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#KabTakNirbhaya: न्याय में देर भी अंधेर है... 16 दिसंबर की उस काली रात का इंसाफ अभी बाकी है

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: योगेश साहू Updated Mon, 16 Dec 2019 03:36 AM IST
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Nirbhaya Case 16 December 2012 : Delay in justice is also Injustice culprits still to Be hanged
निर्भया - फोटो : self

देश की राजधानी में आज ही के दिन निर्भया कुछ दरिंदों की हैवानियत का शिकार हुई थी। पूरे सात साल बीतने के बाद भी इन दरिंदों में से चार को सुनाई गई सजा नहीं दी जा सकी है। कहने को बेटियों को तत्काल न्याय दिलाने के लिए सख्त कानून भी बन गया लेकिन देशभर की निर्भयाओं को न्याय मिल पाना आज भी असंभव कार्य जैसा बना हुआ है। अधिकतर पीड़िताओं की चीखें तो थानों की देहरी पर ही दम तोड़ देती हैं। अदालत तक पहुंची लड़ाई भी कानूनी दांव-पेचों में उलझकर लंबे संघर्ष में बदल जाती है। दरिंदगी की कहानी, निर्भया की जुबानी....

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Nirbhaya Case 16 December 2012 : Delay in justice is also Injustice culprits still to Be hanged
इसी बस में हुई थी हैवानियत - फोटो : अमर उजाला

हैवानियत ने मेरे सपने कुचल दिए...इंसाफ के इंतजार में बिलख रही है मेरी रूह
यूपी के एक गांव से अपने सपनों और मम्मी-पापा की उम्मीदों को पूरा करने के लिए मैं 23 साल की उम्र में देश की राजधानी दिल्ली आई थी। पैरामेडिकल में दाखिला लिया। मन में जीवन की जंग जीतने को हर तकलीफ पार करने का जज्बा था। पर मैं हार गई। हारी भी तो किससे... जिंदगी से नहीं, बल्कि हैवानियत से। चलती बस में जघन्य बलात्कार की शिकार हुई। ऐसी क्रूरता कि मेरी आंतें तक बाहर आ गईं। ऐसे जख्म मिले कि मेरी रूह तक से भी खून की बूंदें टपकती हैं।

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Nirbhaya Case 16 December 2012 : Delay in justice is also Injustice culprits still to Be hanged
Nirbhaya Rape Case

पहले दरिंदों, फिर व्यवस्था की हुई शिकार...
....और जैसे यह काफी नहीं था तो मुझे न्याय दिलाने को लड़ रहे मेरे मां-पापा अब न्यायिक और कानूनी पेचीदगियों की हैवानियत के शिकार बन रहे हैं।

कौन हूं मैं, क्या आपको याद है...
भले ही मैं अब आप लोगों के बीच नहीं, लेकिन आज भी रोज अन्याय का जहर पी रही हूं। अरे, आप लोग तो मुझे भूल गए होंगे। मैं निर्भया हूं। आप ही लोगों ने तो मुझे यह नाम दिया था। वही निर्भया जिसके साथ छह लोगों ने 16 दिसंबर 2012, रविवार की रात चलती बस में हैवानियत की थी। 

आंखों से आंसू गिर रहे हैं। गला भरा है। आवाज नहीं निकल रही। फिर भी मैं आपके लिए उस भयावह काली रात को दोहराती हूं। दोस्त के साथ उस रात फिल्म देखने के बाद मुनिरका से द्वारका जाने वाली बस में बैठी थी। बस में हम दोनों के अलावा छह लोग थे। कुछ समझ पाती इससे पहले ही सभी ने मेरे साथ छेड़छाड़ शुरू कर दी। दोस्त ने बीच-बचाव किया तो उसे बुरी तरह पीटकर बेहोश कर दिया।

Nirbhaya Case 16 December 2012 : Delay in justice is also Injustice culprits still to Be hanged
nirbhaya case - फोटो : सोशल मीडिया

ऐसे ही होते होंगे हैवान...
मैं चीखती रही। चिल्लाती रही। बहुत हाथ-पैर जोड़े पर दरिंदों को मुझपर रहम नहीं आया। सभी ने मेरे साथ वो सब कुछ किया जो एक जल्लाद या कसाई भी किसी के साथ करने की हिम्मत नहीं जुटा पाता है। पीटा-बलात्कार किया, शरीर में लोहे का सरिया घुसा दिया। फिर, मरा हुआ जानकार निर्वस्त्र ही चलती बस से बाहर फेंक दिया। उन जख्मों के आंसू मेरी आंखों से आज भी गिरते हैं, रूह उस खौफनाक रात को याद कर आज भी तड़पती है।

फिर मैं बेटी से एक मुद्दा बन गई...
पुलिस ने मुझे सफदरजंग अस्पताल पहुंचाया। डॉक्टरों ने पांच बार ऑपरेशन किया। आंत का अधिकतर हिस्सा बाहर निकाल दिया। जख्म इतने गहरे थे कि मेरी हालत बिगड़ती चली गई। 26 दिसंबर को सरकार ने मुझे इलाज के लिए सिंगापुर भेज दिया। सबको पता था मैं बच नहीं सकती। मैं सभी के लिए मुद्दा बन गई थी।

सब अपनी साख बचाने में लगे थे। आखिरकार वही हुआ जो सब जानते थे। मैं बच नहीं सकी। 29 दिसंबर की रात करीब सवा दो बजे मैंने सिंगापुर के अस्पताल में दम तोड़ दिया। फिर मुझे गम और गुस्से के साथ पंचतत्त्व में विलीन कर दिया गया।

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Nirbhaya Case 16 December 2012 : Delay in justice is also Injustice culprits still to Be hanged
प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay

कानून ने मेरे दोषियों को बचा लिया...
मेरे साथ हुई हैवानियत पर पूरे देश में गुस्सा था। सब ‘तत्काल न्याय और सजा’ देने की मांग कर रहे थे, पर ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। क्यों... क्योंकि कानून की किताबों में इसका प्रावधान ही नहीं था। घटना के कुछ दिन बाद पुलिस ने सभी छह आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया। एक (राम सिंह) ने तो जेल में आत्महत्या कर ली।

एक नाबालिग होने के आधार पर बच गया। और आज 7 साल बाद भी मुझे मौत की नींद सुलाने वाले बाकी चार दरिंदे अब भी तिहाड़ में मटन खा रहे हैं। और यहां न्याय के इंतजार में मेरी आत्मा अब भी बिलख रही है।

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