढांचे को मनमाने तरीके से बदलकर भविष्य में अपनी जीत की गारंटी सुनिश्चित कर लेगी। लेकिन विपक्ष इस चाल को भांप गया और उसने महिला आरक्षण के बजाय सीटों के परिसीमन को मुद्दा बनाकर सभी विपक्षी दलों को एकजुट करके विधेयक सदन में गिरा दिया।

अब जहां भाजपा इसे महिला आरक्षण की राह में बाधा का मुद्दा बनाकर विपक्ष को महिला विरोधी साबित करने में जुट गई है तो कांग्रेस और अन्य सभी विपक्षी दल परिसीमन की योजना को संघवाद संविधान और लोकतंत्र विरोधी बताकर सरकार को कटघरे में खड़ा कर रहे हैं। महिला आरक्षण को लेकर विपक्ष ने एक स्वर से मांग की है कि सरकार 2023 में सर्वसम्मति से पारित महिलाओं को संसद और विधानसभाओं में एक तिहाई आरक्षण देने वाले नारी शक्ति वंदन अधिनियम-2023 को तत्काल लोकसभा की मौजूदा 543 सीटों में लागू करके एक तिहाई 181 सीटें तत्काल महिलाओं के लिए आरक्षित करे, विपक्ष पूरा साथ देगा। लेकिन सरकार इस पर विपक्ष के साथ कोई संवाद करने और महिला आरक्षण जल्दी से जल्दी लागू करने के लिए कोई रास्ता निकालने की बजाय संसद में संशोधन विधेयक गिरने को मुद्दा बनाकर जनता के बीच विपक्ष को खलनायक बनाकर महिलाओं के एकमुश्त वोटों की फसल काटना चाहती है।

सियासी गलियारों में एक कयास ये भी है कि 2024 के लोकसभा चुनावों में चार सौ पार का नारा देने वाली भाजपा के बहुमत के लिए जरूरी 272 के आंकड़े से भी कम महज 240 सीटों पर सिमटने की टीस से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अभी तक उबर नहीं सके हैं। इसलिए एक बड़ी रणनीति के तहत महिला आरक्षण को राजनीतिक मुद्दा बनाकर महिलाओं के बीच विपक्ष खासकर कांग्रेस को खलनायक की तरह पेश करने का देशव्यापी अभियान चलाकर पार्टी यह अंदाज लगाएगी कि इसक महिलाओं पर कितना असर हो रहा है।

जिस तरह पिछले कुछ वर्षों से राज्यों  के चुनावों में महिलाएं एक अलग जनाधार के रूप में आगे आई हैं और मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, हरियाणा, दिल्ली, बिहार और झारखंड में उनके वोटों से ही सरकारें बनी हैं। जो दांव अन्य राज्यों में भाजपा और एनडीए की जीत की चाबी बना, वही दांव झारखंड में हेमंत सोरेन ने आजमा कर अपनी सत्ता वापसी कर ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अब इसी प्रयोग को राष्ट्रीय स्तर पर लोकसभा चुनावों में करना चाहते हैं। इसलिए महिला आरक्षण संशोधन विधेयक की सारी कवायद की गई और विधेयक के गिरने के बाद भाजपा का पूरा प्रचार तंत्र इसे भुनाने में जुट गया है। कहा जा रहा है कि अगर यह दांव परवान चढ़ता दिखा तो मुमकिन है मोदी सरकार मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और बिहार की तर्ज पर देश भर में महिलाओं के लिए एक निश्चित धनराशि उनके खातों में भेजकर, उनके वोट की गारंटी तय करने की कोशिश कर सकती है।

कहा तो ये भी जा रहा है कि अगर सब कुछ तय योजना के मुताबिक हुआ तो जरूरी नहीं है कि 2029 तक इंतजार किया जाए सरकार अगले साल 2927 के मार्च अप्रैल जब उत्तर प्रदेश, पंजाब, उत्तराखंड के चुनाव होने हैं, उनके साथ ही लोकसभा के मध्यावधि चुनाव का दांव भी खेल सकती है। अब विपक्ष इस रणनीति की काट कैसे करेगा ये बड़ा सवाल है। सरकार के इस दांव की संभावना से इनकार न करने वाले एक भाजपा नेता का कहना है कि जिस तरह पहले मध्य प्रदेश फिर महाराष्ट्र और फिर बिहार में महिलाओं के आर्थिक सशक्तीकरण ने राज्य सरकारों के खिलाफ सत्ता विरोधी लहर को खत्म करके इन राज्यों में भारी बहुमत से  भाजपा और एनडीए की सरकारों की वापसी संभव कराई तो यही प्रयोग देश में क्यों नहीं सफल हो सकता।

कुछ इसी तरह 2013 में जब तत्कालीन यूपीए सरकार मनरेगा सहित तमाम सरकारी योजनाओं के लाभार्थियों के खातों में नकदी भेजने की सीबीटी (कैश बेनीफिट ट्रांसफर) योजना लेकर आई थी तब तत्कालीन केंद्रीय मंत्रियों और सांसदों को पूरी उम्मीद थी कि अब 2014 में यूपीए की तीसरी बार वापसी मुमकिन हो जाएगी। लेकिन यूपीए सरकार इस योजना को पूरी तरह लागू नहीं कर पाई और कुछ योजनाओं के लाभार्थियों के खातों में एक किश्त भेजने के बावजूद नरेंद्र मोदी की लहर में लोकसभा चुनावों में यूपीए पूरी तरह धराशायी हो गया। कुछ ऐसा ही 2004 में इंडिया शाईनिंग और फील गुड फैक्टर वाली अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार के साथ भी हुआ था।

दरअसल साल 2026 की शुरुआत में सत्ता पक्ष और विपक्ष के दो अलग-अलग राजनीतिक विमर्श सामने आए थे। जहां विपक्षी दल कांग्रेस ने केंद्र सरकार द्वारा महात्मा गांधी ग्रामीण रोजगार गारंटी कानून (मनरेगा) को बदल कर विकसित भारत गारंटी रोजगार एवं आजीविका मिशन (ग्रामीण) (वीबीजीरामजी) और यूपीए सरकार की ग्रामीण भारत रोजगार गारंटी योजना से महात्मा गांधी का नाम हटाने को देशव्यापी मुद्दा बनाने की कोशिश की थी और उधर सत्ता पक्ष ने जनवरी के महीने में ही सोमनाथ मंदिर के ध्वंस के एक हजार साल पूरे होने पर राष्ट्र गौरव के प्रतीक सोमनाथ उत्सव मनाते हुए हिंदुत्व के मुद्दे पर धार चढ़ाने की मुहिम चलाई थी।

जहां विपक्ष के मनरेगा आंदोलन की कमान खुद लोकसभा में नेता विपक्ष राहुल गांधी ने संभाली तो राष्ट्र गौरव सोमनाथ उत्सव की मुहिम का पूरा आख्यान स्वंय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश के सभी अखबारों में लिखे अपने लेख से तैयार किया था। लेकिन पक्ष विपक्ष का परस्पर विरोधी यह राजनीतिक विमर्श ज्यादा दूर तक नहीं चल पाया। अब जब महिलाओं के सशक्तीकरण को लेकर पक्ष-विपक्ष का ये नया सियासी विमर्श शुरु हुआ है तो ये क्या रंग लेगा और महिलाओं के समर्थन का तिलक किसे लगेगा, इसकी कुछ झलक पांच राज्यों के चुनाव नतीजों से मिल सकती है लेकिन भविष्य के गर्भ में क्या छिपा है इसे कौन जान सकता है?

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