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Ground Report: सितारों की स्क्रिप्ट...लाइट्स व कैमरे के बाद अगला सीन पॉलिटिक्स; फैन बेस से वोट बैंक तक का सफर
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सार
तमिलनाडु की राजनीति में फिल्म स्टार्स का हमेशा दबदबा रहा है और उनकी लोकप्रियता चुनाव में जीत का अहम फैक्टर मानी जाती है। राज्य के पांच मुख्यमंत्रियों में से हर किसी का फिल्मों से नाता रहा है। हालांकि तमिलनाडु के वोटर ने ये भी समझाया है कि सिनेमा तमिलनाडु में सियासत का दरवाजा जरूर हो सकता है, लेकिन सिंहासन के लिए संगठन जरूरी है।
तमिलनाडु के पांचों मुख्यमंत्रियों का सिनेमा से ताल्लुक रहा है।
- फोटो : Amar Ujala Graphics
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विस्तार
तमिलनाडु में कई बार लाइट्स, कैमरे के बाद अगला सीन पॉलिटिक्स होता है। फिल्मों में बोले गए डायलॉग वोट में बदल जाने की ताकत और तौफीक रखते हैं। सियासत फिल्मी सेट के दर से अपना रास्ता खोजती है। और बॉक्स ऑफिस बैलेट बॉक्स बन जाता है। चेन्नई के वो इलाके जो लार्जर देन लाइफ कट आउट से लदे रहते थे वहां इन दिनों पॉलिटिकल पार्टियों के बैनर हैं और चुनाव लड़ रहे चेहरों के क्लोजअप शॉट्स। अरुण अपने फोन पर थलापति विजय की फिल्मों के गाने लूप में सुन रहे हैं। शांतला की फोन स्क्रीन पर उसी का वॉलपेपर है। तमिलनाडु में विधानसभा चुनाव 2026 में सबसे ज्यादा चर्चा सी जोसेफ विजय उर्फ थलापति विजय की हो रही है। वो सितारों की सियासी स्क्रिप्ट का नया क्लाइमेक्स लिखने की तैयारी कर रहे हैं।
वैसे तमिलनाडु की राजनीति में फिल्मों की छाया कोई नई बात नहीं। राज्य के पांच मुख्यमंत्रियों का फिल्मों से कोई न कोई वास्ता रहा है। अन्नादुरई फिल्मों के डायलॉग लिखते थे तो करुणानिधि स्क्रिप्ट राइटर थे। एमजीआर एक्टर से सीएम बने थे। सिर्फ 23 दिन के लिए ही सही लेकिन राज्य की पहली महिला मुख्यमंत्री बनीं एमजीआर की पत्नी वीएन जानकी रामचंद्रन एक्ट्रेस थीं। जयललिता पांचवीं नेता थीं जो एक्टिंग के बाद राजनीति में आईं।
सियासत और सिनेमा का गठबंधन यहां खत्म नहीं हुआ। वक्त बदला। फिल्मों की दीवानगी बदली। पहले स्टार भगवान था, अब लोग पूछते हैं - नौकरी, मुफ्त सामान या शिक्षा-स्वास्थ्य में से क्या दोगे? वोटर ने ये समझाया कि सिनेमा तमिलनाडु में सियासत का दरवाजा जरूर हो सकता है, लेकिन सिंहासन के लिए संगठन जरूरी है। तमिलनाडु में कुल वोटर का पांचवां हिस्सा युवा हैं। वो युवा जो फिल्मों के पहले वारिस माने जाते हैं। ऑटोवाले से लेकर सड़क किनारे दुकान लगाने वाले और झुग्गियों से लेकर संकरे मोहल्लों में रहने वालों के मुंह पर विजय के गाने सियासी धुन सुना रहे हैं। अगर वो सब वोट देते समय भी विजय के हक में जाते हैं तो तमिलनाडु में इतिहास रिवर्स गियर में है। एक और फिल्म स्टार नेता बनने जा रहा है।
तमिलनाडु में सियासत में फिल्मों का इस्तेमाल होता था। 1950 में अन्नादुरई और करुणानिधि ने अपनी राजनीति के लिए फिल्मी दुनिया की मदद ली। द्रविड़ पॉलिटिक्स फिल्मों का हिस्सा बनने लगी। एमजीआर की पर्दे पर गरीबों के मसीहा वाली इमेज थी। 1977 में इसी फिल्मी छवि की बदौलत सरकार बना ली। तीन बार सीएम रहे। एमजीआर ने 130 फिल्मों में काम किया। उनके रोल भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ने वाले रहे। वो जो डायलॉग फिल्मों में बोलते थे उन्हें चुनावी भाषण में इस्तेमाल करने लगे। जो युवा उनके लिए पोस्टर लगाते, ब्लड डोनेशन कैंप लगाते थे, बाद में वो पार्टी का कैडर बन गया। वो बीमार पड़े तो लोग मंदिर में प्रार्थना करने लगे। उनकी मौत हुई तो कई दर्जन लोगों ने आत्महत्या कर ली, खाना पीना छोड़ दिया, लोग सड़कों पर आ गए। उनकी विरासत जयललिता को मिली। जयललिता की फिल्मी कहानी सशक्त महिला की थी। वो राजनीति का अम्मा ब्रांड बनीं। 1991, 2001, 2011 और 2016 में सीएम बनीं। 2016 में तो उनके हिस्से 41 प्रतिशत वोट शेयर था।
हालांकि फिल्मों से राजनीति में आने वाले सभी सफल नहीं हुए, न ही सब सीएम बने। मशहूर एक्टर शिवाजी गणेशन 1988 में अपनी पार्टी लेकर आए, पर सफल न हुए। एक्टर विजयकांत ने 2005 में अपनी पार्टी डीएमडीके लॉन्च की और 2011 में विपक्ष के नेता बने। कमल हासन ने 2018 में अपनी पार्टी एमएनएम बनाई। पर उन्हें 2019 के लोकसभा चुनाव में एक भी सीट नहीं मिली, सिर्फ 3.7 प्रतिशत वोट उनके हिस्से आए। 2021 विधानसभा चुनाव में वोट शेयर कम होकर 2.6 प्रतिशत आ गिरा और खुद कोयंबटूर साउथ से चुनाव हार गए। वरिष्ठ पत्रकार टी रामकृष्णन कहते हैं कमल हासन राजनीति में असरदार साबित नहीं हुए। वो बेहतरीन कलाकार तो हैं लेकिन राजनेता नहीं बन पाए। उन्होंने अपनी पॉलिटिकल स्ट्रैटेजी पर भी कॉम्प्रोमाइज किया। चुनाव के अगले दिन स्टालिन से जा मिले। लोगों को डर है कहीं विजय भी कुछ ऐसा न करें।
बात मशहूर होने से ज्यादा राजनीति के अनुभव की है। मद्रास यूनिवर्सिटी के राजनीति विभाग के पूर्व एचओडी प्रोफेसर रामू कहते हैं एमजीआर जब राजनीति में आए तो उनके पास उसका लंबा अनुभव हो चुका था। उनके पिता द्रविड़ राजनीति के बड़े नेता थे। जयललिता ने भी चुनाव लड़ने से पहले पार्टी में छोटे-बड़े रोल में काम किया। फिर वो एमजीआर की उत्तराधिकारी भी थीं। विजय के पास कोई अनुभव नहीं है। 2 साल पहले पार्टी बनाई और सीधे सीएम बनने का ख्वाब देख रहे हैं। तमिलनाडु की राजनीति में कैमरा रोल हो चुका है। सत्ता की स्क्रिप्ट 23 तारीख को राज्य की जनता लिखेगी।
सियासत और सिनेमा का गठबंधन यहां खत्म नहीं हुआ। वक्त बदला। फिल्मों की दीवानगी बदली। पहले स्टार भगवान था, अब लोग पूछते हैं - नौकरी, मुफ्त सामान या शिक्षा-स्वास्थ्य में से क्या दोगे? वोटर ने ये समझाया कि सिनेमा तमिलनाडु में सियासत का दरवाजा जरूर हो सकता है, लेकिन सिंहासन के लिए संगठन जरूरी है। तमिलनाडु में कुल वोटर का पांचवां हिस्सा युवा हैं।
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वैसे तमिलनाडु की राजनीति में फिल्मों की छाया कोई नई बात नहीं। राज्य के पांच मुख्यमंत्रियों का फिल्मों से कोई न कोई वास्ता रहा है। अन्नादुरई फिल्मों के डायलॉग लिखते थे तो करुणानिधि स्क्रिप्ट राइटर थे। एमजीआर एक्टर से सीएम बने थे। सिर्फ 23 दिन के लिए ही सही लेकिन राज्य की पहली महिला मुख्यमंत्री बनीं एमजीआर की पत्नी वीएन जानकी रामचंद्रन एक्ट्रेस थीं। जयललिता पांचवीं नेता थीं जो एक्टिंग के बाद राजनीति में आईं।
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सियासत और सिनेमा का गठबंधन यहां खत्म नहीं हुआ। वक्त बदला। फिल्मों की दीवानगी बदली। पहले स्टार भगवान था, अब लोग पूछते हैं - नौकरी, मुफ्त सामान या शिक्षा-स्वास्थ्य में से क्या दोगे? वोटर ने ये समझाया कि सिनेमा तमिलनाडु में सियासत का दरवाजा जरूर हो सकता है, लेकिन सिंहासन के लिए संगठन जरूरी है। तमिलनाडु में कुल वोटर का पांचवां हिस्सा युवा हैं। वो युवा जो फिल्मों के पहले वारिस माने जाते हैं। ऑटोवाले से लेकर सड़क किनारे दुकान लगाने वाले और झुग्गियों से लेकर संकरे मोहल्लों में रहने वालों के मुंह पर विजय के गाने सियासी धुन सुना रहे हैं। अगर वो सब वोट देते समय भी विजय के हक में जाते हैं तो तमिलनाडु में इतिहास रिवर्स गियर में है। एक और फिल्म स्टार नेता बनने जा रहा है।
तमिलनाडु में सियासत में फिल्मों का इस्तेमाल होता था। 1950 में अन्नादुरई और करुणानिधि ने अपनी राजनीति के लिए फिल्मी दुनिया की मदद ली। द्रविड़ पॉलिटिक्स फिल्मों का हिस्सा बनने लगी। एमजीआर की पर्दे पर गरीबों के मसीहा वाली इमेज थी। 1977 में इसी फिल्मी छवि की बदौलत सरकार बना ली। तीन बार सीएम रहे। एमजीआर ने 130 फिल्मों में काम किया। उनके रोल भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ने वाले रहे। वो जो डायलॉग फिल्मों में बोलते थे उन्हें चुनावी भाषण में इस्तेमाल करने लगे। जो युवा उनके लिए पोस्टर लगाते, ब्लड डोनेशन कैंप लगाते थे, बाद में वो पार्टी का कैडर बन गया। वो बीमार पड़े तो लोग मंदिर में प्रार्थना करने लगे। उनकी मौत हुई तो कई दर्जन लोगों ने आत्महत्या कर ली, खाना पीना छोड़ दिया, लोग सड़कों पर आ गए। उनकी विरासत जयललिता को मिली। जयललिता की फिल्मी कहानी सशक्त महिला की थी। वो राजनीति का अम्मा ब्रांड बनीं। 1991, 2001, 2011 और 2016 में सीएम बनीं। 2016 में तो उनके हिस्से 41 प्रतिशत वोट शेयर था।
हालांकि फिल्मों से राजनीति में आने वाले सभी सफल नहीं हुए, न ही सब सीएम बने। मशहूर एक्टर शिवाजी गणेशन 1988 में अपनी पार्टी लेकर आए, पर सफल न हुए। एक्टर विजयकांत ने 2005 में अपनी पार्टी डीएमडीके लॉन्च की और 2011 में विपक्ष के नेता बने। कमल हासन ने 2018 में अपनी पार्टी एमएनएम बनाई। पर उन्हें 2019 के लोकसभा चुनाव में एक भी सीट नहीं मिली, सिर्फ 3.7 प्रतिशत वोट उनके हिस्से आए। 2021 विधानसभा चुनाव में वोट शेयर कम होकर 2.6 प्रतिशत आ गिरा और खुद कोयंबटूर साउथ से चुनाव हार गए। वरिष्ठ पत्रकार टी रामकृष्णन कहते हैं कमल हासन राजनीति में असरदार साबित नहीं हुए। वो बेहतरीन कलाकार तो हैं लेकिन राजनेता नहीं बन पाए। उन्होंने अपनी पॉलिटिकल स्ट्रैटेजी पर भी कॉम्प्रोमाइज किया। चुनाव के अगले दिन स्टालिन से जा मिले। लोगों को डर है कहीं विजय भी कुछ ऐसा न करें।
बात मशहूर होने से ज्यादा राजनीति के अनुभव की है। मद्रास यूनिवर्सिटी के राजनीति विभाग के पूर्व एचओडी प्रोफेसर रामू कहते हैं एमजीआर जब राजनीति में आए तो उनके पास उसका लंबा अनुभव हो चुका था। उनके पिता द्रविड़ राजनीति के बड़े नेता थे। जयललिता ने भी चुनाव लड़ने से पहले पार्टी में छोटे-बड़े रोल में काम किया। फिर वो एमजीआर की उत्तराधिकारी भी थीं। विजय के पास कोई अनुभव नहीं है। 2 साल पहले पार्टी बनाई और सीधे सीएम बनने का ख्वाब देख रहे हैं। तमिलनाडु की राजनीति में कैमरा रोल हो चुका है। सत्ता की स्क्रिप्ट 23 तारीख को राज्य की जनता लिखेगी।
सियासत और सिनेमा का गठबंधन यहां खत्म नहीं हुआ। वक्त बदला। फिल्मों की दीवानगी बदली। पहले स्टार भगवान था, अब लोग पूछते हैं - नौकरी, मुफ्त सामान या शिक्षा-स्वास्थ्य में से क्या दोगे? वोटर ने ये समझाया कि सिनेमा तमिलनाडु में सियासत का दरवाजा जरूर हो सकता है, लेकिन सिंहासन के लिए संगठन जरूरी है। तमिलनाडु में कुल वोटर का पांचवां हिस्सा युवा हैं।

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