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असली शिवसेना किसकी?: सुप्रीम कोर्ट ने पूछा- पार्टी में हुआ था विभाजन या नहीं; फिर चुनाव चिह्न पर फैसला

Wed, 12 Aug 2026 07:18 PM IST
शिवम गर्ग पीटीआई, नई दिल्ली
पीटीआई, नई दिल्ली Published by: शिवम गर्ग Updated Wed, 12 Aug 2026 07:18 PM IST
सार

शिवसेना के नाम और 'धनुष-बाण' चुनाव चिह्न विवाद पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान बुधवार को अहम टिप्पणी हुई। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि पहले यह देखना होगा कि पार्टी में वास्तव में विभाजन हुआ था या नहीं और क्या वह विधायक दल से संगठन तक पहुंचा। आयोग के फैसले पर अदालत क्या रुख अपनाएगी? आइए, सबकुछ विस्तार से जानते हैं...

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Supreme Court to First Examine Whether Party Was Actually Split Before Deciding Uddhav-Shinde Symbol Dispute
सुप्रीम कोर्ट। - फोटो : Amar Ujala Graphics

विस्तार

शिवसेना के नाम और चुनाव चिह्न को लेकर चल रही कानूनी लड़ाई में सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को अहम टिप्पणी की। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने कहा कि सबसे पहले यह देखना होगा कि शिवसेना में वास्तव में विभाजन हुआ था या नहीं। अदालत ने कहा कि ऐसा विभाजन विधायक दल से शुरू होकर पार्टी संगठन और प्राथमिक सदस्यों तक पहुंच सकता है। सुनवाई गुरुवार को भी जारी रहेगी।

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क्या विधायक दल में बंटवारा ही पार्टी में विभाजन का आधार बन सकता है?

सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची ने कहा कि विभाजन की शुरुआत विधायक दल से हो सकती है, लेकिन उसका असर संगठन और प्राथमिक सदस्यता तक भी पहुंच सकता है। उद्धव ठाकरे गुट की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने इसका विरोध करते हुए कहा कि केवल विधायक दल में बंटवारे को राजनीतिक दल में विभाजन नहीं माना जा सकता। उन्होंने संविधान पीठ के फैसले का हवाला देते हुए अपनी दलील रखी।

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क्या शिंदे गुट का संगठन में समर्थन भी देखा जाएगा?

पीठ ने कहा कि शिंदे गुट को 11 'राज्य प्रभारियों' का समर्थन प्राप्त था और राज्य प्रभारी पार्टी के संगठनात्मक ढांचे का हिस्सा होते हैं। अदालत ने कहा कि किसी राजनीतिक दल का आकलन केवल पदाधिकारियों के आधार पर नहीं किया जा सकता, बल्कि प्राथमिक सदस्यों को भी ध्यान में रखना होगा। इस दौरान पीठ ने इस पहलू पर स्पष्टता की जरूरत बताई कि विधायक दल से शुरू हुआ विभाजन बाद में पार्टी के व्यापक संगठन में दिखाई देने लगे तो क्या उसे चुनाव आयोग के समक्ष विवाद तय करते समय माना जा सकता है।

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क्या चुनाव आयोग ने पार्टी विवाद तय करने में सही प्रक्रिया अपनाई?

कपिल सिब्बल ने चुनाव आयोग के उस तरीके पर सवाल उठाया, जिसके तहत यह तय किया गया कि पार्टी के भीतर वास्तविक विवाद था या नहीं और आयोग के पास पहुंचने वाले गुट ने शिवसेना के संविधान के तहत उपलब्ध आंतरिक उपायों का इस्तेमाल किया था या नहीं। उन्होंने पार्टी के संगठनात्मक ढांचे और पार्टी प्रमुख की शक्तियों को लेकर आयोग के आकलन को भी चुनौती दी। सिब्बल ने कहा कि पार्टी के संविधान, उसके तहत हुए चुनावों या नियुक्तियों की वैधता को लेकर आयोग के सामने कोई विवाद नहीं था।

क्या चुनाव आयोग ने संगठन के बजाय विधायकों की संख्या को ज्यादा महत्व दिया?

सिब्बल ने आरोप लगाया कि आयोग ने शिवसेना के संगठनात्मक ढांचे को अलग रखकर अंततः विधायक दल के बहुमत के आधार पर चुनाव चिह्न विवाद का फैसला किया। उन्होंने पैराग्राफ 15 के तहत आयोग की भूमिका पर भी सवाल उठाए। उनके मुताबिक, आयोग को इस प्रावधान के तहत तभी अधिकार हासिल होता है, जब उसके समक्ष मामला आने के समय राजनीतिक दल में विभाजन मौजूद हो।

क्या मुख्यमंत्री बनने के बाद शिंदे के समर्थन को आधार बनाया जा सकता है?

सिब्बल ने यह भी तर्क दिया कि एकनाथ शिंदे के मुख्यमंत्री बनने के बाद उनके साथ अधिक लोगों का आना उनके गुट की वास्तविक ताकत का प्रमाण नहीं माना जा सकता। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री पद मिलने के बाद पार्टी के लोग स्वाभाविक रूप से पद पर बैठे व्यक्ति की ओर जा सकते हैं। इसलिए बाद में उनके साथ आए सदस्यों की संख्या के आधार पर पहले के संगठनात्मक समर्थन का आकलन नहीं किया जाना चाहिए।

क्या सुप्रीम कोर्ट अब चुनाव आयोग के फैसले की कसौटी तय करेगा?

पीठ ने कहा कि यदि चुनाव आयोग के पास प्रथम दृष्टया अधिकार था लेकिन उसने उसका गलत इस्तेमाल किया या स्थापित सिद्धांतों के विपरीत तरीका अपनाया, तो यह अलग स्थिति होगी। वहीं, यदि उसके पास अधिकार ही नहीं था, तो मामला अलग होगा। सुप्रीम कोर्ट उद्धव ठाकरे गुट की उन याचिकाओं पर अंतिम सुनवाई कर रहा है, जिनमें चुनाव आयोग के उस फैसले को चुनौती दी गई है, जिसमें एकनाथ शिंदे गुट को मूल शिवसेना माना गया और ‘धनुष-बाण’ चुनाव चिह्न आवंटित किया गया।

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