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#KabTakNirbhaya: और ये भी मामले, दुष्कर्मी न्यायिक प्रक्रिया का यूं उठाते हैं फायदा

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: संजीव कुमार झा Updated Mon, 16 Dec 2019 03:16 AM IST
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Nirbhaya Case 16 December 2012 : Sexual assault accused take advantage of judicial process like this
निर्भया केस के दोषी - फोटो : Social Media

देश में दुष्कर्म के मामलों में जल्द न्याय की मांग पहली बार नहीं उठी है, लेकिन हैदराबाद मामले जैसा गुस्सा कम ही देखने को मिला है। वक्त-वक्त पर कई मामलों ने लोगों की सामूहिक चेतना को झकझोर दिया। धीमी और लचर दंड व्यवस्था ने भी इस गुस्से को बढ़ाने का काम किया।

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Nirbhaya Case 16 December 2012 : Sexual assault accused take advantage of judicial process like this
priyadarshini mattoo

प्रियदर्शिनी मट्टू दुष्कर्म-हत्याकांड : जज ने कहा, मुझे मालूम है तुमने हत्या की है, लेकिन छोड़ रहा हूं क्योंकि...

कानून की पढ़ाई करने जम्मू से दिल्ली यूनिवर्सिटी आई प्रियदर्शिनी मट्टू को उसके सीनियर संतोष सिंह ने परेशान करना शुरू कर दिया। पुलिस अधिकारी जेपी सिंह का बेटा होने के नाते संतोष ने बिना डर उसका पीछा करना, अशोभनीय प्रस्ताव रखना और परेशान करना जारी रखा।

कई दफे शिकायत पर प्रियदर्शिनी को पुलिस सुरक्षा दी गई। तृतीय वर्ष में पहुंच चुकी प्रियदर्शिनी अपने चाचा के घर पर रह रही थी। 23 जनवरी 1996 को संतोष यहां आया। तब पुलिसकर्मी भी मौजूद नहीं था।

संतोष ने दुष्कर्म के बाद प्रियदर्शिनी की बिजली के तार से गला दबाकर हत्या कर दी। 14 बार हेलमेट से मार कर मट्टू का चेहरा भी विकृत कर दिया।

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न्याय के लिए संघर्ष

प्रियदर्शिनी के पिता चमन लाल के लिए न्याय पाने का संघर्ष आसान नहीं रहा। पुडुचेरी के आईजी रहे जेपी सिंह निचली अदालत में सुनवाई के दौरान ही दिल्ली पुलिस में ज्वॉइंट कमिश्नर बन गए। नतीजा, 1999 में कोर्ट ने संतोष को बरी कर दिया।

जज जीपी थरेजा ने लिखा, ‘मैं जानता हूं कि तुमने अपराध किया है... लेकिन साक्ष्यों के अभावों में रिहा करने के लिए बाध्य हूं।’ दिल्ली पुलिस ने साक्ष्य जमा करने में पक्षपात किया। आशंका थी कि ऐसा जेपी सिंह के दबाव में हुआ।

बाद में दिल्ली हाईकोर्ट में अपील की गई। जहां छह साल बाद अक्तूबर 2006 में परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के आधार पर संतोष को दोषी मानते हुए फांसी की सजा दी गई।

फांसी उम्रकैद में बदली, अब पेरोल पर पेरोल

इसके खिलाफ हुई अपील के बाद सुप्रीम कोर्ट ने संतोष को दोषी तो माना, लेकिन उसकी सजा फांसी के बजाय उम्रकैद करने का हुक्म दिया। मार्च 2011 में संतोष पहली दफा पेरोल पर बाहर आया। इसके बाद समय-समय पर उसे कई पेरोल मिले। इसी वर्ष मई में उसे एलएलएम परीक्षा के लिए तीन हफ्ते का पेरोल मिला।

Nirbhaya Case 16 December 2012 : Sexual assault accused take advantage of judicial process like this
भंवरी देवी मामला - फोटो : Social Media

भंवरी देवी सामूहिक दुष्कर्म : 27 साल बाद भी इंसाफ नहीं

जयपुर से 55 किमी दूर भटेरी गांव में रहने वाली भंवरी देवी गांव के कुछ जातिवादी लोगों के निशाने पर थीं। वे 90 के दशक से यहां बाल विवाह रोकने का काम सरकार के लिए ‘साथिन’ (सरकार द्वारा बनाई गई कार्यकर्ता) के रूप में कर रही थीं। 1992 में पांच मई के आखातीज के दिन पर सरकार ने बाल विवाह रोकने का विशेष अभियान चलाया।

भंवरी देवी के गांव का एक व्यक्ति रामकरन अपनी नौ महीने की नवजात बेटी का विवाह करने जा रहा था। समझाने से परिवार न माना तो एसडीओ और डीवाईएसपी को सूचित किया गया, जिन्होंने विवाह रुकवा दिया। लेकिन, रात दो बजे गांववालों ने विवाह कर दिया और कोई पुलिस कार्रवाई नहीं हुई।

इस घटना के बाद भंवरी देवी के परिवार का गांव ने बहिष्कार कर दिया। 22 सितंबर की शाम अपने पति के साथ खेत में काम कर रही भंवरी देवी पर हमला हुआ। पति को लाठियों से पीटकर अधमरा कर दिया गया। हमलावरों में रामकरन सहित पांच लोग थे। इनमें से तीन ने उसके साथ सामूहिक दुष्कर्म किया।

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विरोध में कैंडल मार्च

पुलिस, डॉक्टर, मजिस्ट्रेट... सभी जगह अपमानित

अपने साथ हुए अपराध के बाद भंवरी देवी ने ब्लॉक स्तर कार्यकर्ता से संपर्क किया और बस्सी पुलिस स्टेशन पहुंचीं। यहां बमुश्किल एफआईआर दर्ज की गई, लेकिन भंवरी को साक्ष्य के रूप में उसका लहंगा जमा करने को कहा गया।

अपने पति के खून सने साफे से खुद को ढक कर, उसे रात एक बजे पैदल तीन किमी दूर स्वास्थ्य केंद्र जाना पड़ा। यहां महिला डॉक्टर नहीं थी, पुरुष डॉक्टर ने जयपुर के एसएमएस अस्पताल रेफर कर दिया। वहां भी डॉक्टर ने जांच से इनकार कर दिया।

मजिस्ट्रेट ने कहा कि वह कल आदेश देगा। इस प्रकार 48 घंटे बाद जांच हुई, जबकि कानूनन 24 घंटे के भीतर मेडिकल टेस्ट होना तय है।

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