दुनिया भर में बीते करीब एक साल से वैश्विक महामारी कोरोना संक्रमण का खौफ है। इस महामारी ने लोगों की जिंदगियां उजाड़ दी हैं। लोग घरों में कैद होकर रह गए। कोरोना ने करोड़ों लोगों को अपना शिकार बनाया, तो लाखों लोगों की जिंदगियां लील लीं। वायरस के प्रसार को रोकने के लिए लागू लॉकडाउन में हजारों की संख्या में उद्योग एवं कंपनियों के दरवाजे पर ताले पड़ गए, लाखों बेरोजगार हो गए। यहां तक कि लाखों लोगों को दो वक्त की रोटी के लाले पड़ गए।
Year Ender 2020: सलाम उन कोरोना योद्धाओं को, जो जान हथेली पर रख बखूबी निभा रहे फर्ज
सफाईकर्मी/सैनिटाइजेशन कर्मचारी
वायरस के प्रसार को रोकने के लिए इन नायकों ने सार्वजनिक स्थलों समेत हमारे आसपास परिवेश को स्वच्छ और सुरक्षित बनाया। सफाईकर्मियों ने लॉकडाउन के दौरान जब सभी लोग अपने घरों में सुरक्षित थे, उस वक्त इन्होंने खुद को जोखिम में डालकर घरों का कचरा उठाने से लेकर गलियां, नालियां, सड़क और अस्पताल तक हर जगह स्वच्छता मुहैया कराई।
चिकित्साकर्मी
कोरोना के खिलाफ लड़ाई में देश के डॉक्टर और नर्स समेत तमाम स्वास्थ्यकर्मी अपनी जान पर खेलकर कोरोना को मात देने में जुटे हुए हैं। कोरोना संकट के दौरान ये फ्रंट लाइन वाॅरियर्स डबल शिफ्ट कर रहे हैं। लंबे समय तक अपने परिवार से दूर रहकर कोरोना मरीजों की तीमारदारी में जुटे रहते हैं। कर्तव्य निभाकर घर पहुंचते हैं, तो बच्चों, मां और अन्य परिजनों को इस संक्रमण से बचाने की जद्दोजहद करनी होती है। अपनों को बिना छूए, बिना गले लगाए बस दूर से देखकर ही संतोष करना पड़ता है।
आशा कार्यकर्ता
जब अधिकांश लोग अपने घरों में सुरक्षित रह रहे हैं, उस वक्त आशा वर्कर्स कोरोना के खिलाफ लड़ाई में जुटी हैं। आशा वर्कर्स कोरोना काल में आवश्यक दवाएं समुदाय तक पहुंचाने, पोषण वितरण सुनिश्चित करने के अथक प्रयासों में लगी हुई हैं। महामारी के दौरान आशा वर्कर्स घर-घर जाकर कोरोना के लक्षण वाले मरीजों की पहचान करने, मास्क, सैनिटरी पैड, दवाएं व अन्य जरूरी सामान वितरित करने और कोरोना बचाव संबंधी नियमों को लेकर लोगों को जागरूक करने और जरूरी सर्वे करने के काम में लगी रहीं हैं। इस बीच कई आशा वर्कर्स ने पीपीई किट समेत अन्य सुरक्षा उपकरणों के बिना ही काम कर रहीं हैं। आशा वर्कर्स ज्यादातर गरीब परिवारों से आती हैं। ये देश में स्वास्थ्य सेवा प्रणाी की रीढ़ मानी जाती हैं।
डॉ. रामचंद्र दानेकर
कोरोना काल में स्वास्थ्य मंत्रालय ने 60 वर्ष से अधिक उम्र वाले लोगों को घर में रहने के निर्देश हैं। इसके बावजूद महाराष्ट्र के चंद्रपुर जिले में एक 87 वर्षीय होम्योपैथिक डॉक्टर गांव में लोगों का इलाज करने के लिए पहुंचते हैं। वह गरीब लोगों को मेडिकल सुविधा उपलब्ध कराने के लिए रोजाना तकरीबन 10-15 किलोमीटर साइकिल चला कर गांवों में पहुंचते हैं। इसके बाद घर-घर पहुंचकर उनकी स्वास्थ्य संबंधी दिक्कतों का समाधान करते हैं। बता दें कि उम्र भले ही 87 वर्ष की हो चुकी है लेकिन इरादा आज भी जवां है। कोशिश है हर शख्स को बचा लेने की। रोगों से लोगों को निजात दिलाने की। इसी कोशिश में बुजुर्ग डॉक्टर पिछले 60 वर्षों से मरीजों के घर अपनी साइकल से जाते हैं। उनके इस सेवाभाव की हर तरफ चर्चा है।
For the last 60 years, I've been visiting villagers almost daily. Due to fear of #COVID19, doctors are scared of treating poor patients but I've no such fear. Nowadays, young doctors are only after money, they don't want to serve poor: Dr Ramchandra Danekar, Homoeopathic doctor https://t.co/tJ7p9T6QAM pic.twitter.com/meqCpGa3KV
— ANI (@ANI) October 23, 2020