आर्मी के बाद अब अर्धसैनिक बलों पर मंडरा रहा 'हनी ट्रैप' का खतरा
चीन और पाकिस्तान की इंटेलीजेंस एजेंसियां क्रमश: मिनिस्ट्री ऑफ स्टेट सिक्योरिटी (एमएसएस) एवं इंटर सर्विसेज इंटेलीलेंस (आईएसआई), भारतीय सुरक्षा बलों के खिलाफ हनी ट्रैप का बड़ा जाल बिछा रही हैं। आर्मी के बाद अब अर्धसैनिक बलों पर हैनी ट्रैप का खतरा मंडरा रहा है। गोपनीय सूचनाएं लीक कराने के लिए पहले ये दोनों देश अपने एजेंट को शहरों तक सीमित रखे हुए थे, लेकिन अब उन्होंने सीमावर्ती इलाकों में बड़े पैमाने पर महिला एजेंटों की भर्ती करनी शुरू कर दी है। भारतीय जांच एजेंसियों के ताजा खुलासे में पता चला है कि इन दोनों देशों की खुफिया इकाई ने फेसबुक, ऑरकुट व इंस्टाग्राम की मदद से सेना व अर्धसैनिक बलों के अफसरों के फोन नंबर जुटा लिए हैं। जवानों के पास प्राइवेट नंबर से महिलाओं के फोन आ रहे हैं। सेना और अर्धसैनिक बलों में लागू की गई 'वेपन इन, मोबाइल आउट' पॉलिसी भी कामयाब नहीं हो पा रही है।
बता दें कि उक्त दोनों देशों ने भारतीय सैन्य बलों से जुड़ी गोपनीय जानकारी लीक कराने के लिए सोशल मीडिया का सहारा लिया है। इसके जरिए वे आसानी से भारतीय सैन्य बलों के अफसरों और जवानों को हनी ट्रैप में फंसा लेते हैं। जांच एजेंसी के उच्चपदस्थ सूत्र बताते हैं कि आर्मी सहित विभिन्न सुरक्षा बलों में 70 से ज्यादा कर्मी रडार पर हैं। इससे पहले आर्मी, एयरफोर्स और बीएसएफ कर्मचारी गिरफ्तार भी हो चुके हैं। मध्यप्रदेश के महू कैंट स्थित भारतीय सेना की इंफेंट्री बटालियन का एक क्लर्क जो हनी ट्रैप का शिकार हुआ था, उसने पुलिस के सामने कई अहम खुलासे किए हैं। इसके अलावा जैसलमेर में गिरफ्तार सेना के जवान ने भी पुलिस पूछताछ में उक्त दोनों देशों की इंटेलीजेंस एजेंसियों को लेकर सनसनीखेज जानकारी दी है।
सोशल मीडिया की मदद से मोबाइल नंबर जुटाती हैं एजेंट, उसके बाद फोन पर शुरू होता है हनी ट्रैप का खेल...
पहले आईएसआई और एमएसएस, दोनों एजेंसियां बॉर्डर के इलाकों और मुख्यालयों पर ही अपना जाल फैलाती थी। अब ये एजेंसियां लोकल लेवल पर सक्रिय हो गई हैं। इनके एजेंटों ने फेसबुक, ऑरकुट और इंस्टाग्राम पर फर्जी अकाउंट बना रखे हैं। अधिकांश अकाउंट महिलाओं के नाम से बने हैं। ये महिला एजेंट हिंदी या क्षेत्रीय भाषा में पोस्ट लिख सकती हैं। एक बार बातचीत का सिलसिला शुरू होने के बाद ये आसानी से जवान या अफसर को अपने जाल में फंसा लेती हैं। जब उन्हें यह भरोसा हो जाता है कि उनका शिकार पूरी तरह से जाल में फंस गया है तो वे निकटवर्ती शहर या कस्बे में मिलने की बात कहती हैं। बस यहीं से हनी ट्रैप का खेल शुरू हो जाता है। वे अपने तौर-तरीकों से देर-सवेर गोपनीय दस्तावेज हासिल करने में कामयाब हो जाती हैं। सैन्य बलों की मूवमेंट, लोकेशन और एक्सरसाइज से जुड़ी तमाम बातें सांझा होने लगती हैं। नक्शा और दूसरे प्लान की जानकारी लेने के लिए महिला एजेंट कई बार सैन्य कर्मियों के पास (प्राइवेट जगह) पहुंच जाती हैं। खास बात है कि महिला एजेंट कई बार प्राइवेट नंबर से फोन करती हैं। यानी मोबाइल स्क्रीन पर नंबर या नाम दिखने की बजाए प्राइवेट नंबर लिखा आता है। ऐसे नंबर पर कॉल बैक संभव नहीं होता।
सोशल मीडिया में ड्रेस वाला फोटो नहीं डालना है और 'वेपन इन मोबाइल आउट' पॉलिसी भी कारगर नहीं...
सेना के अलावा सभी अर्धसैनिक बलों को बार-बार यह हिदायत दी जा रही है कि वे ड्रेस या हथियार के साथ अपना कोई भी फोटो सोशल मीडिया पर शेयर न करें। इसके अलावा जब भी जवान अपनी ड्यूटी के लिए निकलता है तो 'वेपन इन, मोबाइल आउट' पॉलिसी लागू होती है। इसका मतलब है कि जैसे ही किसी जवान को हथियार जारी होता है तो उसी वक्त उसे अपना स्मार्ट मोबाइल फोन जमा कराना पड़ता है। ड्यूटी के दौरान जवान को बिना इंटरनेट वाला फोन साथ ले जाने की इजाजत दी गई है। जैसे ही वह अपनी ड्यूटी से लौटकर हथियार जमा कराता है, उसे इंटरनेट वाला मोबाइल फोन वापस लौटा दिया जाता है। अब दिक्कत यह आ रही है कि विदेशी एजेंटों ने किसी तरह इनका नंबर जुटा लिया है। वे इनके ड्यूटी चार्ट की जानकारी जुटाकर इन्हें कॉल कर देते हैं। यानी उस वक्त जब ये आराम की मुद्रा में होते हैं। तब कोई भी जवान इंटरनेट वाला फोन यूज कर सकता है। बस, महिला एजेंट इसी मौके का फायदा उठाकर जाल फेंक देती हैं। पिछले दिनों आर्मी चीफ जनरल बिपिन रावत भी कई बार जवानों को हनी ट्रैप से सावधान कर चुके हैं।
हनी ट्रैप से बचाने के लिए अब रोजाना लग रही है क्लास...
सैन्य और अर्धसैनिक बलों में अब रोजाना रॉल कॉल के दौरान जवानों को हनी ट्रैप के बारे में बताया जाता है। पहले यह बात जवानों से छिपाई जाती थी कि उन पर विभाग के अलावा देश की दूसरी इंटेलीजेंस एजेंसियों की नजर है, अब उन्हें साफतौर पर बता दिया गया है कि इंटेलीजेंस एजेंसी उन पर नजर रख रही है। हो सकता है कि संदिग्ध फोन कॉल भी टेप हो रहे हों। अफसर और जवान, सोशल मीडिया के जिस प्लेटफार्म पर जुड़े हैं, हो सकता है कि वह भी एजेंसियों की रडार पर हो। रॉल कॉल के अलावा सप्ताह में एक बार साइबर क्राइम के विशेषज्ञ जवानों और अफसरों की क्लास ले रहे हैं। उन्हें हनी ट्रैप के बारे में विस्तारपूर्वक जानकारी दी जाती है।