{"_id":"6a600ce02880d3cfeb0317bd","slug":"supreme-court-updates-issue-of-releaseing-former-brahmos-er-nishant-bombay-hc-verdict-other-cases-hearing-news-2026-07-22","type":"feature-story","status":"publish","title_hn":"Supreme Court: पुलिस थानों में सीसीटीवी लगाने के मामले में सकारात्मक प्रगति, सुप्रीम कोर्ट ने जताई संतुष्टि","category":{"title":"India News","title_hn":"देश","slug":"india-news"}}
Supreme Court: पुलिस थानों में सीसीटीवी लगाने के मामले में सकारात्मक प्रगति, सुप्रीम कोर्ट ने जताई संतुष्टि
Wed, 22 Jul 2026 04:52 PM IST
ज्योति भास्कर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला।
न्यूज डेस्क, अमर उजाला।
Published by: ज्योति भास्कर
Updated Wed, 22 Jul 2026 04:52 PM IST
विज्ञापन
सुप्रीम कोर्ट अपडेट्स
- फोटो : अमर उजाला ग्रापिक
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को कहा कि देशभर के पुलिस थानों में सीसीटीवी कैमरे लगाने के मामले में काम अच्छी तरह आगे बढ़ रहा है और पिछले कुछ महीनों में स्थिति ने सकारात्मक रुख लिया है। न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ को इस मामले में न्याय मित्र (एमिकस क्यूरी) के रूप में सहायता कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ दवे ने बताया कि इस दिशा में उल्लेखनीय प्रगति हुई है।
विज्ञापन
पीठ ने कहा, "यह देखकर खुशी होती है कि इस मामले में काम बहुत अच्छी तरह आगे बढ़ रहा है। इसके लिए हमें सिद्धार्थ दवे के प्रयासों का श्रेय देना चाहिए।" अदालत ने कहा कि पिछले कुछ महीनों में इस मामले में सकारात्मक बदलाव आया है। सुप्रीम कोर्ट पुलिस थानों में काम कर रहे सीसीटीवी कैमरों की कमी से जुड़े स्वत: संज्ञान मामले की सुनवाई कर रहा था।
विज्ञापन
सुनवाई के दौरान पीठ ने दो अहम मुद्दों पर ध्यान दिलाया। पहला, पुलिस थानों में सीसीटीवी लगाने की योजना के लिए वित्तीय सहायता की अवधि बढ़ाने का और दूसरा, पहले से लगाए गए कैमरों के रखरखाव का। केंद्र सरकार की ओर से पेश कानून अधिकारी ने कहा कि वह इन दोनों पहलुओं पर संबंधित अधिकारियों से निर्देश लेकर अदालत को अवगत कराएंगे। सुप्रीम कोर्ट ने कानून अधिकारी को निर्देश प्राप्त करने के लिए दो सप्ताह का समय दिया और मामले की अगली सुनवाई पांच अगस्त को तय की।
विज्ञापन
दलबदल कानून की व्याख्या पर सुप्रीम कोर्ट करेगा सुनवाई, कपिल सिब्बल की याचिका
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को वरिष्ठ अधिवक्ता और राज्यसभा सांसद कपिल सिब्बल की उस याचिका पर सुनवाई करने के लिए सहमति दे दी, जिसमें संविधान की दसवीं अनुसूची (दलबदल विरोधी कानून) की व्याख्या पर पुनर्विचार की मांग की गई है। अदालत इस मामले की सुनवाई 27 जुलाई (सोमवार) को करेगी। मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहन की पीठ के सामने कपिल सिब्बल ने कहा कि उन्होंने यह याचिका व्यक्तिगत क्षमता में दायर की है और इस पर जल्द सुनवाई की जरूरत है। सिब्बल ने अदालत से कहा कि उनकी याचिका का मुख्य सवाल यह है कि क्या संसद और विधानसभाओं की संरचना इस तरह बदली जा सकती है, जैसा हाल के वर्षों में देखने को मिला है। उन्होंने विशेष रूप से दसवीं अनुसूची के पैरा-4 की व्याख्या पर सवाल उठाया है।
क्या है पैरा-4 का प्रावधान?
संविधान की दसवीं अनुसूची का पैरा-4 यह प्रावधान करता है कि यदि किसी राजनीतिक दल का किसी दूसरे दल में विलय हो जाता है और आवश्यक संख्या में विधायक या सांसद उसका समर्थन करते हैं, तो उन्हें दलबदल कानून के तहत अयोग्य नहीं ठहराया जाएगा। कपिल सिब्बल का कहना है कि इस प्रावधान की मौजूदा व्याख्या का इस्तेमाल कई मामलों में इस तरह किया जा रहा है कि सांसद और विधायक बिना अयोग्यता झेले दूसरे दलों में शामिल हो रहे हैं। उनका तर्क है कि इससे दलबदल विरोधी कानून का उद्देश्य कमजोर पड़ता है। इस सुनवाई के दौरान सिब्बल ने अदालत को बताया कि इसी मुद्दे से जुड़े कई मामले पहले से सुप्रीम कोर्ट में लंबित हैं। उन्होंने यह भी कहा कि शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) की ओर से लोकसभा अध्यक्ष के उस फैसले को चुनौती देने वाली याचिका भी अदालत में सूचीबद्ध है, जिसमें पार्टी के कुछ सांसदों के शिंदे गुट में विलय को मंजूरी दी गई थी। सिब्बल की दलीलों पर गौर करने के बाद मुख्य न्यायाधीश ने उनकी याचिका को 27 जुलाई को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया।
हाल के घटनाक्रम से जुड़ा मामला
यह याचिका ऐसे समय में आई है जब हाल के वर्षों में आम आदमी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस और शिवसेना (यूबीटी) के कुछ सांसदों ने दसवीं अनुसूची के विलय संबंधी प्रावधानों का हवाला देते हुए भाजपा और अन्य राजनीतिक दलों का दामन थामा है। इसी वजह से दलबदल कानून की व्याख्या और उसके दायरे को लेकर नई बहस शुरू हो गई है। यदि सुप्रीम कोर्ट इस मामले में दसवीं अनुसूची की नई व्याख्या करता है, तो इसका असर भविष्य में सांसदों और विधायकों के दल बदलने से जुड़े मामलों पर पड़ सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को वरिष्ठ अधिवक्ता और राज्यसभा सांसद कपिल सिब्बल की उस याचिका पर सुनवाई करने के लिए सहमति दे दी, जिसमें संविधान की दसवीं अनुसूची (दलबदल विरोधी कानून) की व्याख्या पर पुनर्विचार की मांग की गई है। अदालत इस मामले की सुनवाई 27 जुलाई (सोमवार) को करेगी। मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहन की पीठ के सामने कपिल सिब्बल ने कहा कि उन्होंने यह याचिका व्यक्तिगत क्षमता में दायर की है और इस पर जल्द सुनवाई की जरूरत है। सिब्बल ने अदालत से कहा कि उनकी याचिका का मुख्य सवाल यह है कि क्या संसद और विधानसभाओं की संरचना इस तरह बदली जा सकती है, जैसा हाल के वर्षों में देखने को मिला है। उन्होंने विशेष रूप से दसवीं अनुसूची के पैरा-4 की व्याख्या पर सवाल उठाया है।
क्या है पैरा-4 का प्रावधान?
संविधान की दसवीं अनुसूची का पैरा-4 यह प्रावधान करता है कि यदि किसी राजनीतिक दल का किसी दूसरे दल में विलय हो जाता है और आवश्यक संख्या में विधायक या सांसद उसका समर्थन करते हैं, तो उन्हें दलबदल कानून के तहत अयोग्य नहीं ठहराया जाएगा। कपिल सिब्बल का कहना है कि इस प्रावधान की मौजूदा व्याख्या का इस्तेमाल कई मामलों में इस तरह किया जा रहा है कि सांसद और विधायक बिना अयोग्यता झेले दूसरे दलों में शामिल हो रहे हैं। उनका तर्क है कि इससे दलबदल विरोधी कानून का उद्देश्य कमजोर पड़ता है। इस सुनवाई के दौरान सिब्बल ने अदालत को बताया कि इसी मुद्दे से जुड़े कई मामले पहले से सुप्रीम कोर्ट में लंबित हैं। उन्होंने यह भी कहा कि शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) की ओर से लोकसभा अध्यक्ष के उस फैसले को चुनौती देने वाली याचिका भी अदालत में सूचीबद्ध है, जिसमें पार्टी के कुछ सांसदों के शिंदे गुट में विलय को मंजूरी दी गई थी। सिब्बल की दलीलों पर गौर करने के बाद मुख्य न्यायाधीश ने उनकी याचिका को 27 जुलाई को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया।
हाल के घटनाक्रम से जुड़ा मामला
यह याचिका ऐसे समय में आई है जब हाल के वर्षों में आम आदमी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस और शिवसेना (यूबीटी) के कुछ सांसदों ने दसवीं अनुसूची के विलय संबंधी प्रावधानों का हवाला देते हुए भाजपा और अन्य राजनीतिक दलों का दामन थामा है। इसी वजह से दलबदल कानून की व्याख्या और उसके दायरे को लेकर नई बहस शुरू हो गई है। यदि सुप्रीम कोर्ट इस मामले में दसवीं अनुसूची की नई व्याख्या करता है, तो इसका असर भविष्य में सांसदों और विधायकों के दल बदलने से जुड़े मामलों पर पड़ सकता है।
ब्रह्मोस के पूर्व इंजीनियर की रिहाई पर सुप्रीम कोर्ट अगस्त में करेगा सुनवाई; क्या है पूरा मामला
सुप्रीम कोर्ट उस याचिका पर सुनवाई को लेकर तैयार हो गया है, जिसमें ब्रह्मोस एयरोस्पेस के इंजीनियर को जासूसी के आरोप से बरी करने के बांबे हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती दी गई थी। निशांत अग्रवाल को शासकीय गोपनीयता अधिनियम के आरोपों से बरी किए जाने के खिलाफ यह याचिका यूपी के आतंकवाद निरोधक दस्ते (एटीएस) की ओर से दाखिल की गई है। जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस संजीव सचदेवा की पीठ ने पिछले वर्ष एक दिसंबर के फैसले के खिलाफ यूपी एटीएस की याचिका पर नोटिस जारी किया। कोर्ट ने 13 जुलाई के अपने आदेश में कहा, नोटिस जारी किया जाता है। मामले की अगली सुनवाई 31 अगस्त को होगी। मामला शुरुआत में उत्तर प्रदेश एटीएस ने दर्ज किया था और सुनवाई लखनऊ में हुई थी। हालांकि, बाद में मामले को नागपुर स्थानांतरित कर दिया गया, क्योंकि कथित अपराध का स्थान वहीं माना गया।
2023 में मिली थी जमानत
अग्रवाल को इस मामले में 2023 में जमानत मिल गई थी। हाईकोर्ट के इस आदेश के बाद यूपी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। 3 जून, 2024 को नागपुर की एक जिला अदालत ने आईएसआई के लिए जासूसी के मामले में अग्रवाल को आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी और जुर्माना भी लगाया था।
सुप्रीम कोर्ट उस याचिका पर सुनवाई को लेकर तैयार हो गया है, जिसमें ब्रह्मोस एयरोस्पेस के इंजीनियर को जासूसी के आरोप से बरी करने के बांबे हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती दी गई थी। निशांत अग्रवाल को शासकीय गोपनीयता अधिनियम के आरोपों से बरी किए जाने के खिलाफ यह याचिका यूपी के आतंकवाद निरोधक दस्ते (एटीएस) की ओर से दाखिल की गई है। जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस संजीव सचदेवा की पीठ ने पिछले वर्ष एक दिसंबर के फैसले के खिलाफ यूपी एटीएस की याचिका पर नोटिस जारी किया। कोर्ट ने 13 जुलाई के अपने आदेश में कहा, नोटिस जारी किया जाता है। मामले की अगली सुनवाई 31 अगस्त को होगी। मामला शुरुआत में उत्तर प्रदेश एटीएस ने दर्ज किया था और सुनवाई लखनऊ में हुई थी। हालांकि, बाद में मामले को नागपुर स्थानांतरित कर दिया गया, क्योंकि कथित अपराध का स्थान वहीं माना गया।
2023 में मिली थी जमानत
अग्रवाल को इस मामले में 2023 में जमानत मिल गई थी। हाईकोर्ट के इस आदेश के बाद यूपी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। 3 जून, 2024 को नागपुर की एक जिला अदालत ने आईएसआई के लिए जासूसी के मामले में अग्रवाल को आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी और जुर्माना भी लगाया था।