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Unmute Bharat: सत्ता के बिना पानी बिन मछली जैसी छटपटा रही कांग्रेस, गिरा रही भाषा की गरिमा: सुधांशु त्रिवेदी
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सार
अमर उजाला के पॉडकास्ट अनम्यूट भारत में भाजपा सांसद डॉ. सुधांशु त्रिवेदी ने विज्ञान-अध्यात्म, विदेश नीति और रोजगार पर बेबाकी से विचार रखे। उन्होंने यह सवाल भी उठाया कि जो तथाकथित अधिकारवादी सबरीमाला के मुद्दे पर आक्रामक होते हैं, वे तीन तलाक, हिजाब जैसे मुद्दों पर मौन क्यों साध लेते हैं?
अमर उजाला के पॉडकास्ट अनम्यूट भारत में भाजपा सांसद डॉ. सुधांशु त्रिवेदी
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
राजनीति में भाषा के गिरते स्तर के लिए भारतीय जनता पार्टी के राज्यसभा सदस्य और राष्ट्रीय प्रवक्ता डॉ. सुधांशु त्रिवेदी ने विपक्ष और विशेषकर कांग्रेस की हताशा को जिम्मेदार ठहराया है। अमर उजाला के विशेष पॉडकास्ट 'अनम्यूट भारत' में डॉ. त्रिवेदी ने कहा कि 140 साल के इतिहास में पहली बार कांग्रेस लगातार 10 साल सत्ता से बाहर रही है। सत्ता के बिना कांग्रेस ऐसे छटपटा रही है, जैसे पानी के बिना मछली। इसी विक्षिप्तता में विपक्षी नेता अमर्यादित और उद्दंड भाषा का प्रयोग कर रहे हैं।
विज्ञान और अध्यात्म में समन्वय, विदेशी मुहर की जरूरत नहीं
बहसों में मौजूदा राजनीतिक विषयों के साथ वेद, उपनिषद और विज्ञान का संदर्भ देने के सवाल पर डॉ. त्रिवेदी ने कहा कि भारतीय दर्शन में विज्ञान और अध्यात्म में कोई संघर्ष नहीं, बल्कि समन्वय है। क्वांटम भौतिकी के जनक माने जाने वाले नील्स बोर, हाइजेनबर्ग और श्रोडिंगर जैसे महान विदेशी वैज्ञानिकों ने खुले तौर पर उपनिषदों और वेदांत दर्शन से प्रेरणा लेने की बात स्वीकारी है।
उन्होंने कहा कि आज की सबसे उन्नत तकनीक 'कृत्रिम बुद्धिमत्ता' (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) बनाने वाली कंपनी के प्रमुख सैम ऑल्टमैन भी आत्मा और ब्रह्म की समानता की बात करते हैं। डॉ. त्रिवेदी ने तंज कसते हुए कहा कि 'मैकाले की मानसिकता' से ग्रस्त लोग अपनी ही समृद्ध विरासत को तब तक स्वीकार नहीं करते, जब तक कि उस पर विदेशियों का ठप्पा न लग जाए।
सबरीमाला पर मुखर और शाह बानो पर मौन क्यों?
सबरीमाला मंदिर विवाद और महिलाओं से भेदभाव के आरोपों पर भाजपा प्रवक्ता ने दो टूक जवाब दिया। उन्होंने कहा कि हिंदू धर्म दुनिया का अकेला ऐसा धर्म है, जहां शिव और शक्ति (स्त्री और पुरुष दोनों तत्वों) को समान रूप से पूजा जाता है। सबरीमाला में एक विशेष शास्त्रीय विधान है, जिसे लैंगिक असमानता से नहीं जोड़ा जा सकता। उन्होंने कहा कि जो तथाकथित अधिकारवादी सबरीमाला पर आक्रामक होते हैं, वे तीन तलाक, हिजाब, महिलाओं को अकेले यात्रा न करने देने और शाह बानो जैसे मुद्दों पर पूरी तरह मौन साध लेते हैं।
विपक्ष की विदेश नीति संबंधी आलोचना नादानी या शैतानी
विपक्ष द्वारा अमेरिका या इस्राइल के दबाव में विदेश नीति चलाने के आरोपों को डॉ. त्रिवेदी ने सिरे से खारिज कर दिया। उन्होंने इसे विपक्ष की 'नादानी या शैतानी' करार देते हुए कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत ने अभूतपूर्व कूटनीतिक संतुलन साधा है। रूस-यूक्रेन संघर्ष और मध्य-पूर्व के तनाव के बावजूद भारत ने अपने राष्ट्रीय हितों को सर्वोपरि रखा है। दुनिया भर में हाहाकार और पेट्रोल की आसमान छूती कीमतों के बीच भारत में ईंधन के दाम स्थिर रहे, जो सरकार की बड़ी उपलब्धि है।
सरकारी नौकरी की औपनिवेशिक मानसिकता से बाहर आएं युवा
रोजगार के ज्वलंत मुद्दे पर बात करते हुए डॉ. त्रिवेदी ने युवाओं से 'सरकारी नौकरी' की अंग्रेजों के समय की मानसिकता से बाहर निकलने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि आज के डिजिटल युग में स्टार्टअप, मुद्रा योजना और विश्वकर्मा योजना जैसी पहलों से स्वरोजगार के असीमित अवसर पैदा हुए हैं। दुनिया तेजी से बदल रही है और आने वाले दशक में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) और नई तकनीकों के चलते काम करने के तरीके पूरी तरह बदल जाएंगे। ऐसे में युवाओं को सीमित सफलता वाली सरकारी नौकरियों पर अपना जीवन खपाने के बजाय उद्यमशीलता अपनाकर नौकरी देने वाला बनना चाहिए।
भाजपा अपने वैचारिक अधिष्ठान पर अडिग
भाजपा के पूरी तरह मोदीमय होने के सवाल पर उन्होंने स्पष्ट किया कि प्रधानमंत्री ने भारत को भाजपामय किया है। जनसंघ की स्थापना से लेकर आज तक भाजपा देश की एकमात्र ऐसी पार्टी है, जो अपने वैचारिक मुद्दों जैसे अनुच्छेद 370, राम मंदिर, समान नागरिक संहिता से कभी नहीं भटकी। उन्होंने कहा कि 70 साल पहले देखे गए वैचारिक संकल्प प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में ही निर्णायक मुकाम तक पहुंचे हैं।
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उन्होंने कहा कि आज की सबसे उन्नत तकनीक 'कृत्रिम बुद्धिमत्ता' (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) बनाने वाली कंपनी के प्रमुख सैम ऑल्टमैन भी आत्मा और ब्रह्म की समानता की बात करते हैं। डॉ. त्रिवेदी ने तंज कसते हुए कहा कि 'मैकाले की मानसिकता' से ग्रस्त लोग अपनी ही समृद्ध विरासत को तब तक स्वीकार नहीं करते, जब तक कि उस पर विदेशियों का ठप्पा न लग जाए।
सबरीमाला पर मुखर और शाह बानो पर मौन क्यों?
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सरकारी नौकरी की औपनिवेशिक मानसिकता से बाहर आएं युवा
रोजगार के ज्वलंत मुद्दे पर बात करते हुए डॉ. त्रिवेदी ने युवाओं से 'सरकारी नौकरी' की अंग्रेजों के समय की मानसिकता से बाहर निकलने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि आज के डिजिटल युग में स्टार्टअप, मुद्रा योजना और विश्वकर्मा योजना जैसी पहलों से स्वरोजगार के असीमित अवसर पैदा हुए हैं। दुनिया तेजी से बदल रही है और आने वाले दशक में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) और नई तकनीकों के चलते काम करने के तरीके पूरी तरह बदल जाएंगे। ऐसे में युवाओं को सीमित सफलता वाली सरकारी नौकरियों पर अपना जीवन खपाने के बजाय उद्यमशीलता अपनाकर नौकरी देने वाला बनना चाहिए।
भाजपा अपने वैचारिक अधिष्ठान पर अडिग
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