West Bengal Election: उत्तर, दक्षिण-मध्य और राढ़ में बंटी बंगाल की सियासत, इस बार कितना बदलेगा इनका मिजाज?
पश्चिम बंगाल चुनाव पर देश की नजरें टिकी हैं। राज्य की 294 सीटों को तीन हिस्सों उत्तर, दक्षिण-मध्य और राढ़ बंगाल में बांटकर राजनीतिक तस्वीर समझी जाती है। 2021 में तृणमूल कांग्रेस ने 216 सीटों के साथ बहुमत हासिल किया, जबकि भाजपा 77 सीटों के साथ मुख्य विपक्ष बनी।
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विस्तार
इस वर्ष में भले ही पांच राज्यों में चुनाव हो रहे हों, लेकिन देश भर की नजरें पश्चिम बंगाल पर टिकी हैं। वजह साफ है, यह चुनाव कई मायनों में अलग और अहम माना जा रहा है। एक तरफ ममता बनर्जी चौथी बार सत्ता में वापसी की कोशिश में हैं, तो दूसरी ओर भारतीय जनता पार्टी बंगाल में पहली बार पूर्ण बहुमत हासिल करने के लिए पूरी ताकत झोंक रही है। जैसे-जैसे मतदान की तारीखें करीब आ रही हैं, वैसे-वैसे सियासी तापमान भी तेजी से चढ़ता जा रहा है। पहले चरण का मतदान कल यानी 23 को है। पश्चिम बंगाल में विधानसभा की कुल 294 सीटें हैं, लेकिन इन सीटों को अगर भौगोलिक नजरिए से समझा जाए तो पूरी राजनीतिक तस्वीर कहीं ज्यादा साफ हो जाती है। दरअसल, चुनावी विश्लेषण में बंगाल को तीन हिस्सों-उत्तर बंगाल, दक्षिण मध्य बंगाल और राढ़ बंगाल-में बांटकर देखा जाता है।
अमर उजाला आपको इसी आसान ढांचे में समझा रहा है कि 2021 में इन तीनों हिस्सों में किसका कितना दबदबा रहा। साथ ही 2016 की भी एक झलक, जब भाजपा महज 3 सीटों पर सिमटी थी और 2021 में 77 सीटों तक पहुंच गई। इसके अलावा यह भी समझेंगे कि कैसे दशकों तक प्रभाव में रही वाम राजनीति धीरे-धीरे बंगाल से लगभग गायब हो गई। साथ ही समझेंगे 2026 में कहां है असली खेला। कौन सा हिस्सा इस बार भी बना हुआ है गेम चेंजकर और किस हिस्से में छुपी है सत्ता की चाबी।
तीन हिस्सों में बंटा बंगाल: 2021 में क्या रहा
कुल: 23 जिले, 294 सीटें
2021: किस क्षेत्र में किसका दबदबा
उत्तर बंगालः 8 जिले, 54 सीटें (कूचबिहार, अलीपुरद्वार, जलपाईगुड़ी, दार्जिलिंग, कालीम्पोंग, उत्तर दिनाजपुर, दक्षिण दिनाजपुर, मालदा) 54 सीटों वाले इस क्षेत्र में एनडीए को ने 2021 में 30 सीटें जीतकर बढ़त बनाई, जबकि तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) को 24 सीटें मिलीं। कूचबिहार, अलीपुरद्वार और दार्जिलिंग में भाजपा गठबंधन मजबूत रहा, जबकि मालदा और उत्तर दिनाजपुर में तृणमूल ने कुछ संतुलन बनाए रखा।
दक्षिण और मध्य बंगालः 10 जिले, 183 सीटें (मुर्शिदाबाद, नदिया, उत्तर 24 परगना, दक्षिण 24 परगना, कोलकाता, हावड़ा, हुगली, पूर्व मेदिनीपुर, पश्चिम मेदिनीपुर, झाड़ग्राम) दक्षिण बंगाल: तृणमूल का किला 183 सीटों वाले सबसे बड़े क्षेत्र में टीएमसी ने 2021 में 153 सीटें जीतकर दबदबा कायम रखा। एनडीए को 29 सीटें मिलीं, जबकि अन्य को 1 सीट पर जीत मिली। कोलकाता, हावड़ा और दक्षिण 24 परगना जैसे इलाकों में तृणमूल का लगभग क्लीन स्वीप रहा, यही क्षेत्र सत्ता की कुंजी साबित हुआ।
राढ़ बंगालः 5 जिले, 57 सीटें पुरुलिया, बांकुड़ा, पूर्व बर्धमान, पश्चिम बर्धमान, बीरभूम 2021 में राढ़ बंगाल की 57 सीटों पर मुकाबला कड़ा रहा। यहां तृणमूल कांग्रेस ने 39 सीटों के साथ बढ़त बनाए रखी, जबकि एनडीए ने 18 सीटें जीतकर अपनी उपस्थिति मजबूत की। पुरुलिया और बांकुड़ा जैसे जिलों में भाजपा आगे रही, जबकि बीरभूम और बर्धमान में तृणमूल का प्रभाव कायम रहा। अगर पूरे राज्य की तस्वीर देखें तो 2021 में तृणमूल कांग्रेस ने 216 सीटों के साथ स्पष्ट बहुमत हासिल किया, जबकि एनडीए 77 सीटों के साथ मुख्य विपक्ष बना। इस चुनाव में कांग्रेस और वाम दलों का सफाया हो गया।
2026 में कहां है असली लड़ाई
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सत्ता के लिए तीनों क्षेत्रों में दबदबा कायम रखना होगा। हालांकि विश्लेषक मानते हैं कि दक्षिण बंगाल अभी भी गेमचेंजर बना हुआ है। 183 सीटों वाले इस इलाके में अगर टीएमसी अपनी पकड़ बनाए रखती है, तो सत्ता की राह आसान हो जाती है। अगर भाजपा यहां सेंध लगाने में सफल होती है, तो पूरा समीकरण बदल सकता है। दूसरी ओर, उत्तर बंगाल को भाजपा का मजबूत आधार माना जा रहा है। 2021 में मिली बढ़त के बाद पार्टी की कोशिश इस इलाके में अपनी बढ़त बरकरार रखने और उसे और मजबूत करने की है। अगर यहां बढ़त कायम रहती है, तो भाजपा को बड़ी बढ़त मिल सकती है। राड़ बंगाल को इस बार का सबसे अहम “स्विंग जोन” माना जा रहा है। विश्लेषकों के मुताबिक, यही वह क्षेत्र है जहां थोड़ा सा झुकाव भी 15 से 20 सीटों का फर्क पैदा कर सकता है। 2021 में यहां भाजपा ने मजबूत सेंध लगाई थी, लेकिन बढ़त तृणमूल के पास रही। 2026 में यही क्षेत्र असली मुकाबले का केंद्र बन सकता है।
विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि इस चुनाव में कई फैक्टर निर्णायक होंगे स्थानीय उम्मीदवार और संगठन की पकड़, महिला और ग्रामीण वोटर का रुझान, केंद्रीय बनाम क्षेत्रीय मुद्दों की लड़ाई, वाम-कांग्रेस की संभावित भूमिका (वोट काटने या जोड़ने में) संक्षेप में कहें तो: दक्षिण बंगाल में सत्ता की चाबी, उत्तर बंगाल भाजपा का आधार और राढ़ बंगाल जीत-हार तय करने वाला मैदान है। यानी 2026 का चुनाव सिर्फ सीटों का नहीं, बल्कि तीनों क्षेत्रों में संतुलन साधने की रणनीति का चुनाव होगा। जो दल इन तीनों हिस्सों में बेहतर तालमेल बैठा लेगा, वही बंगाल की सत्ता पर काबिज होगा।
2016: जब तस्वीर बिल्कुल अलग थी अगर 2016 के चुनाव पर नजर डालें तो तस्वीर पूरी तरह अलग थी। उस समय तृणमूल कांग्रेस ने 211 सीटें जीतकर मजबूत बहुमत हासिल किया था। कांग्रेस को 44 सीटें और वाम दलों को 33 सीटें मिली थीं, जबकि भाजपा सिर्फ 3 सीटों तक सीमित रही थी। यानी 2016 में जहां मुकाबला तृणमूल बनाम कांग्रेस-वाम के बीच था, वहीं 2021 तक आते-आते भाजपा ने जबरदस्त उछाल लेते हुए खुद को मुख्य विपक्ष के रूप में स्थापित कर लिया और राज्य की राजनीति पूरी तरह दोध्रुवीय हो गई।
बंगाल विधानसभा की कहानी
पश्चिम बंगाल विधान सभा राज्य की एकसदनीय विधायिका है, जो कोलकाता के बीबीडी बाग में स्थित है। इसके 294 सदस्य सीधे जनता द्वारा एकल निर्वाचन क्षेत्रों से चुने जाते हैं और कार्यकाल पांच वर्ष का होता है। इसकी शुरुआत 18 जनवरी 1862 को इंडियन काउंसिल एक्ट 1861 के तहत 12 सदस्यीय परिषद से हुई, जिसे बाद में इंडियन काउंसिल एक्ट1892 (20 सदस्य) और इंडियन काउंसिल एक्ट 1909 (50 सदस्य) से विस्तारित किया गया। गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट 1919 के तहत सदस्य संख्या 125 हुई और 1921 में इसका औपचारिक गठन हुआ। गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट 1935 के बाद बंगाल में द्विसदनीय व्यवस्था (विधान परिषद और विधानसभा) लागू हुई, जिसमें विधानसभा के 250 सदस्य थे। 1947 में विभाजन के बाद पश्चिम बंगाल विधानसभा 90 सदस्यों के साथ बनी और पहली बैठक 21 नवंबर 1947 को हुई। भारतीय संविधान लागू होने के बाद 1952 में फिर द्विसदनीय व्यवस्था आई, जिसमें 51 सदस्यीय परिषद और 240 सदस्यीय विधानसभा थी। लेकिन 1969 में विधानसभा के प्रस्ताव और संसद के कानून के जरिए 1 अगस्त 1969 से विधान परिषद समाप्त कर दी गई। इसके बाद से पश्चिम बंगाल में एकसदनीय विधानसभा प्रणाली लागू है।

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