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Supreme Court Update: बिहार विधानसभा चुनाव को लेकर जन सुराज पार्टी कोर्ट पहुंची, नए सिरे से मतदान की मांग

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली। Published by: राहुल कुमार Updated Thu, 05 Feb 2026 09:50 PM IST
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Supreme Court updates Prashant Kishor's Jan Suraj Party has approached the court
मतदान के बाद लोगों से मिलते प्रशांत किशोर। - फोटो : अमर उजाला
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पूर्व चुनाव रणनीतिकार प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी ने बिहार विधानसभा चुनाव, 2025 को चुनौती देते हुए राज्य में नए सिरे से चुनाव कराने का अनुरोध करते हुए उच्चतम न्यायालय में याचिका दायर की है। इस मामले की सुनवाई शुक्रवार को प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ के समक्ष होने की संभावना है।

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यह मामला शुक्रवार को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध होने की संभावना है। याचिका पर जस्टिस सूर्यकांत और जॉयमाल्या बागची की पीठ सुनवाई कर सकती है। याचिका में जन सुराज पार्टी ने बिहार सरकार पर आदर्श आचार संहिता के उल्लंघन का आरोप लगाया है। पार्टी का कहना है कि चुनाव कार्यक्रम की घोषणा के बाद मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना के तहत महिलाओं के खातों में 10-10 हजार रुपये की राशि सीधे ट्रांसफर की गई, जो चुनावी प्रक्रिया को प्रभावित करने वाला कदम है। जन सुराज पार्टी ने अदालत से मांग की है कि निर्वाचन आयोग संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत अपने अधिकारों का इस्तेमाल करे और जन प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 123 के अंतर्गत इस मामले में कार्रवाई करे। याचिका में कहा गया है कि महिलाओं को सीधे धन हस्तांतरण कर मतदाताओं को प्रभावित करने की कोशिश की गई।
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जन सुराज पार्टी एक भी सीट नहीं जीत सकी
बिहार विधानसभा चुनाव में भाजपा-एनडीए ने 243 में से 202 सीटें जीतकर सत्ता बरकरार रखी। वहीं, इंडिया गठबंधन को कुल 35 सीटें मिलीं, जिनमें कांग्रेस की छह सीटें शामिल हैं। जन सुराज पार्टी एक भी सीट नहीं जीत सकी और उसके अधिकांश उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई। उल्लेखनीय है कि मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना के तहत महिलाओं को छोटे कारोबार शुरू करने के लिए शुरुआती सहायता राशि दी जाती है। सरकार का दावा है कि इस योजना का उद्देश्य स्वरोजगार को बढ़ावा देना और महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त बनाना है।

बंगाल में एसआईआर के दौरान हुईं हिंसा और बाधा डालने की घटनाएं

निर्वाचन आयोग ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि पश्चिम बंगाल में विशेष गहन पुनरीक्षण के दौरान चुनाव अधिकारियों के खिलाफ हिंसा, धमकी और बाधा उत्पन्न होने की कई घटनाएं हुईं। अपने हलफनामे में, आयोग ने दावा किया कि ये घटनाएं अन्य राज्यों में हुए मतदाता सूची संशोधन के चरण के विपरीत थीं, जो सुचारू रूप से और बिना किसी घटना के संपन्न हुआ।


आयोग ने कहा कि आगामी विधानसभा चुनावों के लिए 2025 की मतदाता सूची का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है क्योंकि विशेष मतदाता सूची संशोधन के दौरान 58 लाख से अधिक अनुपस्थित, मृत और स्थानांतरित मतदाताओं की पहचान की गई है। मतदाता पंजीकरण अधिकारियों की ओर से लगभग 1.51 करोड़ नोटिस जारी किए जा रहे हैं। हलफनामे के अनुसार, स्थानीय पुलिस अधिकारियों की ओर से मतदाता सूची संशोधन अधिकारियों (बीएलओ) की शिकायतों पर मामले दर्ज करने में व्यापक अनिच्छा बरती गई। कुछ एफआईआर जिला चुनाव अधिकारियों के हस्तक्षेप के बाद ही दर्ज की गईं। इसमें कहा गया कि राज्य ने एफआईआर दर्ज करने और अनुशासनात्मक कार्रवाई के संबंध में चुनाव आयोग के निर्देशों का जानबूझकर पालन नहीं किया।

मुख्य निर्वाचन अधिकारी के घेराव की कहानी भी बताई
आयोग ने हलफनामे में पिछले साल 24 नवंबर को मुख्य निर्वाचन अधिकारी के कोलकाता कार्यालय के घेराव के बारे में भी विस्तार से बताया। इसमें कहा गया कि प्रदर्शनकारियों ने जबरन प्रवेश करने का प्रयास किया, पुलिस बैरिकेड तोड़े, कार्यालय में तोड़फोड़ की, अधिकारियों के काम में बाधा डाली, परिसर को बंद कर दिया। अधिकारियों को अंदर-बाहर आने-जाने से रोका, जिससे सरकारी कामकाज गंभीर रूप से बाधित हुआ।

हलफनामे में कहा गया है कि सुरक्षा उल्लंघन के संबंध में चुनाव आयोग ने कोलकाता के पुलिस आयुक्त को पत्र लिखे। प्रदर्शनकारी लगभग 28 घंटे तक परिसर में डेरा डाले रहे और इस संबंध में कोई मामला दर्ज नहीं किया गया और न ही कोई गिरफ्तारी हुई।

खतरे को देख गृह मंत्रालय ने वाई श्रेणी की सुरक्षा दी
हलफनामे में इस बात पर जोर दिया गया कि केंद्रीय गृह मंत्रालय ने खतरे के आकलन के बाद पश्चिम बंगाल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी को वाई श्रेणी की सुरक्षा प्रदान की थी। वे इस तरह की सुरक्षा पाने वाले एकमात्र निर्वाचन अधिकारी थे। मतदान अधिकारियों ने इन शर्तों के बावजूद, जनगणना चरण के दौरान कुल 7.08 करोड़ से अधिक जनगणना प्रपत्र एकत्र किए। इसमें इस बात पर जोर दिया गया कि पात्रता निर्धारित करने और त्रुटियों को दूर करने के लिए चल रहा नोटिस चरण महत्वपूर्ण था और मतदाता सूची की निष्पक्षता के लिए बिना किसी भय या धमकी के इसे पूरा करना जरूरी था।

फ्लैट किराए पर देने से घर खरीदार के उपभोक्ता अधिकार समाप्त नहीं हो जाते: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी आवासीय फ्लैट को पट्टे पर देना या किराए पर देने मात्र से ही संपत्ति के खरीदार को उपभोक्ता संरक्षण कानून के तहत अपने अधिकारों का लाभ उठाने से वंचित नहीं किया जा सकता। जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस एनवी अंजारिया की पीठ ने संपत्ति के निर्माणकर्ता पर यह साबित करने का दायित्व डाला कि फ्लैट खरीदने का प्रमुख उद्देश्य व्यावसायिक उद्देश्य था, ताकि खरीदार को उपभोक्ता श्रेणी से बाहर रखा जा सके।

पीठ ने कहा कि उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम की धारा 2(1)(घ) में कहा गया है कि उपभोक्ता शब्द में वह व्यक्ति शामिल है जो प्रतिफल के बदले वस्तुएं खरीदता है या सेवाएं लेता है। इसमें वह व्यक्ति शामिल नहीं है जो पुनर्विक्रय या किसी व्यावसायिक उद्देश्य के लिए ऐसी वस्तुएं प्राप्त करता है। पीठ ने कहा, फ्लैट को किराये पर देने मात्र से यह सिद्ध नहीं होता कि अपीलकर्ता ने संपत्ति को मुख्य रूप से व्यावसायिक गतिविधि में संलग्न होने के उद्देश्य से खरीदा था। 

अदालत ने कहा, व्यावसायिक उद्देश्य क्या होता है, यह एक तथ्यात्मक प्रश्न है जिसका निर्णय प्रत्येक मामले की परिस्थितियों के आधार पर, माल/संपत्तियों की खरीद के उद्देश्य के अनुसार किया जाना चाहिए। इसमें इस बात पर जोर दिया गया कि अचल संपत्ति, यहां तक कि कई इकाइयों को खरीदने मात्र से ही 1986 अधिनियम की धारा 2(1)(डी) का अपवर्जन स्वतः लागू नहीं हो जाता, जब तक कि यह साबित न हो जाए कि ऐसी खरीद के पीछे प्रमुख उद्देश्य वाणिज्यिक प्रकृति का था।

आरोपी वकील का खर्च नहीं उठा सकता तो ट्रायल शुरू होने से पहले कोर्ट कानूनी सहायता दे: शीर्ष अदालत

सुप्रीम कोर्ट ने अदालतों को निर्देश दिया कि यदि आरोपी वकील का खर्च नहीं उठा सकता है तो वे ट्रायल शुरू होने से पहले उन्हें कानूनी सहायता देने की पेशकश करें और उनका जवाब रिकॉर्ड करें। शीर्ष अदालत ने यह निर्देश यह सुनिश्चित करने के लिए दिया कि आपराधिक मामलों में जिन आरोपियों के पास वकील करने के पैसे नहीं हैं, उन्हें भी वकील मिले।

जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस के विनोद चंद्रन की पीठ ने नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रॉपिक सब्सटेंस (एनडीपीएस) कानून के तहत दर्ज एक मामले में रेजिनामरी चेल्लामणि की लंबी कैद पर ध्यान देते हुए ट्रायल कोर्ट को अपने आदेश का सख्ती से पालन करने को कहा। चेल्लामणि को जमानत देते हुए पीठ ने कहा कि उन्होंने शुरुआती चरण पर गवाहों से जिरह नहीं की थी और यह तभी हुआ जब उन्होंने अपना वकील किया तथा गवाहों से दोबारा पूछताछ करने की उनकी अर्जी स्वीकार हुई। इसके बाद ही उन्हें ऐसा करने की इजाजत मिली।

पीठ ने कहा कि आरोपी रेजिनामरी चेल्लामणि के पास से कथित तौर पर जब्त किए गए गैर-कानूनी पदार्थ की मात्रा बताए गए कानून के तहत उस संबंध में तय की गई कमर्शियल मात्रा से ज्यादा है। हालांकि, हमने पाया कि अपीलकर्ता रेजिनामरी चेल्लामणि आज की तारीख तक चार साल एक महीने और 28 दिनों से हिरासत में हैं। पीठ ने कहा कि अपीलकर्ता ने जितनी जेल की सजा पहले ही काट ली है, उन्हीं की तरह की स्थिति वाले एक और आरोपी को इस कोर्ट ने उन्हें जमानत दे दी है। इसलिए हम इस चरण पर अपीलकर्ता चेल्लामणि को भी वही राहत देने के इच्छुक हैं।

ये आपसी सहमति से बने रिश्ते के कटुतापूर्ण रूप होने का स्पष्ट उदाहरण: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने शादी का झूठा वादा कर दुष्कर्म के आरोप वाली एफआईआर रद्द करते हुए कहा कि यह स्पष्ट रूप से सहमति से बने रिश्ते के कटुतापूर्ण रूप लेने का एक मामला है। जस्टिस बीवी नागरत्ना व जस्टिस उज्जल भुइयां की पीठ ने कहा कि पक्षों को संयम बरतना चाहिए था और अपने निजी रिश्ते में कटुता आने पर राज्य को इसमें शामिल नहीं करना चाहिए था।

पीठ ने सुप्रीम कोर्ट के कुछ पूर्व निर्णयों का हवाला भी दिया, जिनमें से एक में असफल या टूटे रिश्तों को अपराध का रंग देने की चिंताजनक प्रवृत्ति पर गौर किया गया था। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के पिछले वर्ष मार्च के एक आदेश को चुनौती वाली याचिका पर आया। हाईकोर्ट ने बिलासपुर जिले में फरवरी 2025 में दर्ज एफआईआर से संबंधित कार्यवाही को रद्द करने से इन्कार कर दिया था।

फ्लैट किराये पर देने से घर खरीदार के उपभोक्ता अधिकार समाप्त नहीं हो जाते
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी आवासीय फ्लैट को पट्टे पर देना या किराये पर देने मात्र से ही संपत्ति के खरीदार को उपभोक्ता संरक्षण कानून के तहत अपने अधिकारों का लाभ उठाने से वंचित नहीं किया जा सकता। जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस एनवी अंजारिया की पीठ ने संपत्ति के निर्माणकर्ता पर यह साबित करने का दायित्व डाला कि फ्लैट खरीदने का प्रमुख उद्देश्य व्यावसायिक उद्देश्य था, ताकि खरीदार को उपभोक्ता श्रेणी से बाहर रखा जा सके। पीठ ने कहा कि उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम की धारा 2(1)(घ) में कहा गया है कि उपभोक्ता शब्द में वह व्यक्ति शामिल है जो प्रतिफल के बदले वस्तुएं खरीदता है या सेवाएं लेता है। इसमें वह व्यक्ति शामिल नहीं है जो पुनर्विक्रय या किसी व्यावसायिक उद्देश्य के लिए ऐसी वस्तुएं प्राप्त करता है।

पीठ ने कहा, फ्लैट को किराये पर देने मात्र से यह सिद्ध नहीं होता कि अपीलकर्ता ने संपत्ति को मुख्य रूप से व्यावसायिक गतिविधि में संलग्न होने के उद्देश्य से खरीदा था। अदालत ने कहा, व्यावसायिक उद्देश्य क्या होता है, यह एक तथ्यात्मक प्रश्न है जिसका निर्णय प्रत्येक मामले की परिस्थितियों के आधार पर, माल/संपत्तियों की खरीद के उद्देश्य के अनुसार किया जाना चाहिए। इसमें इस बात पर जोर दिया गया कि अचल संपत्ति, यहां तक कि कई इकाइयों को खरीदने मात्र से ही 1986 अधिनियम की धारा 2(1)(डी) का अपवर्जन स्वतः लागू नहीं हो जाता, जब तक कि यह साबित न हो जाए कि ऐसी खरीद के पीछे प्रमुख उद्देश्य वाणिज्यिक प्रकृति का था। सुप्रीम कोर्ट ने विनीत बाहरी की अपील पर यह आदेश पारित किया, इसमें उन्होंने राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (एनसीडीआरसी) के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें फ्लैट के कब्जे में देरी के संबंध में उनकी शिकायत को खारिज कर दिया गया था।

जमीअत को मियां शब्द पर आपत्ति, शीर्ष अदालत से नेताओं के बयानों पर दिशा-निर्देश जारी करने की मांग
जमीअत उलमा-ए-हिंद ने सुप्रीम कोर्ट से सांविधानिक पदों पर बैठे लोगों के विभाजनकारी बयानों पर रोक लगाने के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी करने की अपील की है। इसके लिए असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के हालिया भाषणों का हवाला दिया गया है। जमीअत ने वर्ष 2021 में दायर अपनी याचिका, जिसमें नफरती भाषण को नियंत्रित करने की मांग की गई है, के तहत लिखित दलीलें दाखिल की हैं। इन दलीलों में इस साल 27 जनवरी को असम में मुख्यमंत्री के उस बयान का उल्लेख है, जिसमें कहा गया था कि विशेष गहन पुनरीक्षण अभ्यास के बाद चार से पांच लाख ‘मियां’ मतदाताओं को हटाया जाएगा। जमीअत का कहना है कि ‘मियां’ शब्द असम में मुसलमानों के लिए अपमानजनक संदर्भ में प्रयोग किया जाता है।

याचिकाकर्ता के अनुसार, यह बयान कोई अकेली घटना नहीं है। सांविधानिक पदों पर बैठे कई लोग लगातार ऐसे शब्दों और भाषणों का प्रयोग कर रहे हैं, जो किसी विशेष समुदाय को निशाना बनाते हैं। जमीअत ने तर्क दिया कि नफरत फैलाने वाले भाषण संविधान में निहित समानता, धर्मनिरपेक्षता, भाईचारे और गरिमा के सिद्धांतों के खिलाफ हैं। दलीलों में यह भी कहा गया कि यद्यपि भारतीय न्याय संहिता में नफरती भाषण से निपटने के लिए प्रावधान मौजूद हैं लेकिन छिपे हुए या संदर्भ आधारित नफरती भाषण अक्सर पुलिस की चयनात्मक कार्रवाई के कारण दंड से बच जाते हैं। जमीअत ने सुप्रीम कोर्ट से अनुच्छेद 142 के तहत हस्तक्षेप कर ऐसे दिशानिर्देश तय करने की मांग की है, जिससे 'माननीयों' को सांप्रदायिक और विभाजनकारी भाषा के प्रयोग से रोका जा सके।

चुनावी रेवड़ियों का मुद्दा जनहित से जुड़ा, करेंगे सुनवाई: शीर्ष कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने चुनावों के दौरान राजनीतिक दलों की ओर से मुफ्त सुविधाएं (रेवड़ियां) देने और उससे जुड़े वादों के मुद्दे का परीक्षण करने पर सहमति जताई। इस मामले को महत्वपूर्ण जनहित से जुड़ा बताते हुए शीर्ष अदालत ने कहा कि इस पर तीन जजों की पीठ को सुनवाई करनी चाहिए। सीजेआई जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की पीठ के समक्ष अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय ने अपनी याचिका का उल्लेख करते हुए आग्रह किया कि आने वाले दिनों में कई राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं, ऐसे में इस मामले की तत्काल सुनवाई आवश्यक है। उन्होंने कहा, सूरज और चांद को छोड़कर, चुनाव के दौरान राजनीतिक दल मतदाताओं से हर चीज का वादा करते हैं और यह भ्रष्टाचार का सरासर उल्लंघन है।

इस पर सीजेआई ने कहा, यह एक महत्वपूर्ण मुद्दा है। हम इसे मार्च में सूचीबद्ध करेंगे। उन्होंने संकेत दिया कि इस मामले को विस्तृत विचार के लिए तीन जजों की पीठ के समक्ष रखा जाएगा। हालांकि उन्होंने याचिकाकर्ता से मार्च तक इंतजार करने के लिए कहा। उपाध्याय ने कहा कि राजनीतिक दल मतदाताओं को लुभाने के लिए लगातार बढ़-चढ़कर वादे कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि पांच विधानसभा चुनाव आने वाले हैं। उन्होंने कहा कि अब सिर्फ सूरज और चांद का वादा करना ही बाकी रह गया है। यह सब भ्रष्ट आचरण है। याचिका में केंद्र सरकार, चुनाव आयोग से चुनावी घोषणापत्रों को नियंत्रित करने और सार्वजनिक धन से जुड़े वादों पर जवाबदेही सुनिश्चित करने के निर्देश देने की मांग की गई है।

वांगचुक की हिरासत को चुनौती वाली अर्जी पर सुनवाई 9 तक टली
सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत हिरासत में लिए गए पर्यावरण कार्यकर्ता सोनम वांगचुक की पत्नी गीतांजलि जे आंगमो की याचिका पर सुनवाई 9 फरवरी तक स्थगित कर दी। यह मामला जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस पी बी वराले की पीठ के समक्ष आया। इससे पहले बुधवार को शीर्ष अदालत ने केंद्र सरकार से वांगचुक की सेहत को देखते हुए उनकी हिरासत पर पुनर्विचार की संभावना के बारे में सवाल किया था। केंद्र की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल के एम नटराज ने अदालत को बताया कि वांगचुक पर पिछले साल लेह में हुई हिंसा भड़काने का आरोप है, जिसमें चार लोगों की मौत हुई और 161 लोग घायल हुए। मंगलवार को केंद्र और लद्दाख केंद्रशासित प्रदेश प्रशासन ने अदालत को बताया था कि सीमा क्षेत्र की संवेदनशीलता को देखते हुए वांगचुक को हिरासत में लिया गया। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत हिरासत के सभी प्रक्रियागत प्रावधानों का पालन किया गया। 29 जनवरी को जोधपुर सेंट्रल जेल में बंद वांगचुक ने आरोपों को खारिज करते हुए कहा था कि सरकार की आलोचना और शांतिपूर्ण विरोध उनका लोकतांत्रिक अधिकार है।

बिहार विस चुनाव को लेकर जन सुराज पार्टी पहुंची सुप्रीम कोर्ट
जन सुराज पार्टी ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर कथित अवैध और भ्रष्ट आचरण के आधार पर बिहार विधानसभा चुनाव 2025 को चुनौती दी है। पार्टी ने चुनाव रद्द कर नए सिरे से विधानसभा चुनाव कराने की मांग की है। इस याचिका पर मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ शुक्रवार को सुनवाई करेगी। संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत दायर याचिका में आरोप लगाया गया है कि आदर्श आचार संहिता लागू रहने के दौरान राज्य सरकार ने मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना के तहत महिला मतदाताओं को सीधे 10 हजार रुपए का भुगतान किया।

याचिका के अनुसार, इस अवधि में नए लाभार्थियों को जोड़ना और भुगतान करना संविधान के अनुच्छेद 14, 21, 112, 202 और 324 का उल्लंघन है। पार्टी ने दावा किया है कि बिहार चुनाव के दौरान लगभग 25 से 35 लाख महिला मतदाताओं को राशि दी गई, जो जन प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 123 के तहत भ्रष्ट आचरण की श्रेणी में आता है। याचिका में यह भी आरोप लगाया गया है कि ‘जीविका’ से जुड़ी करीब एक लाख 80 हजार महिला लाभार्थियों को दोनों चरणों के मतदान के दौरान मतदान केंद्रों पर तैनात किया गया, जिससे चुनाव की निष्पक्षता प्रभावित हुई। पार्टी ने सुप्रीम कोर्ट से चुनाव आयोग को चुनावी रेवड़ियां और डीबीटी योजनाओं पर स्पष्ट दिशानिर्देश जारी करने और बिहार में नए सिरे से चुनाव कराने का आदेश देने का अनुरोध किया है।

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