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सबरीमाला विवाद:'किसी को मंदिर में प्रवेश से रोकना हिंदू धर्म को बांटने जैसा', सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: राकेश कुमार
Updated Thu, 09 Apr 2026 06:27 PM IST
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सार
सुप्रीम कोर्ट की नौ जजों की बेंच ने कहा है कि मंदिरों और मठों में किसी खास वर्ग के प्रवेश को रोकना न केवल सामाजिक एकता को खंडित करता है, बल्कि हिंदू धर्म के लिए भी नकारात्मक है। कोर्ट ने कहा कि धार्मिक परंपराओं के नाम पर किसी को बाहर रखना संवैधानिक और धार्मिक दृष्टि से सही नहीं है। यह सुनवाई सबरीमाला जैसे मामलों में धार्मिक स्वतंत्रता के दायरे को तय करने के लिए की जा रही है।
सबरीमाला मामले में सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई
- फोटो : Amar Ujala Graphics
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विस्तार
सुप्रीम कोर्ट की नौ जजों की संविधान पीठ ने धार्मिक स्थलों पर भेदभाव और धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि किसी खास वर्ग या संप्रदाय को मंदिरों और 'मठों' में प्रवेश से रोका जाता है, तो इसका हिंदू धर्म पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा और यह समाज को बांटने का काम करेगा।
क्या है पूरा मामला?
सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी केरल के प्रसिद्ध सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर लगे प्रतिबंध और अन्य धार्मिक स्थलों पर होने वाले भेदभाव से जुड़ी याचिकाओं की सुनवाई के दौरान आई। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली नौ जजों की पीठ इस बात की जांच कर रही है कि धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार किस हद तक समानता के अधिकार के साथ मेल खाता है।
विशिष्टता हिंदू धर्म के लिए अच्छी नहीं: जस्टिस नागरत्ना
सुनवाई के दौरान जस्टिस बीवी नागरत्ना ने कहा कि हर किसी को हर मंदिर और मठ में जाने की अनुमति होनी चाहिए। अगर आप यह कहते हैं कि मेरी परंपरा के अनुसार मैं दूसरों को बाहर रखूंगा और केवल मेरा संप्रदाय ही मंदिर में आएगा, तो यह हिंदू धर्म के लिए अच्छा नहीं है। यह धर्म को नुकसान पहुंचाएगा और खुद उस संप्रदाय के लिए भी उल्टा साबित होगा। जस्टिस अरविंद कुमार ने भी इस बात पर सहमति जताते हुए कहा कि इस तरह के भेदभाव से समाज में दरार पैदा होगी।
यह भी पढ़ें: खुद जंग में उतरने का डर, तेल-गैस की कमी और...: किस डर से अमेरिका-ईरान का संदेशवाहक बनने पर मजबूर हुआ पाकिस्तान
सरकारी फंड और निजी दान का सवाल
बहस के दौरान संगठनों का पक्ष रख रहे वरिष्ठ अधिवक्ता सीएस वैद्यनाथन ने तर्क दिया कि एक संप्रदाय विशेष का मंदिर केवल अपने लोगों तक ही अधिकारों को सीमित रख सकता है। इस पर अदालत ने कड़ा रुख अपनाया। अधिवक्ता ने यह भी कहा कि अगर कोई मंदिर पूरी तरह निजी या एक खास संप्रदाय का है, तो वह सरकार या जनता से फंड की मांग नहीं कर सकता। लेकिन, यदि कोई मंदिर सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता या स्वास्थ्य के परीक्षण से गुजरता है, तो उसे कानूनों का पालन करना होगा।
अनुच्छेद 25 बनाम अनुच्छेद 26
वर्तमान में सुप्रीम कोर्ट के सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या किसी धार्मिक समूह का अपना मामला प्रबंधित करने का अधिकार अनुच्छेद 26, किसी व्यक्ति के पूजा करने के मौलिक अधिकार, अनुच्छेद 25 से बड़ा हो सकता है? सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि धर्म के नाम पर किसी वर्ग को बाहर करना धर्म की रक्षा नहीं, बल्कि उसे कमजोर करना है।
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क्या है पूरा मामला?
सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी केरल के प्रसिद्ध सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर लगे प्रतिबंध और अन्य धार्मिक स्थलों पर होने वाले भेदभाव से जुड़ी याचिकाओं की सुनवाई के दौरान आई। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली नौ जजों की पीठ इस बात की जांच कर रही है कि धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार किस हद तक समानता के अधिकार के साथ मेल खाता है।
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विशिष्टता हिंदू धर्म के लिए अच्छी नहीं: जस्टिस नागरत्ना
सुनवाई के दौरान जस्टिस बीवी नागरत्ना ने कहा कि हर किसी को हर मंदिर और मठ में जाने की अनुमति होनी चाहिए। अगर आप यह कहते हैं कि मेरी परंपरा के अनुसार मैं दूसरों को बाहर रखूंगा और केवल मेरा संप्रदाय ही मंदिर में आएगा, तो यह हिंदू धर्म के लिए अच्छा नहीं है। यह धर्म को नुकसान पहुंचाएगा और खुद उस संप्रदाय के लिए भी उल्टा साबित होगा। जस्टिस अरविंद कुमार ने भी इस बात पर सहमति जताते हुए कहा कि इस तरह के भेदभाव से समाज में दरार पैदा होगी।
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सरकारी फंड और निजी दान का सवाल
बहस के दौरान संगठनों का पक्ष रख रहे वरिष्ठ अधिवक्ता सीएस वैद्यनाथन ने तर्क दिया कि एक संप्रदाय विशेष का मंदिर केवल अपने लोगों तक ही अधिकारों को सीमित रख सकता है। इस पर अदालत ने कड़ा रुख अपनाया। अधिवक्ता ने यह भी कहा कि अगर कोई मंदिर पूरी तरह निजी या एक खास संप्रदाय का है, तो वह सरकार या जनता से फंड की मांग नहीं कर सकता। लेकिन, यदि कोई मंदिर सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता या स्वास्थ्य के परीक्षण से गुजरता है, तो उसे कानूनों का पालन करना होगा।
अनुच्छेद 25 बनाम अनुच्छेद 26
वर्तमान में सुप्रीम कोर्ट के सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या किसी धार्मिक समूह का अपना मामला प्रबंधित करने का अधिकार अनुच्छेद 26, किसी व्यक्ति के पूजा करने के मौलिक अधिकार, अनुच्छेद 25 से बड़ा हो सकता है? सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि धर्म के नाम पर किसी वर्ग को बाहर करना धर्म की रक्षा नहीं, बल्कि उसे कमजोर करना है।
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