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Kathua News: रास्ता रोककर मारपीट के मामले में आरोपी बरी
संवाद न्यूज एजेंसी, कठुआ
Updated Sat, 02 May 2026 01:54 AM IST
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अदालत से
वर्ष 2017 का बनी के अंधेरलु इलाके का मामला
संवाद न्यूज एजेंसी
कठुआ। न्यायिक मजिस्ट्रेट बनी ने मारपीट और रास्ता रोकने के आठ साल पुराने मामले में तीन आरोपियों बरी कर दिया है। आदेश के अनुसार अभियोजन पक्ष आरोपियों के खिलाफ लगाए गए आरोप साबित करने में पूरी तरह विफल रहा है।
अदालत ने कहा कि गवाहों के बयानों, घटना की तारीख, समय और बरामदगी संबंधी तथ्यों में गंभीर विरोधाभास सामने आए हैं। इस कारण आरोपियों को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया है। यह चालान न्यायिक मजिस्ट्रेट शिवानी अत्री की अदालत में दायर किया गया था। याचिका के अनुसार मामला 13 मई 2017 का बनी के अंधरेलु इलाके का है। शिकायतकर्ता बरकत अली निवासी फतेहपुर ने पुलिस थाना बनी में शिकायत में आरोप लगाया कि उसकी पत्नी जट्टी और चंचलो देवी साम 4 बजे मक्की की बिजाई कर घर लौट रही थी। इलाके की सार्वजनिक सड़क पर आरोपी पूरन चंद, रोमल सिंह, भंगली देवी और नीमो देवी ने रास्ता रोका और उसकी पत्नी के साथ मारपीट की।
जांच के दौरान पुलिस ने आरोपियों के खिलाफ आरपीसी की धारा 341 (रास्ता रोकना) और 323 (मारपीट) के तहत एफआईआर दर्ज कर चालान को 25 मई 2017 को कोर्ट में प्रस्तुत किया। 16 जून 2017 को आरोपियों के खिलाफ आरोप तय किए गए। इसमें उन्होंने खुद को निर्दोष बताया और मुकदमा चलाए जाने की मांग की। इसके बाद कोर्ट ने अभियोजन पक्ष को मामले में साक्ष्य प्रस्तुत करने का आदेश दिया। अभियोजन पक्ष ने कुल आठ गवाह प्रस्तुत किए गए। इसमें शिकायतकर्ता, घायल महिला, प्रत्यक्षदर्शी, मेडिकल अधिकारी और जांच अधिकारी शामिल थे।
सुनवाई के दौरान आरोपी पूरन चंद की मौत हो जाने के कारण उसके विरुद्ध कार्यवाही समाप्त कर दी गई। कोर्ट ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद पाया कि अभियोजन पक्ष की कहानी शुरू से अंत तक एकसमान नहीं रही। शिकायतकर्ता बरकत अली ने स्वयं को प्रत्यक्षदर्शी बताते हुए कहा कि वह मौके पर पहुंचा और पत्नी को छुड़ाया और लाठी भी बरामद की। जांच अधिकारी ने जिरह में साफ स्वीकार किया कि शिकायतकर्ता घटना का प्रत्यक्षदर्शी नहीं था। इतना ही नहीं घायल महिला ने अपने बयान में यह नहीं कहा कि उसके पति ने मौके पर पहुंचकर उसे बचाया था। अन्य गवाहों ने मारपीट की घटना को 13 मई 2017 को बताया जबकि मेडिकल अधिकारी ने बयान में घायल की जांच 13 अप्रैल 2017 बताया। कोर्ट ने माना कि एक महीने का यह अंतर अभियोजन स्पष्ट नहीं कर सका। इसी प्रकार कुछ गवाहों ने घटना शाम चार से पांच बजे के बीच दिन के उजाले की बताया जबकि एक गवाह ने छह बजे अंधेरा होने की बात कही। इसके अलावा शिकायतकर्ता ने कहा कि उसने मौके से लाठी छीनी जबकि जांच अधिकारी ने कहा कि शिकायतकर्ता लाठी को पुलिस स्टेशन लेकर आया था।
घायल महिला ने कहा कि खून लगे कपड़े पुलिस ने जब्त नहीं किए जबकि एक अन्य गवाह ने कपड़े जब्त करने का दावा किया। इसके बाद अदालत ने तीनों आरोपियों को संदेह का लाभ देते हुए बरी करने का फैसला सुनाया।
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वर्ष 2017 का बनी के अंधेरलु इलाके का मामला
संवाद न्यूज एजेंसी
कठुआ। न्यायिक मजिस्ट्रेट बनी ने मारपीट और रास्ता रोकने के आठ साल पुराने मामले में तीन आरोपियों बरी कर दिया है। आदेश के अनुसार अभियोजन पक्ष आरोपियों के खिलाफ लगाए गए आरोप साबित करने में पूरी तरह विफल रहा है।
अदालत ने कहा कि गवाहों के बयानों, घटना की तारीख, समय और बरामदगी संबंधी तथ्यों में गंभीर विरोधाभास सामने आए हैं। इस कारण आरोपियों को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया है। यह चालान न्यायिक मजिस्ट्रेट शिवानी अत्री की अदालत में दायर किया गया था। याचिका के अनुसार मामला 13 मई 2017 का बनी के अंधरेलु इलाके का है। शिकायतकर्ता बरकत अली निवासी फतेहपुर ने पुलिस थाना बनी में शिकायत में आरोप लगाया कि उसकी पत्नी जट्टी और चंचलो देवी साम 4 बजे मक्की की बिजाई कर घर लौट रही थी। इलाके की सार्वजनिक सड़क पर आरोपी पूरन चंद, रोमल सिंह, भंगली देवी और नीमो देवी ने रास्ता रोका और उसकी पत्नी के साथ मारपीट की।
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जांच के दौरान पुलिस ने आरोपियों के खिलाफ आरपीसी की धारा 341 (रास्ता रोकना) और 323 (मारपीट) के तहत एफआईआर दर्ज कर चालान को 25 मई 2017 को कोर्ट में प्रस्तुत किया। 16 जून 2017 को आरोपियों के खिलाफ आरोप तय किए गए। इसमें उन्होंने खुद को निर्दोष बताया और मुकदमा चलाए जाने की मांग की। इसके बाद कोर्ट ने अभियोजन पक्ष को मामले में साक्ष्य प्रस्तुत करने का आदेश दिया। अभियोजन पक्ष ने कुल आठ गवाह प्रस्तुत किए गए। इसमें शिकायतकर्ता, घायल महिला, प्रत्यक्षदर्शी, मेडिकल अधिकारी और जांच अधिकारी शामिल थे।
सुनवाई के दौरान आरोपी पूरन चंद की मौत हो जाने के कारण उसके विरुद्ध कार्यवाही समाप्त कर दी गई। कोर्ट ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद पाया कि अभियोजन पक्ष की कहानी शुरू से अंत तक एकसमान नहीं रही। शिकायतकर्ता बरकत अली ने स्वयं को प्रत्यक्षदर्शी बताते हुए कहा कि वह मौके पर पहुंचा और पत्नी को छुड़ाया और लाठी भी बरामद की। जांच अधिकारी ने जिरह में साफ स्वीकार किया कि शिकायतकर्ता घटना का प्रत्यक्षदर्शी नहीं था। इतना ही नहीं घायल महिला ने अपने बयान में यह नहीं कहा कि उसके पति ने मौके पर पहुंचकर उसे बचाया था। अन्य गवाहों ने मारपीट की घटना को 13 मई 2017 को बताया जबकि मेडिकल अधिकारी ने बयान में घायल की जांच 13 अप्रैल 2017 बताया। कोर्ट ने माना कि एक महीने का यह अंतर अभियोजन स्पष्ट नहीं कर सका। इसी प्रकार कुछ गवाहों ने घटना शाम चार से पांच बजे के बीच दिन के उजाले की बताया जबकि एक गवाह ने छह बजे अंधेरा होने की बात कही। इसके अलावा शिकायतकर्ता ने कहा कि उसने मौके से लाठी छीनी जबकि जांच अधिकारी ने कहा कि शिकायतकर्ता लाठी को पुलिस स्टेशन लेकर आया था।
घायल महिला ने कहा कि खून लगे कपड़े पुलिस ने जब्त नहीं किए जबकि एक अन्य गवाह ने कपड़े जब्त करने का दावा किया। इसके बाद अदालत ने तीनों आरोपियों को संदेह का लाभ देते हुए बरी करने का फैसला सुनाया।
