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Kathua News: दहेज उत्पीड़न और आत्महत्या मामले में पति सहित दो बरी
संवाद न्यूज एजेंसी, कठुआ
Updated Wed, 01 Apr 2026 02:10 AM IST
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अदालत से
वर्ष 2008 में बिलावर के डडवाड़ा इलाके का मामला
संवाद न्यूज एजेंसी
कठुआ। जिला अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश ने महिला के साथ दहेज उत्पीड़न और आत्महत्या के लिए उकसाने के मामले में पति सहित दो आरोपियों को बरी किया है। यह मामला 17 साल पहले बिलावर के डडवाड़ा इलाके का है।
जिला अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश प्रवीन पंडोह की अदालत में दायर चालान के अनुसार मामला 19 दिसंबर 2008 का है। इसमें महिला शाजिया पत्नी मोहम्मद अशरफ को गंभीर हालत में अस्पताल लाया गया था जहां उपचार के दौरान उसकी मौत हो गई। पुलिस ने शव को कब्जे में लेकर जांच शुरू कर दी।
24 दिसंबर 2008 को महिला के पिता मुश्ताक अहमद पुलिस थाना बिलावर पहुंचे और पुलिस को बयान देकर आरोप लगाया कि बेटी के ससुराल वाले दहेज से असंतुष्ट थे। इसके चलते उसके साथ बार-बार मारपीट कर घर से निकाल देते थे। घटना के एक सप्ताह पहले बेटी मायके आई और बताया कि उसके ससुराल पक्ष ने तीन लाख रुपये की मांग की है। इसी प्रताड़ना से तंग आकर बेटी ने आत्महत्या कर ली।
इसके बाद पुलिस ने मृतक के पति मोहम्मद अशरफ, पिता मुश्ताक अहमद और मां रेशमा बीबी के खिलाफ आरपीसी की धारा 306 (आत्महत्या के लिए उकसाना) और 498-ए (महिला के साथ प्रताड़ना करने) की एफआईआर दर्ज कर 26 मार्च 2019 को चालान को कोर्ट में प्रस्तुत किया।
28 अक्टूबर 2009 को आरोपियों के खिलाफ आरोप तय किए गए जिसमें उन्होंने खुद को निर्दोष बताया। इसके बाद कोर्ट ने गवाहों को प्रस्तुत करने के निर्देश दिए थे। सुनवाई के दौरान आरोपी (मुश्ताक अहमद) की मौत हो गई जिसके बाद उसके खिलाफ कार्यवाही समाप्त कर दी गई। अभियोजन पक्ष ने कोर्ट में पांच की गवाही करवाई जिसमें दो स्वतंत्र गवाह भी शामिल थे। स्वतंत्र गवाहों ने कोर्ट में अभियोजन पक्ष की कहानी का समर्थन नहीं किया। उन्होंने कहा कि पति-पत्नी के संबंध सामान्य थे।
महिला के पिता और भाई ने प्रताड़ना के आरोप लगाए लेकिन ये बातें मृतक या अन्य लोगों से सुनी हुई बातों पर आधारित थीं। कोर्ट ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद और मामले में रिकॉर्ड में उपलब्ध दस्तावेजों का अवलोकन करने के बाद पाया कि किसी भी गवाह ने प्रत्यक्ष रूप से दहेज मांग या मारपीट होते नहीं देखा। कोर्ट में डॉक्टर को पेश नहीं किया गया, जिससे मौत का कारण स्पष्ट नहीं हो सका। कोर्ट ने कहा कि महिला को आत्महत्या के लिए उकसाने के लिए आवश्यक ठोस सबूत नहीं मिले। इसके बाद कोर्ट ने आरोपियों को संदेह का लाभ देते हुए उन्हें बरी करने का फैसला सुनाया।
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वर्ष 2008 में बिलावर के डडवाड़ा इलाके का मामला
संवाद न्यूज एजेंसी
कठुआ। जिला अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश ने महिला के साथ दहेज उत्पीड़न और आत्महत्या के लिए उकसाने के मामले में पति सहित दो आरोपियों को बरी किया है। यह मामला 17 साल पहले बिलावर के डडवाड़ा इलाके का है।
जिला अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश प्रवीन पंडोह की अदालत में दायर चालान के अनुसार मामला 19 दिसंबर 2008 का है। इसमें महिला शाजिया पत्नी मोहम्मद अशरफ को गंभीर हालत में अस्पताल लाया गया था जहां उपचार के दौरान उसकी मौत हो गई। पुलिस ने शव को कब्जे में लेकर जांच शुरू कर दी।
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24 दिसंबर 2008 को महिला के पिता मुश्ताक अहमद पुलिस थाना बिलावर पहुंचे और पुलिस को बयान देकर आरोप लगाया कि बेटी के ससुराल वाले दहेज से असंतुष्ट थे। इसके चलते उसके साथ बार-बार मारपीट कर घर से निकाल देते थे। घटना के एक सप्ताह पहले बेटी मायके आई और बताया कि उसके ससुराल पक्ष ने तीन लाख रुपये की मांग की है। इसी प्रताड़ना से तंग आकर बेटी ने आत्महत्या कर ली।
इसके बाद पुलिस ने मृतक के पति मोहम्मद अशरफ, पिता मुश्ताक अहमद और मां रेशमा बीबी के खिलाफ आरपीसी की धारा 306 (आत्महत्या के लिए उकसाना) और 498-ए (महिला के साथ प्रताड़ना करने) की एफआईआर दर्ज कर 26 मार्च 2019 को चालान को कोर्ट में प्रस्तुत किया।
28 अक्टूबर 2009 को आरोपियों के खिलाफ आरोप तय किए गए जिसमें उन्होंने खुद को निर्दोष बताया। इसके बाद कोर्ट ने गवाहों को प्रस्तुत करने के निर्देश दिए थे। सुनवाई के दौरान आरोपी (मुश्ताक अहमद) की मौत हो गई जिसके बाद उसके खिलाफ कार्यवाही समाप्त कर दी गई। अभियोजन पक्ष ने कोर्ट में पांच की गवाही करवाई जिसमें दो स्वतंत्र गवाह भी शामिल थे। स्वतंत्र गवाहों ने कोर्ट में अभियोजन पक्ष की कहानी का समर्थन नहीं किया। उन्होंने कहा कि पति-पत्नी के संबंध सामान्य थे।
महिला के पिता और भाई ने प्रताड़ना के आरोप लगाए लेकिन ये बातें मृतक या अन्य लोगों से सुनी हुई बातों पर आधारित थीं। कोर्ट ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद और मामले में रिकॉर्ड में उपलब्ध दस्तावेजों का अवलोकन करने के बाद पाया कि किसी भी गवाह ने प्रत्यक्ष रूप से दहेज मांग या मारपीट होते नहीं देखा। कोर्ट में डॉक्टर को पेश नहीं किया गया, जिससे मौत का कारण स्पष्ट नहीं हो सका। कोर्ट ने कहा कि महिला को आत्महत्या के लिए उकसाने के लिए आवश्यक ठोस सबूत नहीं मिले। इसके बाद कोर्ट ने आरोपियों को संदेह का लाभ देते हुए उन्हें बरी करने का फैसला सुनाया।