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Ground Report: आरजी कर कांड की तपिश से झुलसती सत्ता की जमीन, पानीहाटी में दांव पर है न्याय और प्रतिष्ठा

Rajkishor राजकिशोर
Updated Tue, 21 Apr 2026 05:23 AM IST
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सार

बंगाल चुनाव में पानीहाटी सीट पर सभी की निगाहें हैं। आरजी कर मामले की पीड़िता अभया यहीं रहती थीं। भाजपा ने अभया की मां को टिकट देकर इमोशनल कार्ड खेला है, वहीं ये सीट तृणमूल का अभेद्य किला रही है। पानीहाटी में न्याय और प्रतिष्ठा दांव पर है। 

west bengal assembly election 2026 ground report rg kar abhya case panihati seat
आरजी कर कांड की तपिश से झुलस रही बंगाल में सत्ता की जमीन - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार

दिल्ली की निर्भया हो या कोलकाता की अभया। दो अलग शहर। दो अलग घटनाएं...लेकिन दर्द और गुस्से की लहर एक जैसी। 16 दिसंबर, 2012 की दिल्ली की वह काली रात आज भी देश की चेतना में दर्ज है। ठीक वैसे ही 9 अगस्त, 2024 की रात कोलकाता के आरजी कर अस्पताल में एक युवा महिला डॉक्टर के साथ हुई दरिंदगी ने पूरे बंगाल को झकझोर दिया था।
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इन दोनों घटनाओं ने समाज के साथ ही राजनीति को गहराई से प्रभावित किया। निर्भया कांड के बाद सत्ता बदली थी। अब लगभग दो साल बाद बंगाल में भी चुनावी रण उसी दर्द की पृष्ठभूमि पर सज रहा है। पानीहाटी...जहां अभया रहती थीं, वह आज सिर्फ एक विधानसभा सीट नहीं, बल्कि न्याय, आक्रोश और उम्मीद का प्रतीक बन चुकी है। भाजपा ने यहां से अभया की मां रत्ना देवनाथ को चुनावी मैदान में उतारकर इस लड़ाई को सियासी से ज्यादा भावनात्मक बना दिया है।
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भावनाओं की लहर पर सियासत का दांव
आरजी कर कांड के बाद जिस तरह कोलकाता की सड़कों पर स्वतःस्फूर्त भीड़ उमड़ी थी, उससे स्प्ष्ट था कि यह सिर्फ एक घटना नहीं, बल्कि वर्षों से जमा गुस्से का विस्फोट था। वरिष्ठ पत्रकार शंखदीप दास कहते हैं कि भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, आर्थिक ठहराव, रंगदारी से ऊबे बंगाली समाज के बीच इस घटना ने एक ट्रिगर का काम किया। इसी भावनात्मक लहर को साधने के लिए भाजपा ने रत्ना देवनाथ बड़ा को उतारकर बड़ा दांव चला है। सिलाई कर जीवनयापन करने वाली एक साधारण मां, जिसकी बेटी डॉक्टर बनी और फिर इस त्रासदी का शिकार हुई। संघर्षों की ऊबड़-खाबड़ जमीन पर आगे बढ़ती यह कहानी सीधे लोगों के दिलों को छूती है। वैसे यह सीट तृणमूल कांग्रेस का मजबूत गढ़ रही है। पिछली बार करीब 50 फीसदी वोट लेकर निर्मल घोष ने भाजपा के सन्मय बनर्जी को 25 हजार से अधिक मतों से हराया था। इस बार उनके बेटे तीर्थंकर घोष मैदान में हैं। हालांकि, मुकाबला अब सिर्फ राजनीतिक नहीं रहा। यह भावनाओं बनाम संगठन का संघर्ष बन गया है।

ग्राउंड पर गूंज- अभया दीदी को इंसाफ चाहिए
अमर उजाला ने जब इलाके में युवाओं से बात की, तो एक ही बात बार-बार सामने आई कि यह चुनाव सिर्फ सरकार चुनने का नहीं, बल्कि न्याय और भविष्य का है। एमबीए छात्र अभिजीत चक्रवर्ती कहते हैं कि अभया दीदी के साथ जो हुआ, उसे भुलाया नहीं जा सकता। उनकी मां के लिए एक अपनापन महसूस होता है। इंसाफ मिलना चाहिए। दीप मंडल साफ कहते हैं कि 15 साल से एक ही सरकार है, अब बदलाव जरूरी है।
  • बीटेक के अंतिम वर्ष के छात्र विशाल घोष बेरोजगारी और पलायन की ओर इशारा करते हैं। वह कहते हैं कि लोग बंगाल छोड़ रहे हैं, कंपनियां जा रही हैं। बदलाव चाहिए।
  • राहुल देवनाथ यही लाइन आगे बढ़ाते हुए कहते हैं कि हजारों कंपनियां बाहर चली गईं। नौकरी नहीं है, विकास नहीं है।
  • कुशल दास, जो नौकरी करते हैं, कहते हैं कि यहां अवसर बहुत कम हैं। युवाओं के लिए जगह नहीं बची।
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बड़े चेहरे, बड़ी लड़ाई
इस सीट की अहमियत का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि 24 अप्रैल को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद यहां रैली करने आ रहे हैं। दूसरी ओर, तृणमूल के दूसरे नंबर के सबसे बड़े नेता अभिषेक बनर्जी ने रोड शो कर ताकत का प्रदर्शन किया है। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री व तृणमूल सुप्रीमो ममता बनर्जी भी महिला सुरक्षा के मुद्दे पर सक्रिय नजर आ रही हैं और इलाके में उनकी रैली प्रस्तावित है। साफ है कि पानीहाटी अब प्रतीकात्मक लड़ाई बन चुकी है, और इसका असर सिर्फ इस सीट पर नहीं, बल्कि पूरे प्रदेश में है।

जहां याद अभी जिंदा है
अभया का घर यहीं है। वही गलियां, वही लोग, जिन्होंने उस रात के बाद सड़कों पर गुस्सा और आंसू दोनों देखे थे। आज, चुनावी शोर के बीच भी वह याद धुंधली नहीं हुई है। पानीहाटी की लड़ाई अब एक विधानसभा सीट से कहीं आगे निकल चुकी है। यह उस सवाल का जवाब खोज रही है कि क्या एक त्रासदी से उपजा आक्रोश सत्ता बदल सकता है? और शायद, इस बार मतदाता सिर्फ नेता नहीं, न्याय का रास्ता चुनने निकले हैं।

इमोशनल फैक्टर बनाम विकास का सवाल
बंगलूरू पढ़ाई के लिए जा रहे प्रीतम सरकार कहते हैं कि हम खुद अभया दीदी के लिए रैली में निकले थे। उनकी मां को देख कर लगता है कि हमें उनके साथ खड़ा होना चाहिए, लेकिन सच यह भी है कि यहां से बाहर जाना पड़ रहा है। वहीं, प्रेमजीत जो बॉडीबिल्डर हैं और आर्किटेक्ट हैं, राजनीति से थोड़ा अलग नजरिया रखते हैं, कहते हैं सिर्फ पार्टी नहीं, सिस्टम बदलना चाहिए। युवा नेतृत्व को मौका मिलना चाहिए। विकास रुक गया है। कुछ युवा, जैसे अभ्रजीत, राजनीति से दूरी रखते हुए भी कहते हैं कि हमें राजनीति से मतलब नहीं, लेकिन अभया की मां के साथ हैं।

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