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पेंशन के लिए तरसते कैंसर पीड़ित बुजुर्ग: सुप्रीम कोर्ट का सख्त रुख, इलाहाबाद हाईकोर्ट को जल्द सुनवाई का आदेश
पीटीआई, नई दिल्ली
Published by: राकेश कुमार
Updated Thu, 30 Apr 2026 03:24 PM IST
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सार
इंसाफ की राह में नौ वर्ष की देरी और कैंसर जैसी बीमारी के बीच झूल रहे 77 वर्षीय राम शंकर को सुप्रीम कोर्ट से सहारा मिला है। कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि पेंशन कर्मचारी का हक है, जिसे सरकारी नियमों की आड़ में अनंत काल तक नहीं रोका जा सकता। शीर्ष अदालत ने इलाहाबाद हाईकोर्ट को निर्देश दिया है कि इस मामले में जल्द सुनवाई हो।
सुप्रीम कोर्ट
- फोटो : @अमर उजाला
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विस्तार
देश की सर्वोच्च अदालत ने कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से जूझ रहे एक बुजुर्ग के पक्ष में बड़ा फैसला सुनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट को निर्देश दिया है कि वह एक वरिष्ठ नागरिक की पेंशन और सेवानिवृत्ति लाभों से जुड़ी याचिका पर तत्काल सुनवाई करे। गौरतलब है कि यह मामला पिछले नौ वर्षों से उच्च न्यायालय में लंबित पड़ा है।
सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने इस मामले पर गंभीरता दिखाई है। पीठ ने इलाहाबाद हाईकोर्ट से आग्रह किया कि वह 77 वर्षीय बुजुर्ग की स्थिति को देखते हुए उनके मामले पर सहानुभूतिपूर्वक विचार करे। अदालत ने स्पष्ट रूप से इस मामले की आउट ऑफ टर्न यानी प्राथमिकता के आधार पर सुनवाई करने को कहा है।
क्या है पूरा मामला?
यह कानूनी लड़ाई राम शंकर नामक व्यक्ति की ओर से लड़ी जा रही है। राम शंकर उत्तर प्रदेश सरकार के सेवा में कार्यरत थे। उन्होंने अपनी याचिका में दलील दी कि उनके दावे के निपटारे में होने वाली अत्यधिक देरी उनके मौलिक अधिकारों का हनन है। उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 14, समानता का अधिकार और अनुच्छेद 21 जीवन का अधिकार का हवाला देते हुए न्याय की गुहार लगाई है।
राम शंकर ने 1 जून 1970 से 28 मई 1985 तक उत्तर प्रदेश सरकार के तहत अपनी सेवाएं दी थीं। इसके बाद उन्होंने गैस अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड में अपनी सेवाएं शुरू कीं। जब उन्होंने अपनी पेंशन की मांग की, तो राज्य सरकार ने कुछ नियमों और प्रावधानों का हवाला देते हुए उनके लाभों को देने से इनकार कर दिया।
यह भी पढ़ें: पवन खेड़ा को राहत मिलेगी या नहीं?: सुप्रीम कोर्ट ने अग्रिम जमानत याचिका पर फैसला रखा सुरक्षित, जानें सबकुछ
'पेंशन कोई खैरात नहीं'
याचिकाकर्ता ने अपनी दलील में एक महत्वपूर्ण संविधानिक बिंदु रखा है। राम शंकर ने कहा कि पेंशन कोई इनाम या खैरात नहीं है। यह एक कर्मचारी का निहित अधिकार है। उन्होंने तर्क दिया कि पेंशन संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत आजीविका के अधिकार का एक अभिन्न अंग है। एक कर्मचारी की पूरी जिंदगी की मेहनत के बाद पेंशन ही उसके बुढ़ापे का सहारा होती है।
नौ वर्ष का लंबा इंतजार
न्याय की आस में राम शंकर ने वर्ष 2017 में इलाहाबाद हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। हालांकि, पिछले नौ वर्षों से यह मामला केवल तारीखों के जाल में उलझा रहा। याचिका के अनुसार, राज्य सरकार द्वारा बार-बार समय मांगे जाने के कारण मामला स्थगित होता रहा। अब सुप्रीम कोर्ट के दखल के बाद यह उम्मीद जगी है कि इस कैंसर पीड़ित बुजुर्ग को उनके जीवन के अंतिम पड़ाव में उनका हक मिल सकेगा।
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सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने इस मामले पर गंभीरता दिखाई है। पीठ ने इलाहाबाद हाईकोर्ट से आग्रह किया कि वह 77 वर्षीय बुजुर्ग की स्थिति को देखते हुए उनके मामले पर सहानुभूतिपूर्वक विचार करे। अदालत ने स्पष्ट रूप से इस मामले की आउट ऑफ टर्न यानी प्राथमिकता के आधार पर सुनवाई करने को कहा है।
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क्या है पूरा मामला?
यह कानूनी लड़ाई राम शंकर नामक व्यक्ति की ओर से लड़ी जा रही है। राम शंकर उत्तर प्रदेश सरकार के सेवा में कार्यरत थे। उन्होंने अपनी याचिका में दलील दी कि उनके दावे के निपटारे में होने वाली अत्यधिक देरी उनके मौलिक अधिकारों का हनन है। उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 14, समानता का अधिकार और अनुच्छेद 21 जीवन का अधिकार का हवाला देते हुए न्याय की गुहार लगाई है।
राम शंकर ने 1 जून 1970 से 28 मई 1985 तक उत्तर प्रदेश सरकार के तहत अपनी सेवाएं दी थीं। इसके बाद उन्होंने गैस अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड में अपनी सेवाएं शुरू कीं। जब उन्होंने अपनी पेंशन की मांग की, तो राज्य सरकार ने कुछ नियमों और प्रावधानों का हवाला देते हुए उनके लाभों को देने से इनकार कर दिया।
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'पेंशन कोई खैरात नहीं'
याचिकाकर्ता ने अपनी दलील में एक महत्वपूर्ण संविधानिक बिंदु रखा है। राम शंकर ने कहा कि पेंशन कोई इनाम या खैरात नहीं है। यह एक कर्मचारी का निहित अधिकार है। उन्होंने तर्क दिया कि पेंशन संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत आजीविका के अधिकार का एक अभिन्न अंग है। एक कर्मचारी की पूरी जिंदगी की मेहनत के बाद पेंशन ही उसके बुढ़ापे का सहारा होती है।
नौ वर्ष का लंबा इंतजार
न्याय की आस में राम शंकर ने वर्ष 2017 में इलाहाबाद हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। हालांकि, पिछले नौ वर्षों से यह मामला केवल तारीखों के जाल में उलझा रहा। याचिका के अनुसार, राज्य सरकार द्वारा बार-बार समय मांगे जाने के कारण मामला स्थगित होता रहा। अब सुप्रीम कोर्ट के दखल के बाद यह उम्मीद जगी है कि इस कैंसर पीड़ित बुजुर्ग को उनके जीवन के अंतिम पड़ाव में उनका हक मिल सकेगा।
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