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Hindi News ›   Jammu and Kashmir ›   Kathua News ›   7,656 Rohingyas and 504 Bangladeshi infiltrators in Jammu and Kashmir.

Jammu Kashmir: जम्मू में रोहिंग्याओं का आंकड़ा सबसे ज्यादा, घाटी में बांग्लादेशियों की संख्या ने चौंकाया

Tue, 18 Aug 2026 04:27 PM IST
Nikita Gupta अभिषेक राज अमर उजाला, नेटवर्क जम्मू
अभिषेक राज अमर उजाला, नेटवर्क जम्मू Published by: Nikita Gupta Updated Tue, 18 Aug 2026 04:27 PM IST
सार

जम्मू-कश्मीर सरकार ने नावलेकर समिति के सामने बताया कि प्रदेश के 17 जिलों में 7,656 रोहिंग्या और 504 बांग्लादेशी नागरिकों की पहचान की गई है, जिनमें जम्मू संभाग में रोहिंग्याओं की संख्या सबसे अधिक है।

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7,656 Rohingyas and 504 Bangladeshi infiltrators in Jammu and Kashmir.
जनसांख्यिकीय बदलाव पर नावलेकर समिति की पड़ताल - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

आपके अपने अमर उजाला ने ऑपरेशन पहचान के तहत जम्मू-कश्मीर में रोहिंग्या और बांग्लादेशी घुसपैठियों की मौजूदगी को लेकर जो सवाल उठाए थे, उन्हें जनसांख्यिकीय बदलाव की जांच कर रही नावलेकर समिति के समक्ष प्रदेश सरकार की ओर से प्रस्तुत आंकड़ों ने काफी हद तक पुष्ट किया है। सरकार की रिपोर्ट के अनुसार जम्मू-कश्मीर के 17 जिलों में कुल 7,656 रोहिंग्या और 504 बांग्लादेशी घुसपैठियों की पहचान की गई है। इनमें जम्मू संभाग के 10 जिलों में 6,737 रोहिंग्या और 46 बांग्लादेशी, जबकि कश्मीर के सात जिलों में 919 रोहिंग्या और 458 बांग्लादेशी शामिल हैं। सूत्रों के अनुसार यह जानकारी समिति को 10 अगस्त को जम्मू दौरे के समय दी गई।

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सरकारी आंकड़ों के मुताबिक जम्मू संभाग में रोहिंग्या की मौजूदगी डोडा, जम्मू, कठुआ, किश्तवाड़, पुंछ, राजोरी, रियासी, सांबा, उधमपुर और रामबन जिलों में है। वहीं कश्मीर संभाग में श्रीनगर, बडगाम, गांदरबल, अनंतनाग, पुलवामा, शोपियां, कुलगाम जिलों में भी उनकी पहचान की गई है।

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पीर पंजाल में घुसपैठियों की मौजूदगी ने बढ़ाई चिंता
सुरक्षा एजेंसियों के अनुसार पिछले दो वर्षों में रोहिंग्या बस्तियों की संख्या में मामूली बढ़ोतरी हुई है, लेकिन सीमा और संवेदनशील पहाड़ी इलाकों के आसपास उनकी मौजूदगी सुरक्षा के लिहाज से चिंता का विषय बनी हुई है। राजोरी, पुंछ और पीर पंजाल का इलाका सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है। राजोरी और पुंछ सीधे एलओसी से लगे हैं और घने जंगलों, ऊंचे पहाड़ों तथा दुर्गम दर्रों वाला यह क्षेत्र लंबे समय से घुसपैठ और आतंकियों की आवाजाही के लिहाज से संवेदनशील रहा है। हाल के वर्षों में भी सुरक्षा बलों ने यहां आतंकियों की तलाश में कई अभियान चलाए हैं।

पीर पंजाल की संवेदनशीलता सिर्फ एलओसी तक सीमित नहीं है। राजोरी-पुंछ के जंगलों से आगे डोडा और किश्तवाड़ का पहाड़ी क्षेत्र चिनाब घाटी से जुड़ता है और यहां से कश्मीर घाटी की ओर जाने वाले दुर्गम संपर्क मार्ग मौजूद हैं। सुरक्षा एजेंसियों के अनुसार पीर पंजाल और चिनाब घाटी के जंगलों को आतंकियों की आवाजाही और छिपने के लिहाज से संवेदनशील माना जाता है। ऐसे में वहां घुसपैठियों की मौजूदगी बड़े सवाल खड़े करती है।

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जम्मू से घाटी तक फैला नेटवर्क जांच के दायरे में
अधिकारियों के अनुसार सिर्फ जम्मू जिले में रोहिंग्या से जुड़े 101 मामले दर्ज हैं। इनमें 179 पुरुष और 21 महिलाएं शामिल हैं। कश्मीर घाटी में भी 16 मामले दर्ज होने की जानकारी दी गई है, जिनमें 41 महिलाएं और चार पुरुष शामिल हैं। सुरक्षा एजेंसियों ने कुछ मामलों में रोहिंग्या के संगठित अपराध, नशा तस्करी और मानव तस्करी में शामिल होने की भी आशंका जताई है।

2012 और 2017 में बड़ी संख्या में जम्मू पहुंचे
अधिकारियों के अनुसार म्यांमार से भारत आने वाले कई रोहिंग्या पहले हैदराबाद पहुंचे और बाद में जम्मू आकर बस गए। इनमें बड़ी संख्या में ये 2012 और 2017 के दौरान जम्मू पहुंचे हैं। इस दाैरान प्रदेश में एनसी और बाद में पीडीपी व भाजपा गठबंधन की सरकार रही है।

नावलेकर समिति के सामने पहली बार बड़ा आंकड़ा
केंद्र सरकार ने 26 मई 2026 को न्यायमूर्ति प्रकाश प्रभाकर नावलेकर की अध्यक्षता में उच्चस्तरीय समिति गठित की है। समिति का उद्देश्य असामान्य जनसांख्यिकीय बदलाव से जुड़े पहलुओं का अध्ययन कर केंद्र सरकार को उपाय सुझाना है। समिति को एक वर्ष के भीतर अपनी रिपोर्ट सौंपनी है। जम्मू-कश्मीर सरकार की ओर से समिति को दिए गए 7,656 रोहिंग्या और 504 बांग्लादेशी नागरिकों के आंकड़े इसलिए महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि पहली बार इस स्तर पर पूरे प्रदेश में उनकी मौजूदगी का जिलावार खाका सामने आया है।

आने वाली चुनौती सिर्फ संख्या नहीं
सुरक्षा एजेंसियों के लिए अब चुनौती केवल इनकी संख्या निर्धारित करना नहीं, बल्कि पहचान, नागरिकता, दस्तावेज की प्रामाणिकता, पिछले ठिकानों, स्थानीय संपर्कों और संवेदनशील इलाकों में आवाजाही का सत्यापन करना है। खासकर पीर पंजाल और चिनाब घाटी जैसे इलाकों में यह प्रयास अधिक महत्वपूर्ण होगा। 

हकीकत इससे कहीं जुदा : एसपी वैद
जम्मू-कश्मीर के पूर्व डीजीपी एसपी वैद कहते हैं कि समिति के समक्ष सरकार की ओर से रोहिंग्या व बांग्लादेशी घुसपैठियों का जो विवरण प्रस्तुत किया गया है उससे न सुरक्षा एजेंसियां और न ही हम इत्तेफाक रखते हैं। अकेले नियंत्रण रेखा b (एलओसी) व अंतरराष्ट्रीय सीमा (आईबी) के आसपास ही करीब 20 हजार बांग्लादेशी धीरे-धीरे आबाद हो गए हैं। उनके पास जम्मू-कश्मीर का निवास प्रमाणपत्र है, आधार कार्ड है, राशन कार्ड भी बन गया है। ये सभी मतदान में हिस्सा लेते हैं। बांग्लादेशी घुसपैठिये यहां 1990 से पहुंचना शुरू हुए। 2012 में तीन बांग्लादेशी घुसपैठियों को वापस भेजा गया। इसके बाद जांच और सत्यापन की शुरुआत हुई। इस गंभीर मामले में गहन जांच की जरूरत है।

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