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सबरीमाला विवाद: महिलाओं के प्रवेश पर सुप्रीम कोर्ट में छठे दिन भी होगी सुनवाई, नौ जजों की पीठ करेगी विचार
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: Riya Dubey
Updated Fri, 17 Apr 2026 09:32 AM IST
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सार
सुप्रीम कोर्ट की नौ-न्यायाधीशों की संविधान पीठ सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश से जुड़ी पुनर्विचार याचिकाओं पर सुनवाई करेगी। मामला धार्मिक स्वतंत्रता और समानता के अधिकार के बीच संतुलन तय करने से जुड़ा है। कोर्ट यह भी देख रहा है कि धार्मिक प्रथाओं में न्यायिक हस्तक्षेप की सीमा क्या होनी चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट
- फोटो : ANI
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विस्तार
सुप्रीम कोर्ट की नौ-न्यायाधीशों की संविधान पीठ सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश से जुड़े मामले में दायर पुनर्विचार याचिकाओं पर सुनवाई करेगी।
सुप्रीम कोर्ट इस समय यह तय कर रहा है कि धार्मिक स्वतंत्रता और अन्य मौलिक अधिकारों के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए और धार्मिक प्रथाओं में न्यायिक हस्तक्षेप की सीमा क्या होनी चाहिए। इसके अलावा, अदालत कई अन्य संवेदनशील मामलों पर भी विचार कर रही है, जिनमें धार्मिक स्थलों में प्रवेश, समुदायगत प्रथाएं और महिला अधिकारों से जुड़े मुद्दे शामिल हैं। यह मामला केवल सबरीमाला तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारत में धर्म, आस्था और संविधान के बीच संतुलन तय करने वाला एक महत्वपूर्ण कानूनी सवाल बन गया है, जिस पर पूरे देश की नजरें टिकी हुई हैं।
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क्या है पूरा मामला?
सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी केरल के प्रसिद्ध सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर लगे प्रतिबंध और अन्य धार्मिक स्थलों पर होने वाले भेदभाव से जुड़ी याचिकाओं की सुनवाई के दौरान आई। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली नौ जजों की पीठ इस बात की जांच कर रही है कि धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार किस हद तक समानता के अधिकार के साथ मेल खाता है।सुप्रीम कोर्ट इस समय यह तय कर रहा है कि धार्मिक स्वतंत्रता और अन्य मौलिक अधिकारों के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए और धार्मिक प्रथाओं में न्यायिक हस्तक्षेप की सीमा क्या होनी चाहिए। इसके अलावा, अदालत कई अन्य संवेदनशील मामलों पर भी विचार कर रही है, जिनमें धार्मिक स्थलों में प्रवेश, समुदायगत प्रथाएं और महिला अधिकारों से जुड़े मुद्दे शामिल हैं। यह मामला केवल सबरीमाला तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारत में धर्म, आस्था और संविधान के बीच संतुलन तय करने वाला एक महत्वपूर्ण कानूनी सवाल बन गया है, जिस पर पूरे देश की नजरें टिकी हुई हैं।
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अनुच्छेद 25 बनाम अनुच्छेद 26
वर्तमान में सुप्रीम कोर्ट के सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या किसी धार्मिक समूह का अपना मामला प्रबंधित करने का अधिकार अनुच्छेद 26, किसी व्यक्ति के पूजा करने के मौलिक अधिकार, अनुच्छेद 25 से बड़ा हो सकता है? सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि धर्म के नाम पर किसी वर्ग को बाहर करना धर्म की रक्षा नहीं, बल्कि उसे कमजोर करना है।
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