Supreme Court: आतंक और ड्रग्स मामलों में सुप्रीम कोर्ट बना रहा नई योजना, राज्यों को नोटिस जारी; मांगी रिपोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने आतंक और ड्रग्स मामलों की धीमी सुनवाई पर सख्ती दिखाई है। कोर्ट ने सभी राज्यों से लंबित मामलों का ब्योरा मांगा है और एक नई योजना बनाई है। इस योजना के लिए सर्वोच्च अदालत ने केंद्र से प्रति कोर्ट एक करोड़ रुपये देने के लिए भी कहा है।
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देश में आतंकवाद और ड्रग्स से जुड़े मामलों की धीमी सुनवाई को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। अदालत ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से ऐसे मामलों का पूरा ब्योरा मांगा है। कोर्ट का मकसद इन मामलों के तेजी से निपटारे के लिए विशेष अदालतें यानी स्पेशल कोर्ट बनाना है, ताकि वर्षों से लंबित केस जल्दी खत्म हो सकें।
सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कहा कि केंद्र और राज्य एजेंसियों जैसे एनआईए और एनसीबी द्वारा जांच किए जा रहे मामलों की पूरी जानकारी दी जाए। कोर्ट ने केंद्र सरकार से यह भी कहा कि हर राज्य और केंद्र शासित प्रदेश में स्पेशल कोर्ट बनाने के लिए प्रति कोर्ट 1 करोड़ रुपये की सहायता पर विचार किया जाए। इसके साथ ही हर साल इन अदालतों के संचालन के लिए भी 1 करोड़ रुपये देने का सुझाव दिया गया है।
सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों से क्यों मांगा डेटा?
कोर्ट ने साफ निर्देश दिया कि सभी राज्य और केंद्र शासित प्रदेश यूएपीए और एनडीपीएस कानून के तहत दर्ज मामलों का पूरा ब्योरा दें। इसमें यह भी बताया जाए कि कितने मामले लंबित हैं और किन एजेंसियों द्वारा जांच की जा रही है। कोर्ट ने 17 राज्यों के महाधिवक्ताओं से तुरंत जानकारी देने को कहा है और बाकी राज्यों को भी नोटिस जारी किया है।
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क्या स्पेशल कोर्ट बनाने की योजना है?
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इन मामलों के लिए अलग से विशेष अदालतें बनाई जानी चाहिए, जो सिर्फ ऐसे केस ही सुनें। कोर्ट ने यह भी कहा कि इन अदालतों के जजों को दूसरे मामलों का बोझ नहीं दिया जाना चाहिए। इससे सुनवाई तेजी से हो सकेगी और लंबित मामलों की संख्या घटेगी।
क्या लंबित मामलों की वजह से उठी चिंता?
कोर्ट ने माना कि कई राज्यों में एनआईए से जुड़े केस वर्षों से लंबित हैं। दिल्ली, महाराष्ट्र, बिहार, गुजरात और जम्मू-कश्मीर जैसे राज्यों में मामलों की संख्या ज्यादा है। यहां एक ही जज को कई तरह के केस देखने पड़ते हैं, जिससे सुनवाई में देरी होती है। इसी वजह से सुप्रीम कोर्ट ने यह कदम उठाया है।
क्या केंद्र सरकार ने फंड का प्लान बनाया है?
गृह मंत्रालय ने पहले ही एक योजना तैयार की है, जिसमें हर स्पेशल कोर्ट के लिए 1 करोड़ रुपये का सालाना बजट और 1 करोड़ रुपये का एकमुश्त खर्च तय किया गया है। यह पैसा कोर्ट के स्टाफ, तकनीकी उपकरण और अन्य जरूरतों पर खर्च होगा। हर कोर्ट में विशेष जज, स्टाफ और वाहन की व्यवस्था भी होगी।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इन मामलों का जल्दी निपटारा जरूरी है, ताकि आरोपी और पीड़ित दोनों को न्याय मिल सके। कोर्ट ने हाईकोर्ट से भी कहा है कि योग्य जजों की नियुक्ति जल्द की जाए। इस मामले की अगली सुनवाई 8 मई को होगी, जहां आगे की दिशा तय की जाएगी।
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