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भागवत प्रेम में ही है वास्तविक सुख : संत सुभाष
संवाद न्यूज एजेंसी, कठुआ
Updated Sun, 22 Mar 2026 02:15 AM IST
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संत सुभाष शास्त्री प्रवचण करते हुए जागरूक पाठक
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भल्लड़ पंदराड़ गांव में माता श्री बाला सुंदरी मंदिर में श्रीमद् देवी भागवत कथा जारी
संवाद न्यूज एजेंसी
कठुआ। नवरात्र पर भल्लड़ पंदराड़ गांव में माता श्री बाला सुंदरी मंदिर में श्रीमद् देवी भागवत कथा जारी है। प्रतिदिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु कथा श्रवण के लिए मंदिर पहुंच रहे हैं। कथा के तीसरे दिन संत सुभाष शास्त्री ने माता रानी की महिमा का वर्णन किया। उन्होंने कहा कि वास्तविक सुख भागवत प्रेम में है।
जीवन के हर पक्ष के दो पहलू होते हैं अच्छा और बुरा, मीठा और कड़वा, ठंडा और गरम, उजाला और अंधेरा। यह हमारे ऊपर निर्भर करता है कि हम किस पहलू को चुनते हैं। सुखी जीवन के लिए हमें सदैव अच्छे पहलुओं से ही संबंध रखना चाहिए। उन्होंने कहा कि अच्छे पहलू का आरंभ मन से विषयों की इच्छाओं को निकालने से होता है। भोगों की ओर आकर्षण ही दुख का कारण है। जब मनुष्य संसार के मोह को त्यागकर प्रभु को अपना बना लेता है तब उसका मन परमसुख को प्राप्त करता है।
शास्त्री जी ने समझाया कि बाल्यावस्था, युवावस्था और वृद्धावस्था में जो वस्तुएं हमारे पास होती हैं। वे समय के साथ छूट जाती हैं। इनसे अत्यधिक आसक्ति केवल दुख का कारण बनती है। इसका उपाय है भगवान से प्रेम करना। जब प्रभु मन के सिंहासन पर विराजमान हो जाते हैं तो दुख पास आने का साहस नहीं कर पाता।
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संवाद न्यूज एजेंसी
कठुआ। नवरात्र पर भल्लड़ पंदराड़ गांव में माता श्री बाला सुंदरी मंदिर में श्रीमद् देवी भागवत कथा जारी है। प्रतिदिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु कथा श्रवण के लिए मंदिर पहुंच रहे हैं। कथा के तीसरे दिन संत सुभाष शास्त्री ने माता रानी की महिमा का वर्णन किया। उन्होंने कहा कि वास्तविक सुख भागवत प्रेम में है।
जीवन के हर पक्ष के दो पहलू होते हैं अच्छा और बुरा, मीठा और कड़वा, ठंडा और गरम, उजाला और अंधेरा। यह हमारे ऊपर निर्भर करता है कि हम किस पहलू को चुनते हैं। सुखी जीवन के लिए हमें सदैव अच्छे पहलुओं से ही संबंध रखना चाहिए। उन्होंने कहा कि अच्छे पहलू का आरंभ मन से विषयों की इच्छाओं को निकालने से होता है। भोगों की ओर आकर्षण ही दुख का कारण है। जब मनुष्य संसार के मोह को त्यागकर प्रभु को अपना बना लेता है तब उसका मन परमसुख को प्राप्त करता है।
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शास्त्री जी ने समझाया कि बाल्यावस्था, युवावस्था और वृद्धावस्था में जो वस्तुएं हमारे पास होती हैं। वे समय के साथ छूट जाती हैं। इनसे अत्यधिक आसक्ति केवल दुख का कारण बनती है। इसका उपाय है भगवान से प्रेम करना। जब प्रभु मन के सिंहासन पर विराजमान हो जाते हैं तो दुख पास आने का साहस नहीं कर पाता।