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एयर प्यूरीफायर पर GST कम क्यों नहीं हो रही?: केंद्र ने दिल्ली हाईकोर्ट में दाखिल किया हलफनामा; ये वजहें बताई

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली। Published by: निर्मल कांत Updated Fri, 09 Jan 2026 08:31 PM IST
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सार

दिल्ली-एनसीआर में हवा की खराब गुणवत्ता के बीच एयर प्यूरीफायर को लेकर एक जनहित याचिका पर केंद्र सरकार ने हलफनामा दाखिल किया। केंद्र ने कहा कि एयर प्यूरीफायर को चिकित्सा उपकरण घोषित करने की मांग दिखावटी है। सरकार का दावा है कि इसके पीछे नियामक फायदा उठाने की कोशिश है। अब इस मामले में हाईकोर्ट ने 19 मार्च अगली सुनवाई की तारीख तय कर दी है। पूरा मामला विस्तार से पढ़िए-

No genuine public interest in plea to classify air purifiers as medical devices: Centre to Delhi HC
दिल्ली हाई कोर्ट - फोटो : एएनआई (फाइल)
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विस्तार

केंद्र सरकार ने एयर प्यूरीफायर को चिकित्सा उपकरण के रूप में वर्गीकृत करने की याचिका पर शुक्रवार को दिल्ली हाईकोर्ट में अपनी दलील रखी। सरकार ने कहा कि इससे निष्कर्ष निकलता है कि यह जनहित से जुड़ी किसी असली चिंता को दूर करने के मकसद से दायर नहीं की गई है, बल्कि यह एक 'दिखावटी' और 'प्रेरित' प्रयास है। 
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सरकार ने क्या दलील रखी?
चीफ जस्टिस देवेंद्र कुमार उपाध्याय और जस्टिस तेजस करिया की बेंच याचिका पर सुनवाई कर रही थी। केंद्र की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (एएसजी) एन वेंकटरमण पेश हुए। उन्होंने बेंच के सामने दलील रखी कि एयर प्यूरीफायर को चिकित्सा उपकरण के रूप में वर्गीकृत करना जनहित याचिका (पीआईएल) के उद्देश्य के विपरीत हो। इससे एयर प्यूरीफायर अतिरिक्त नियामक अनुपालनों के अधीन हो जाएंगे और इनकी पहले से ही सीमित आपूर्ति वाले बाजे में आपूर्ति प्रभावित हो सकती है। 
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मामले में 19 मार्च को होगी सुनवाई
कोर्ट ने गौर किया कि केंद्र के हलफनामे में याचिकाकर्ता के खिलाफ कुछ दावे किए गए हैं और उसे अपना जवाब दाखिल करने के लिए एक हफ्ते का समय दिया। मामले में अगली सुनवाई 19 मार्च को होगी। केंद्र और जीएसटी परिषद का प्रतिनिधित्व कर रहे एएसजी वेंकटरमण ने दलील दी कि एयर प्यूरीफायर को चिकित्सा उपकरण बताने और उन पर जीएसटी दर घटाने के लिए निर्देश देने की याचिका में संविधान के तहत न्यायिक दखल मान्य नहीं है। 

जनहित को ध्यान में रखकर नहीं दायर की गई याचिका: सरकार
सरकार ने कहा कि यह याचिका सार्वजनिक हित के बहाने नियामक वर्गीकरण बदलने का एक बहुरंगी (दिखावटी) और प्रेरित प्रयास है। हलफनामे में कहा गया, याचिकाकर्ता की मांग और न्यायिक पुनर्वर्गीकरण पर जोर इस निष्कर्ष को मजबूती देता है कि यह याचिका किसी वास्तविक सार्वजनिक हित को ध्यान में रखकर नहीं दायर की गई है, बल्कि यह सार्वजनिक हित क्षेत्र के अधिकार का एक दिखावटी और प्रेरित उपयोग है। 

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'चुनिंदा कंपनियों को लाभ देना संभावित उद्देश्य'
हलफनामे में आगे कहा गया, मांगें इस तरह बनाई गई हैं कि एयर प्यूरीफायर को औषधि और प्रसाधन सामग्री अधिनियम (डीसीए) और चिकित्सा उपकरण नियम (एमडीआर) के तहत चिकित्सा उपकरण के रूप में वर्गीकृत किया जा सके। इसका स्पष्ट और संभावित उद्देश्य बाजार में भागीदारी को सीमित करना और केवल कुछ चुनिंदा कंपनियों को नियामक और व्यावसायिक लाभ देना है, जो आवश्यक लाइसेंस, पंजीकरण या अनुमोदन रखती हैं। इस आधार पर याचिका को खारिज किया जाना चाहिए। 

पीआईएल में क्या कहा गया है?
जनहित याचिका में केंद्र को निर्देश देने की मांग की गई है कि एयर प्यूरीफायर को चिकित्सा उपकरण के रूप में वर्गीकृत किया जाए और उसे जीएसटी के पांच फीसदी स्लैब में लाया जाए। वर्तमान में एयर प्यूरीफायर पर 18 फीसदी कर लगता है। वकील कपिल मदन की ओर से दायर याचिका में कहा गया कि दिल्ली में गंभीर वायु प्रदूषण की वजह से एयर प्यूरीफायर को विलासिता की वस्तु नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने पहले ही केंद्र से पूछा था कि राष्ट्रीय राजधानी और आसपास की हवा की खराब होती गुणवत्ता को देखते हुए आम आदमी के लिए एयर प्यूरीफायर सस्ते कैसे किए जा सकते हैं और जीएसटी दर क्यों नहीं घटाई जा सकती।

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