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Supreme court: सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को बताया सबसे बड़ा मुकदमेबाज, ठोका 25000 का जुर्माना; जानें क्यों
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: राकेश कुमार
Updated Wed, 01 Apr 2026 06:38 PM IST
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सार
सुप्रीम कोर्ट ने एक सीआईएसएफ कांस्टेबल को मिली राहत के खिलाफ अपील करने पर केंद्र सरकार को फटकार लगाई है। शीर्ष अदालत ने कहा कि सरकार खुद अदालतों में मुकदमों का बोझ बढ़ाने के लिए सबसे बड़ी जिम्मेदार है। सुप्रीम कोर्ट ने सरकार पर 25 हजार रुपये का जुर्माना ठोका है।
सुप्रीम कोर्ट
- फोटो : ANI
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विस्तार
देश की सर्वोच्च अदालत ने एक बार फिर सरकार के रवैये पर नाराजगी जाहिर की है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि अदालतों में लंबित मुकदमों की बढ़ती संख्या के लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार खुद सरकार है। सरकार छोटे-छोटे मामलों को भी खींचकर सुप्रीम कोर्ट तक ले आती है।
सीआईएसएफ कांस्टेबल से जुड़ा है मामला
यह पूरा मामला केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (सीआईएसएफ) के एक कांस्टेबल से जुड़ा है। दरअसल, बिना बताए 11 दिन ड्यूटी से गायब रहने और सहकर्मी की बेटी की शादी में मदद करने के आरोप में उन्हें नौकरी से बर्खास्त कर दिया गया था। जब यह मामला पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट पहुंचा, तो अदालत ने पाया कि बर्खास्तगी की यह सजा बहुत ज्यादा है। हाई कोर्ट ने कांस्टेबल को बहाल करने और उसे 25 फीसदी पिछला वेतन देने का आदेश सुनाया।
हाई कोर्ट के फैसले को केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट में दी चुनौती
उच्च न्यायालय के इस फैसले को स्वीकार करने के बजाय केंद्र सरकार ने इसके खिलाफ शीर्ष अदालत में अपील दायर कर दी। इसी बात पर जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की बेंच ने केंद्र सरकार को फटकार लगाई है। जस्टिस नागरत्ना ने सरकारी वकील को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि हम हर जगह मुकदमों के बोझ का रोना रोते हैं। लेकिन असलियत यह है कि सरकार खुद सबसे बड़ी मुकद्मेबाज है। क्या सरकारी अफसरों को यह समझ नहीं आता कि 11 दिन की गैर-मौजूदगी के लिए नौकरी से निकाल देना गलत है? जब हाई कोर्ट ने राहत दे दी थी, तो आपको सुप्रीम कोर्ट आने की क्या जरूरत थी?
केंद्र सरकार को लगा 25 हजार का जुर्माना
सुप्रीम कोर्ट ने न सिर्फ सरकार की इस याचिका को सिरे से खारिज कर दिया, बल्कि अदालत का कीमती समय बर्बाद करने के लिए केंद्र सरकार पर 25,000 रुपये का जुर्माना भी लगा दिया। यह फैसला उन अधिकारियों के लिए सबक है जो बिना सोचे-समझे हर फैसले के खिलाफ ऊपरी अदालत का दरवाजा खटखटाते हैं।
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सीआईएसएफ कांस्टेबल से जुड़ा है मामला
यह पूरा मामला केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (सीआईएसएफ) के एक कांस्टेबल से जुड़ा है। दरअसल, बिना बताए 11 दिन ड्यूटी से गायब रहने और सहकर्मी की बेटी की शादी में मदद करने के आरोप में उन्हें नौकरी से बर्खास्त कर दिया गया था। जब यह मामला पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट पहुंचा, तो अदालत ने पाया कि बर्खास्तगी की यह सजा बहुत ज्यादा है। हाई कोर्ट ने कांस्टेबल को बहाल करने और उसे 25 फीसदी पिछला वेतन देने का आदेश सुनाया।
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हाई कोर्ट के फैसले को केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट में दी चुनौती
उच्च न्यायालय के इस फैसले को स्वीकार करने के बजाय केंद्र सरकार ने इसके खिलाफ शीर्ष अदालत में अपील दायर कर दी। इसी बात पर जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की बेंच ने केंद्र सरकार को फटकार लगाई है। जस्टिस नागरत्ना ने सरकारी वकील को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि हम हर जगह मुकदमों के बोझ का रोना रोते हैं। लेकिन असलियत यह है कि सरकार खुद सबसे बड़ी मुकद्मेबाज है। क्या सरकारी अफसरों को यह समझ नहीं आता कि 11 दिन की गैर-मौजूदगी के लिए नौकरी से निकाल देना गलत है? जब हाई कोर्ट ने राहत दे दी थी, तो आपको सुप्रीम कोर्ट आने की क्या जरूरत थी?
केंद्र सरकार को लगा 25 हजार का जुर्माना
सुप्रीम कोर्ट ने न सिर्फ सरकार की इस याचिका को सिरे से खारिज कर दिया, बल्कि अदालत का कीमती समय बर्बाद करने के लिए केंद्र सरकार पर 25,000 रुपये का जुर्माना भी लगा दिया। यह फैसला उन अधिकारियों के लिए सबक है जो बिना सोचे-समझे हर फैसले के खिलाफ ऊपरी अदालत का दरवाजा खटखटाते हैं।
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