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SC: मतदान और चुनाव लड़ने का अधिकार मौलिक नहीं; सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया, हाईकोर्ट का फैसला किया रद्द

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Riya Dubey Updated Sat, 11 Apr 2026 02:52 PM IST
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सार

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मतदान और चुनाव लड़ने का अधिकार मौलिक अधिकार नहीं, बल्कि कानून से मिले अधिकार हैं। दोनों अलग हैं और चुनाव लड़ने के अधिकार पर अधिक सख्त शर्तें लगाई जा सकती हैं। आइए विस्तार से जानते हैं।

The right to vote and contest elections is not fundamental; the Supreme Court reiterated
सुप्रीम कोर्ट (फाइल फोटो) - फोटो : ANI
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विस्तार

सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर स्पष्ट किया है कि न तो मतदान का अधिकार और न ही चुनाव लड़ने का अधिकार मौलिक अधिकार है। शीर्ष अदालत ने कहा कि ये दोनों अधिकार अलग-अलग हैं और पूरी तरह कानून (स्टैच्यूट) से संचालित होते हैं, न कि संविधान के तहत मौलिक अधिकार के रूप में।

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न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना और न्यायमूर्ति आर महादेवन की पीठ ने यह टिप्पणी राजस्थान के जिला दुग्ध संघों के चुनाव से जुड़े एक विवाद की सुनवाई के दौरान की। यह फैसला न्यायमूर्ति महादेवन ने लिखा।

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क्या कहा सुप्रीम कोर्ट ने?

अदालत ने अपने फैसले में कहा कि मतदान का अधिकार व्यक्ति को चुनाव प्रक्रिया में भाग लेने का अवसर देता है, जबकि चुनाव लड़ने का अधिकार एक अलग और अतिरिक्त अधिकार है, जिस पर योग्यता, अयोग्यता और अन्य संस्थागत शर्तें लागू की जा सकती हैं।


कोर्ट ने ज्योति बसु बनाम देवी घोषाल (1982) और जावेद बनाम हरियाणा राज्य (2003) जैसे पुराने फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि ये अधिकार केवल कानून द्वारा दिए गए हैं और इन्हें उसी सीमा तक लागू किया जा सकता है, जितना कानून अनुमति देता है।

हाईकोर्ट की गलती क्या थी?

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राजस्थान हाईकोर्ट ने मतदान और चुनाव लड़ने के अधिकार को एक समान मानकर गलती की। अदालत के अनुसार, संबंधित उपविधियां केवल चुनाव लड़ने की पात्रता तय करती हैं और वे मतदान के अधिकार को प्रभावित नहीं करतीं।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इन उपविधियों का उद्देश्य यह तय करना है कि कौन व्यक्ति चुनाव लड़ सकता है या पद पर बना रह सकता है। इन्हें अयोग्यता से जोड़ना गलत है।

न्याय के सिद्धांत का उल्लंघन

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि हाईकोर्ट ने बिना सभी प्रभावित पक्षों को सुने व्यापक फैसला दे दिया, जो प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत सभी पक्षों को सुनने का अधिकार का उल्लंघन है।

क्या नतीजा निकला?

सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले को रद्द करते हुए अपील स्वीकार कर ली। साथ ही यह भी साफ किया कि सहकारी संस्थाएं अपने उपविधियों के जरिए चुनाव प्रक्रिया और प्रतिनिधित्व को नियंत्रित कर सकती हैं। यह फैसला चुनावी अधिकारों की कानूनी प्रकृति और उनके दायरे को स्पष्ट करने वाला महत्वपूर्ण निर्णय माना जा रहा है।

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